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खबरों में बने रहने का कोई मौका नहीं छोड़ते सुप्रीम कोर्ट और पूर्व सीजेआई गोगोई..

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-सुनील कुमार॥

सुप्रीम कोर्ट और उसके एक रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई खबरों से हटने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। अब कल की ताजा खबर यह है कि रंजन गोगोई पर एक मातहत महिला कर्मचारी द्वारा लगाए गए यौन शोषण के आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की खुद होकर शुरू की गई एक जांच अब बंद कर दी गई है। यह जांच रंजन गोगोई की इस आशंका को लेकर शुरू की गई थी कि इन आरोपों के पीछे ऐसी बड़ी साजिश थी जो कि मुख्य न्यायाधीश के ओहदे के कामकाज को ठप्प करना चाहती थी। सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने गोगोई की इस आशंका पर सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज, ए.के.पटनायक को जांच का जिम्मा सौंपा था जिन्होंने अपनी रिपोर्ट में यह कहा था कि यौन शोषण के आरोपों के पीछे किसी साजिश को नकारा नहीं जा सकता। इस रिपोर्ट के आधार पर अदालत ने यह जांच अब बंद कर दी है। दूसरी तरफ रंजन गोगोई की मातहत जिस अदालती कर्मचारी ने उन पर यौन शोषण का आरोप लगाया था उसे जनवरी 2020 में ही उसके पद पर बहाल कर दिया गया था।

अब सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा फैसले से एक नया सवाल उठ खड़ा होता है। पहले भी रंजन गोगोई के खिलाफ आरोप लगने से लेकर अब तक इस मामले में लाजवाब सवाल लगते आ रहे हैं। जिस पर यौन शोषण के आरोप लगे, वह खुद मामले में जज बन बैठा। इसके बाद की अदालती कार्रवाई पर देश के तमाम लोगों को संदेह रहा और उसकी साख को शून्य माना गया। फिर जस्टिस पटनायक ने एक सदस्यीय जांच की और बिना किसी नतीजे के ‘आशंका को नकारा नहीं जा सकता’ पर बात खत्म कर दी, उसके साथ ही साजिश की आशंका और आरोप की जांच खत्म हो गई।

सवाल यह उठता है कि एक महिला के लगाए गए ऐसे आरोपों के बाद या तो किसी को सजा मिलनी थी, और अगर उसके आरोप सही नहीं थे, तो उसे नौकरी पर बहाली के बजाय खुद सजा मिलनी थी। लेकिन ये दोनों ही बातें नहीं हुईं। आरोपों से घिरे रंजन गोगोई ने जो आशंका जाहिर की, उसकी यौन शोषण कानून के मुताबिक तो कोई कीमत होनी नहीं चाहिए थी, लेकिन फिर भी उस पर इतनी ऊंची एक जांच कमेटी बैठा दी गई, और बेनतीजा जांच के बाद उस मामले को बंद कर दिया गया। तो सवाल यह उठता है कि इतने गंभीर आरोपों के बाद इतने बरस की कार्रवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने किसे इंसाफ दिया? उसने क्या कार्रवाई की? किसे सजा मिली?

यह पूरा मामला पहले दिन से ही बहुत ही खराब तरीके से चलते आ रहा है। सुप्रीम कोर्ट में देश के कानून और अदालत की परंपरा दोनों के खिलाफ जाकर रंजन गोगोई की अगुवाई में जजों की बेंच ने गोगोई पर यौन शोषण के आरोप सुने, इसे गलत करार देने वाले बड़े-बड़े वकीलों की एक न सुनी, और इस दलदल से रंजन गोगोई के कई फैसलों से गुजरते हुए राज्यसभा तक पहुंचने का रास्ता भी बनाया। यह एक मामला इस देश में ताकतवर लोगों और कमजोर-गरीबों के कानूनी हकों के बीच एक खाई खोद गया, और सुप्रीम कोर्ट की साख को भी चौपट कर गया। इससे एक यह नजीर भी कायम हुई कि यौन शोषण के आरोप लगने पर कोई भी व्यक्ति अपने काम को अस्थिर करने, ठप्प करने, की साजिश का आरोप लगा सकते हैं। जब किसी मंत्री या सांसद पर, किसी बड़े अफसर या अखबार के संपादक पर यौन शोषण के आरोप लगते हैं, तो वे भी अब यह आड़ ले सकते हैं कि उनके काम को ठप्प करने की साजिश के तहत ऐसे आरोप लगाए जा रहे हैं। अंग्रेजी अखबार टेलीग्राफ के संपादक रहते हुए एम.जे.अकबर पर दर्जन या दर्जनों महिलाओं ने यौन शोषण के जो आरोप लगाए हैं, उनसे बचाव के लिए अकबर का भी यह तर्क हो सकता है कि टेलीग्राफ अखबार को ठप्प करने के लिए उन पर ऐसे आरोप लगाए गए। ऐसे तर्क पर सुप्रीम कोर्ट का अब क्या रूख रहेगा? क्या देश के कानून में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का काम किसी एक दुकानदार के लिए उसकी दुकान के काम से अधिक महत्वपूर्ण है? किसी संपादक के लिए उसके अखबार के काम से अधिक महत्वपूर्ण है? कानून तो किसी एक ओहदे पर बैठे इंसान को दूसरे नागरिक के मुकाबले अधिक महत्व का ऐसा कोई दर्जा देता नहीं है, फिर ऐसे में रंजन गोगोई के बचाव की तमाम तरकीबों का इस्तेमाल यौन शोषण के दूसरे मामलों में दूसरे लोग अपने बचाव में क्यों नहीं करेंगे? सुप्रीम कोर्ट ने अपने मुखिया को यौन शोषण के आरोपों से बचाने के लिए जो-जो किया दिखता है, वह न सिर्फ अभूतपूर्व है, बल्कि अदालती साख को खत्म करने वाला भी है।

साख एक ऐसा शब्द है जिसका कोई ठोस पैमाना नहीं हो सकता। हमें सुप्रीम कोर्ट की साख जिस तरह सूझती है, हो सकता है आज खुद सुप्रीम कोर्ट को अपनी साख की उस तरह की फिक्र न रह गई हो। इस मामले में शुरू से लेकर अब तक सुप्रीम कोर्ट की हर कार्रवाई से हमें हिन्दुस्तानी न्यायपालिका की साख चौपट होते दिखी है, लेकिन हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट को अपने काम से अपना कोई नुकसान होते न दिख रहा हो। इसलिए हो सकता है कि आज हम सुप्रीम कोर्ट की साख की फिक्र उसके जजों के मुकाबले अधिक कर रहे हैं, और उसके जजों को हमारी इस फिक्र पर आपत्ति भी हो सकती है। ऐसा नहीं है कि किसी देश में सुप्रीम कोर्ट ही वहां के आखिरी फैसले लिखता है। किसी लोकतंत्र में अदालती सोच और कार्रवाई पर भी इतिहास दर्ज होता है। हिन्दुस्तान में रंजन गोगोई से जुड़े इस पूरे लंबे सिलसिले, यौन शोषण के आरोपों से लेकर राज्यसभा की सदस्यता तक का सफर इतिहास में बहुत ही रद्दी साख की शक्ल में दर्ज होना तय है। जब देश की सरकार और देश की अदालत, और संसद में विशाल बाहुबल का रूख ऐसे विवादों में बिल्कुल एक हो जाए, तो बाकी देश कर भी क्या सकता है?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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