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इस धरती का जीवन खत्म करने में जुटे देश तलाश रहे दूसरे ग्रहों पर जीवन..

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-सुनील कुमार॥
पर्यावरण के लिए लड़ते हुए बरसों से खबरों में बनी हुई योरप की किशोरी ग्रेटा थनबर्ग की ताजा आलोचना अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के मंगल मिशन पर केन्द्रित है, और ग्रेटा ने इसे अमीर देशों की पैसों की बर्बादी करार दिया है। उसने लिखा है कि आज जब धरती जलवायु परिवर्तन से जूझ रही है तब इसे अनदेखा करके दुनिया के अमीर देश दूसरे ग्रहों की यात्रा पर पैसा बर्बाद कर रहे हैं। ग्रेटा का यह बयान दुनिया में आज लोगों की आम सोच के ठीक खिलाफ है। आज दुनिया के देश न सिर्फ इस बात पर स्वाभिमान और अभिमान से लबालब हैं कि उनके अंतरिक्षयान किस-किस ग्रह तक पहुंच रहे हैं, बल्कि भारत जैसे देश तो इस बात को लेकर भी अभिमान करते हैं कि अमरीका की एक अंतरिक्ष यात्री एक भारतवंशी महिला भी थी। अंतरिक्ष तक पहुंचना धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति को चुनौती देने वाला एक ऐसा काम है जो राष्ट्रीय गौरव का समझा जाता है, फिर चाहे उसका सीधा-सीधा कोई इस्तेमाल धरती के लिए न हो।

वैसे तो विज्ञान को लेकर दिए गए बहुत किस्म के खर्च को लेकर यह बात कही जा सकती है कि उसका कोई तुरंत उपयोग नहीं है, लेकिन कब दुनिया के किस शोधकार्य का इस्तेमाल कहां पर होने लगे, इसका कोई ठिकाना तो रहता नहीं है। वैज्ञानिक कुछ खोजते रहते हैं, और उनके हाथ कुछ और चीजें लग जाती हैं। इसलिए अंतरिक्ष अभियानों को हम फिजूलखर्ची तो नहीं मानेंगे, लेकिन फिर भी ग्रेटा थनबर्ग की बात से एक दूसरी चीज जो निकलती है, उस पर गौर करने की जरूरत है। अंतरिक्ष के किस ग्रह पर पानी है, किस पर हवा है, किस पर किसी किस्म के जीवन की संभावना है, यह खोज करते-करते वैज्ञानिक लगातार एक ऐसी संभावना भी खोज रहे हैं कि वक्त-जरूरत इंसानों को किस ग्रह पर बसाया जा सकता है। ऐसी जरूरत इसलिए भी लग रही है कि अमरीकी फिल्म, द डे ऑफ्टर, की तरह अगर दुनिया परमाणु युद्ध का शिकार हो जाती है, तो उसके बाद जीवन कैसा बचेगा, बचेगा या नहीं बचेगा, और बचा हुआ जीवन किस तरह की जटिलताओं से भर जाएगा, इसका आज कोई अंदाज नहीं है। इसलिए अगर मानव प्रजाति को बचाना है, तो इसके लिए दुनिया में कोई दूसरा ग्रह भी तलाशना फिजूल का काम नहीं है जहां कि इंसान जिंदा रह सकें। यह एक अलग बात है कि एक तरफ जो अमीर देश अंतरिक्ष में ऐसे लंबे-लंबे सफर कर रहे हैं, उन पर खासा खर्च कर रहे हैं, वे देश आज धरती को बचाने के लिए उतनी मेहनत नहीं कर रहे। अभी नए अमरीकी राष्ट्रपति के आने के पहले पिछले चार बरस तक तो डोनल्ड ट्रंप ने अमरीका को जलवायु के पेरिस समझौते से ही बाहर कर लिया था। अपनी अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों को निभाने से इंकार कर दिया था। और आज भी मंगल मिशन वाला यह अमरीका दुनिया में सामानों की सबसे अधिक फिजूलखर्ची करने वाला देश है। इसलिए ग्रेटा थनबर्ग की बात के इस पहलू में तो दम है कि इंसान, और खासकर अमीर देश, इस धरती को बचाने की आसान और मुमकिन कोशिशों पर तो गौर नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे इस धरती के विकल्प को खोजने की कोशिश में बरसों की दूरी पर बसे हुए ग्रहों पर हवा-पानी तलाश रहे हैं। ऐसा करना किसी कोरोना के हाथों धरती के तमाम जीवन के खत्म होने के मौके पर तो काम का साबित हो सकता है कि जब थोड़े से लोग ही धरती पर बचने हों, तो कुछ जोड़ों को दूसरे ग्रह पर भेजकर इस नस्ल को जिंदा रखा जाए। लेकिन आज अगर पर्यावरण और जलवायु की फिक्र करके इस धरती को पूरे का पूरा बचाना मुमकिन है, तो उसकी तरफ पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा।

लेकिन दूसरे ग्रहों तक का सफर और वहां पर बसाहट के पीछे अमीर देशों की नीयत महज इतने तंगनजरिए की नहीं हो सकती कि वह इंसानी नस्ल को जिंदा रखने के लिए हो। जाहिर तौर पर दूसरे ग्रहों की यह दौड़ उन ग्रहों पर भी अपने पहले हक या अपने एकाधिकार को कायम करने की एक बेताबी भी है कि दूसरे देश जब वहां पहुंचें तो पहले पहुंचे हुए देश उनसे लंैडिंग की फीस ले सकें। ग्रेटा थनबर्ग की कही हुई बात पर सोचने की जरूरत है कि आज जब इस धरती पर बदहाली और तंगहाली का यह आलम है, तब क्या दुनिया के संपन्न देशों को अपने सामाजिक सरोकार साबित करते हुए इस धरती को ही बचाने की बेहतर कोशिश नहीं करनी चाहिए? इंसानों ने खूबसूरत कुदरत वाली इस संपन्न धरती को पिछले कुछ हजार सालों में ही इस हद तक बर्बाद कर दिया है कि दूसरे किसी ग्रह के प्राणी यहां आकर बसने की सोचेंगे भी नहीं। जब लोगों की बातों में विरोधाभास रहता है तभी उनकी बातों की खामियों की तरफ ध्यान जाता है। आज इस धरती के जीवन को खत्म करने वाले अमीर देश जब दूसरे किसी ग्रह पर जीवन तलाशने की महंगी मुहिम चलाते हैं, तो उनकी नीयत का विरोधाभास खुलकर दिखता है। ग्रेटा थनबर्ग के ताजा बयान से लोगों को ऐसे विरोधाभास के बारे में सोचने का मौका मिल रहा है।

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