तुम हमे चंदा दो हम तुम्हे दंगा देंगे..

तुम हमे चंदा दो हम तुम्हे दंगा देंगे..

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-प्रेमसिंह सियाग॥

1992 में राम मंदिर के लिए वीएचपी ने 1400 करोड़ रुपये व सोने-चांदी की ईंटे चंदे से एकत्रित की थी जिसकी कीमत आज 20 हजार करोड़ रुपये होती है! बाद में हिन्दू संगठनों में चंदे के बंटवारे को लेकर झगड़ा हुआ तो एक संगठन ने वीएचपी पर घोटाले का आरोप लगाया।

अभी राम मंदिर निर्माण को लेकर फिर से चंदाजीवी गांव-गांव घूम रहे है। लक्ष्य रखा है 5000 करोड़ रुपये जुटाने का।राम मंदिर निर्माण का ठेका एल एन्ड टी कंपनी को दिया जा चुका है खर्च राशि का इंतजाम पहले ही हो चुका है।

क्या किसी ने पूछा कि 1992 में एकत्रित चंदे का क्या हुआ? क्या अभी कोई पूछ रहा है कि इतनी बड़ी रकम से क्या करोगे?भारत मे भक्ति व आस्था की उपजाऊ जमीन पर बड़ी तादाद में चंदाजीवी प्रजाति निवास करती है। यह अमरबेल की तरह होती है। खुद की जड़ें नहीं होती और दूसरों की जड़ों से पोषण प्राप्त करती है। ये परजीवी है और देश की अर्थव्यवस्था पर,देश के विकास पर बोझ बने बैठे है।

जो आज सत्ता व धार्मिक संगठन मिलकर दमन चक्र चलाये हुए है उसको तानाशाही, अघोषित आपातकाल, हिटलर शाही का नाम दे दीजिए लेकिन असल मे यह शुद्ध रूप से हजारों सालों से चले आ रहे हिन्दू अधिनायक वाद का चरम स्वरूप है।आरएसएस चाहे हिटलर का समर्थक रहा हो सावरकर ने मुस्लिम मुक्त भारत की कल्पना की हो या अब जो हिन्दू राष्ट्र की बात की जा रही हो वो शुद्ध रूप से भारतीय समाज की ऐतिहासिक अवधारणा को स्थापित करने की ख्वाहिश है।

वर्णिक व्यवस्था अर्थात ब्राह्मण, क्षेत्रीय, वैश्य व क्षुद्र के रूप में समाज चलाने की जद्दोजहद। आपने इस किसान आंदोलन को लेकर एक बात इनकी तरफ से बार-बार सुनी होगी कि “असली किसान तो खेतों में है! “मतलब ट्रेक्टर लेकर दिल्ली के बॉर्डर पर साफ सुथरे कपड़ों में हलुआ-पिज़्ज़ा खाने वाले इनके नजरिये से किसान नहीं हो सकता। सोच साफ है कि किसानों का काम सत्ता की तरफ आना/सवाल करना नहीं है बल्कि जो बताया जा रहा है, व्यवस्था की जा रही है उसको नियति मानकर चुपचाप मिट्टी खोदता रहे!

आरक्षण खत्म करने के लिए ये लोग बकायदा आंदोलन चला रहे है। इनका नेतृत्व कई धर्मखोर करते है। ये महंगी गाड़ियों में घूमते है, महंगे मंच व खाने-पीने की फाइव स्टार सुविधा, इन सबके लिए पैसा कहाँ से आता है? धर्मखोर कोई धंधा तो करते नहीं है! धर्मखोरों को संवैधानिक व्यवस्था से क्या मतलब? करें अपनी भक्ति व पड़े रहे जंगलों के किनारे! क्षुद्र ब्राह्मण के साथ कुर्सी पर बैठकर नौकरी क्यों कर रहा है, यह इनके लिए परेशानी का सबब बन चुका है इसलिए इनको हिन्दू राष्ट्र चाहिए और उसके लिए चंदा भी।

ब्राह्मण धर्म की वर्णिक व्यवस्था के हिसाब से देश चले इसलिए हिन्दू राष्ट्र का रोग लेकर घूम रहे है। एक जमात ज्ञान की उच्चता का मुफ्त में प्याला पिला रही, एक जमात इनकी रक्षा के लिए लठैत बनकर रही, एक जमात निर्मित पूंजी ठगकर इनके लिए ऐशो आराम की व्यवस्था करे, एक जमात सिर नीचा करके चुपचाप इनकी सेवा चाकरी करे, बिना सवाल किए आदेशों का पालन करती रहे। यही इनके हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना है। ब्राह्मणवाद से निर्दयी, निरंकुश, निकृष्ट व्यवस्था न इतिहास में कभी देखी गई और न भविष्य में दुनियाँ देख पाएगी।

जो भी अपने हकों की आवाज उठाता है उनके ऊपर सत्ता देशद्रोह का मुकदमा लगाकर अंदर करती है, जो आंदोलन करते है उनके ऊपर धार्मिक संगठनों के गुंडे हमला करते है। सत्ता, न्यायपालिका, मीडिया व पूंजी पर कब्जे को, जो भी चुनौती देता है तो एकत्रित किये चंदे का उपयोग उनके खिलाफ किया जाता है।

इनका अघोषित नारा है…

तुम हमे चंदा दो
हम तुम्हे दंगा देंगे!

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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