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मेट्रोमैन श्रीधरन के भाजपा में जाने से उदास लोगों के लिए…

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-सुनील कुमार॥
भारत के सरकारी क्षेत्र में काम करने वाले कम ही लोग इज्जत पाते हैं। यहां सरकारी से मतलब गैरकारोबारी है, ऐसे क्षेत्र जो कि सरकार से जुड़े सार्वजनिक उपक्रम हों, या कि सहकारी संस्थाएं हों। इनमें सबसे अधिक इज्जत के साथ वर्गीज कुरियन का लिया जाता है जिन्होंने गुजरात के आनंद में दूध का एक सहकारी आंदोलन खड़ा किया, और अमूल नाम का एक ब्रांड जो कि हिन्दुस्तान के सबसे भरोसेमंद ब्रांड में से एक है। इसी तरह ई श्रीधरन का नाम लिया जाता है जिन्होंने रिकॉर्ड समय में न सिर्फ दिल्ली मेट्रो शुरू की, बल्कि देश के कई और मेट्रो प्रोजेक्ट में उनका योगदान रहा। अब करीब 90 बरस की उम्र में अपने गृहराज्य केरल में बसे हुए श्रीधरन ने भागवत-प्रवचन के काम के साथ-साथ भाजपा की सदस्यता ली है और कल से वे खबरों में हैं। वे एक बड़े काबिल तकनीकी-अफसर माने जाते रहे हैं, और उन्हें पद्मविभूषण से सम्मानित भी किया गया था।

जिन लोगों को श्रीधरन के भाजपा में जाने से कुछ हैरानी हो रही है, उन्हें याद रखना चाहिए कि 2014 के आम चुनाव के पहले उन्होंने सार्वजनिक रूप से नरेन्द्र मोदी की प्रधानमंत्री के रूप में सिफारिश की थी, और गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उनके तुरंत फैसले लेने की तारीफ की थी। इसके अलावा भी उन्होंने दिल्ली सरकार से लेकर केरल सरकार तक के कई फैसलों का सार्वजनिक-विरोध किया था। अब उन्होंने न सिर्फ भाजपा की सदस्यता ली है बल्कि टिकट मिलने पर आने वाला विधानसभा चुनाव लडऩे की घोषणा भी की है।

जिन लोगों को इस उम्र में श्रीधरन के भाजपा में जाने से हैरानी हो रही है उन्हें यह भी समझना चाहिए कि किसी के वैज्ञानिक होने, इंजीनियर होने, या अर्थशास्त्री होने से उसकी सोच किसी खास राजनीतिक विचारधारा में ढले, ऐसा जरूरी नहीं होता। लोग विज्ञान पढ़ते हुए भी, पढ़ाते हुए भी धार्मिक पाखंड और अंधविश्वास के साथ खड़े हो जाते हैं। विज्ञान किसी की राजनीतिक सोच को प्रभावित नहीं करता। बाबरी मस्जिद को गिरवाते हुए सामने मंच पर खड़े खुशियां मनाते हुए मुरली मनोहर जोशी तो विश्वविद्यालय में साईंस के प्रोफेसर थे, लेकिन राम मंदिर के मुद्दे पर विज्ञान उन्हें छू भी नहीं गया था। देश के बाहर बसे हुए अनगिनत कामयाब हिन्दुस्तानी वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को देखें, तो उनमें से बहुत से लोग धर्मान्धता के शिकार रहते हैं, और विज्ञान की उनकी पढ़ाई उनमें कोई समझ पैदा कर सकती हो, ऐसा जरूरी नहीं रहता। इसलिए जब धर्म की राजनीति पर केन्द्रित भाजपा जाने का फैसला श्रीधरन ने लिया, तो इसमें उनकी विज्ञान और तकनीक की समझ कहीं आड़े आई हो ऐसा नहीं है। दरअसल उनसे ठीक पहले की एक दूसरी मिसाल देखें, तो मिसाइल-मैन कहे जाने वाले डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम अपनी तकनीकी कामयाबी के बावजूद विचारधारा के स्तर पर भाजपा के करीब थे, भाजपा के पसंदीदा थे, और भाजपा के बनाए हुए राष्ट्रपति थे।

आज दुनिया के सबसे आधुनिक माने जाने वाले एक देश अमरीका में बसे हुए लाखों हिन्दुस्तानी विज्ञान और तकनीक की कमाई खा रहे हैं। लेकिन उनमें से बहुतायत भाजपा के समर्थकों की है, और ओवरसीज फ्रेंड्स ऑफ बीजेपी वहां हिन्दुस्तानियों का सबसे बड़ा और मजबूत भारतवंशी संगठन है।

भाजपा में जाने की वजह से ई.श्रीधरन का मखौल उड़ाना ठीक नहीं है। भारतीय लोकतंत्र के भीतर भाजपा एक मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है, और धर्म-आधारित उसका राजनीतिक रूझान संविधान की सरहदों के बाहर तकनीकी रूप से तो नहीं निकला है। फिर श्रीधरन तो रिटायर होने के बाद केरल में बसे हुए भागवत-प्रवचन का काम कर ही रहे थे, और उनकी धार्मिक सोच भी उन्हें भाजपा के करीब ले जाने वाली थी। सवाल यह उठता है कि आधुनिक तकनीक के एक महान कामयाब व्यक्ति के इतने बरस तक घर पर खाली रहते हुए भी केरल में अतिसक्रिय कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों को वे क्यों नहीं दिखे? ये पार्टियां भी कोशिश तो कर ही सकती थी कि वे श्रीधरन को अपने पाले में लाकर उनकी साख और शोहरत को भुना सकती थीं। लेकिन इन्होंने ऐसा नहीं किया, और भाजपा ने इस मौके का इस्तेमाल किया। कई दूसरे राज्यों में दूसरी पार्टियों के विधायकों को अपने पाले में लाने की जिस तरह की कोशिश जिन कीमतों पर भाजपा या कोई दूसरी पार्टी करती हैं, इतना तो जाहिर है कि श्रीधरन के लिए वैसी कोई कैश-कोशिश नहीं करनी पड़ी होगी।

दरअसल भाजपा को कोसने की हरकतें उस वक्त तो जायज हो सकती हैं जब दूसरी पार्टियां कोशिश करें, और उसके बाद भी भाजपा कामयाब हो जाए। आज देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी का हाल यह है कि अपनी ही पार्टी के सबसे महान और लोकप्रिय प्रतीकों, सरदार पटेल से लेकर नेताजी सुभाषचंद्र बोस तक किसी का भी वह सम्मान नहीं कर सकी, और ऐसे बड़े प्रतीकों को उसने भाजपा के इस्तेमाल के लिए फुटपाथ पर खुला छोड़ रखा था। देश के सबसे बड़े और महान वामपंथी शहीद भगत सिंह की स्मृतियों को भी धर्मनिरपेक्ष प्रतीक के रूप में कांग्रेस इस्तेमाल नहीं कर सकी, और भगत सिंह को भी संघ-भाजपा ने अपने मंचों पर टांग लिया। भाजपा की विरोधी पार्टियां भाजपा की तरह न मेहनत कर पा रही हैं, न कल्पनाशीलता दिखा पा रही हैं, और इनसे परे की अघोषित कोशिशों की हम बात नहीं करते। श्रीधरन के भाजपा में जाने का फैसला भाजपा विरोधियों के लिए चाहे जो मायने रखे, यह तो है कि राजनीतिक एक अच्छे व्यक्ति के आने से उसके कुछ बेहतर होने की संभावना बढ़ती है। जो लोग यह सोच रहे हैं कि श्रीधरन जैसे तकनीकी विशेषज्ञ और कामयाब अफसर कैसे भाजपा में चले गए, उन्हें यह समझना चाहिए कि किसी तकनीक का भाजपा की सोच से कोई टकराव नहीं होता। तकनीक की अपनी कोई सोच नहीं होती, और हाइड्रोजन बम बनाने वालों को इस बात का अहसास नहीं था कि अमरीका उसे जापान के हिरोशिमा-नागासाकी पर गिराकर लाख से अधिक लोगों को मार डालेगा। तकनीक हो, या तकनीकी विशेषज्ञ हो, वे सबको बराबरी से हासिल रहते हैं, देखने की बात यह रहती है कि किसे उनका कैसा इस्तेमाल सूझता है। आज इस काम में हिन्दुस्तान में भाजपा नंबर वन है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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