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राहुल गांधी के ट्रोल का भविष्य क्या होगा?

Sanjaya Kumar Singh
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अगर आपने अपने बच्चे को ‘देश सेवा’ के महान काम में लगाया है तो उसका भविष्य भी सोचिए
कौशल विकास मंत्रालय याद है? कौन मंत्री है जानते हैं? कभी नाम सुना, खबर पढ़ी?

-संजय कुमार सिंह॥

देश की राजनीति में कांग्रेस के दबदबे को खत्म करके भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में लाने की कांग्रेस विरोधियों की कोशिश कितनी पुरानी है और कैसी है उसपर चर्चा करने की जरूरत नहीं है। कांग्रेस सत्ता में नहीं है, अपने कर्मों से निकट भविष्य में वह सत्ता में आएगी इसकी संभावना भी कम है। कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने या उसके विरोध से बचने के लिए भारतीय जनता के प्रयासों और अभियानों में एक राहुल गांधी को पप्पू साबित करना भी है। मैं उस अभियान में लगे लोगों के भविष्य की बात करना चाहता हूं। वह इसलिए कि यह काम लंबा नहीं चलने वाला है। राहुल गांधी को सत्ता में नहीं आना होगा तो नहीं आएंगे और आना होगा तो आ जाएंगे दोनों स्थितियों में यह नौकरी 10 साल से ज्यादा नहीं चलेगी। आम तौर पर एक युवा 35 साल नौकरी करता है। 10 साल बाद ये अपने अनुभवों का क्या करेंगे। यह चिन्ता किसी और की हो या नहीं उनकी जरूर होनी चाहिए जो अभी इस महान काम में लगे हैं और खुश हैं। उनके आश्रितों और भविष्य में उनपर आश्रित होने वालों को भी।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि भविष्य में ऐसे काम की जरूरत नहीं रहेगी। तब ये लोग कैसे कमाएंगे। और बात सिर्फ कमाने की नहीं होती है। काम वह करना चाहिए जिसमें अनुभव से आप जो सीखें उसका महत्व हो उससे आपकी पूछ बढ़े। कमाई बढ़े। मुझे नहीं लगता इस काम में ऐसी कोई संभावना है। इसका खतरा यह है कि जो अभी यह काम कर रहे हैं उन्हें भविष्य में ज्यादा पैसे नहीं मिलेंगे। दो कारण से – एक तो इस काम की जरूरत ही नहीं रहेगी और दूसरे, जरूरी रही तो उस समय नए लड़के कम पैसे में रख लिए जाएंगे जो कॉपी पेस्ट कर दिया करेंगे। यही नहीं जो काम सिखाया और करवाया जा रहा है उसमें भी कुछ सीखने की कोई संभावना नहीं दिखाई देती है। अव्वल तो किसी रेखा को छोटी करने का आसान तरीका उससे बड़ी रेखा खींचना ही होता है पर कुछ नीच और अशिक्षित लोग उस रेखा को तोड़ कर, मिटा कर छोटा करने का तरीका भी आजमाते हैं। और यह तरीका ज्यादा नहीं चलेगा। इसलिए इसका भविष्य नहीं है।


राहुल गांधी को छोटा करने का मौजूदा तरीका बहुत तुच्छ है। हीन भावना की परोक्ष स्वीकारोक्ति है पर वह मेरी चिन्ता का विषय नहीं है। मेरी चिन्ता का कारण है कि यह इतना बड़ा काम नहीं है पर जितने लोग इस काम में लगे हैं उससे संभावना है कि बहुत सारे लोग इसमें और ऐसे काम में अपना रोजगार तलाशें। मैं ऐसे लोगों के भविष्य की चिन्ता में इस विषय पर बात करना चाहता हूं। उदाहरण के लिए हाल की एक घटना को लेता हूं। एएनआई ने 17 फरवरी 2021 को अंग्रेजी में एक खबर दी थी जिसका अनुवाद कुछ इस तरह होगा, “सरकार ने देश की रीढ़ कहे जाने वाले किसानों के खिलाफ तीन कानून पास किए हैं। आप सोच रहे होंगे कि यहां मछुआरों के बीच मैं किसानों की बात क्‍यों कर रहा हूं। मैं आपको ‘समुद्र का किसान’ मानता हूं।’ अगर जमीन पर खेती करने वालों के लिए मंत्रालय हो सकता है तो ‘समुद्र का किसानों’ के लिए क्‍यों नहीं : राहुल गांधी।

मुझे लगता है कि इस ट्वीट में राहुल गांधी की बात पूरी तरह साफ है। वे समुद्र में मछली मारने वालों के लिए एक मत्स्य मंत्रालय बनाने की बात कर रहे हैं। अभी केंद्र सरकार का एक मंत्रालय है, पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन। बेशक इसके नाम में मत्स्यपालन जुड़ा हुआ है लेकिन है यह कृषि मंत्रालय का एक विभाग है। मंत्रालय, कृषि और सहकारिता विभाग के दो प्रभागों अर्थात पशुपालन और डेयरी विकास को मिला कर एक फरवरी 1991 को अस्तित्व में आया था। कृषि और सहकारिता विभाग का मात्स्यिकी प्रभाग तथा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय का एक हिस्सा इस नए विभाग में 10 अक्तूबर 1997 को अंतरित कर दिया गया था। कहने की जरूरत नहीं है कि अभी मत्स्य मंत्रालय नहीं है। जो है वह कृषि मंत्रालय में एक विभाग है। अगर हम तकनीकी विस्तार में न जाएं तो भी स्पष्ट है कि इस विभाग का समुद्र में मछली पकड़ने से कितना संबंध होगा और गांव के तालाब तथा गड्ढों में मछली मारने-पालने के मुकाबले समुद्र में मछली मारने से यह काम कितना अलग है।


इसके बावजूद इस विभाग के मंत्री इसे ‘मंत्रालय’ समझ रहे हैं और राहुल गांधी के कथित अज्ञान (या उदासीनता) से इतना बौखला गए कि इटैलियन में ट्वीट कर दिया। पता नहीं इसपर कितना खर्चा आया, किसी इटली भाषी से लिखवाया गया या हिन्दी से इटैलियन में अनुवाद हुआ। फिर भी मुद्दा यह है कि राहुल गांधी ने समुद्री मछुआरों के लिए एक अलग मंत्रालय की बात की थी। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह को पता होगा कि गुजरात तट से लेकर उड़ीशा-बंगाल में तट पर रहने और मछली मारने पर निर्भर लोगों के लिए मंत्रालय बन जाए तो उनके चुनाव क्षेत्र में कोई फर्क नहीं पड़ेगा भले राहुल गांधी या उनकी पार्टी को भारी फायदा हो जाए और वहां वैसे भी उनकी दाल नहीं गलती है। इस कारण से और कई अन्य कारणों से अलग मंत्रालय बनाने की बात तो छोड़िए गिरिराज सिंह इसकी जरूरत भी नहीं समझा पाएंगे।


इसीलिए उन्होंने कहा, राहुल जी ! आपको इतना तो पता ही होना चाहिए कि 31 मई,2019 को ही मोदी जी ने नया मंत्रालय बना दिया। और 20050 करोड़ रुपए की महायोजना (PMMSY) शुरू की जो आज़ादी से लेकर 2014 के केन्द्र सरकार के खर्च (3682 करोड़) से कई गुना ज़्यादा है। कहने की जरूरत नहीं है कि मंत्रीजी वह कर रहे हैं जो कर सकते हैं और राहुल गांधी उनसे तथा उनके प्रधानमंत्री से कहीं आगे हैं। पर, सरकार में हैं, ट्रोल सेना है तो राहुल गांधी का मजाक उड़वा सकते हैं और उड़वाने की पूरी कोशिश की। असल में क्या हुआ क्या नहीं – मैं नहीं जानता पर मैं ये सोच कर परेशान हूं कि ये लोग बेरोजगार होंगे तो इनके कौशल का क्या उपयोग होगा। ऐसे लोग जब मंत्री हैं तो कौशल विकास क्या हो रहा होगा आप समझ सकते हैं।
यहां यह बताना दिलचस्प है कि पूर्व केंद्रीय कौशल विकास मंत्री राजीव प्रताप रुड़ी से इस्तीफा ले लिया गया था। बीबीसी से बातचीत (एक सितंबर 2017) में रूड़ी ने अपने इस्तीफ़े पर कहा था, “ये राजनीतिक निर्णय है। पार्टी के अध्यक्ष का यह फ़ैसला है। हम भारतीय जनता पार्टी के सिपाही हैं। हम अपने काम को निष्ठा” से निभाते हैं।” कौशल विकास मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल को रूडी ने अच्छा बताया था और कहा था, “कौशल विकास प्रधानमंत्री का सबसे महत्वाकांक्षी विषय है। इसे शुरुआती दौर में एक प्रकार से आकार देने में कठिनाई हुई। मुझे लगता है कि एक स्वरूप निकल कर आ गया है। आगे जो भी इस काम को देखेगा उसके पास बहुत अच्छा काम करने की गुंजाइश होगी।” इस समय केंद्रीय कौशल विकास मंत्री डॉ. महेंद्रनाथ पांडेय हैं, आप जानते थे? कभी नाम सुना, खबर पढ़ी? फिर राहुल गांधी को मत्स्य मंत्रालय की जानकारी क्यों होनी चाहिए? भक्तों ने उसका भी कारण बताया और एक मूर्खतापूर्ण तर्क उसके लिए भी दिया। उसपर फिर कभी।

About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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