नफरत नहीं प्यार चुनिए..

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वैलेंटाइन्स डे की पूर्व संध्या पर स्टैंडअप कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी ने यू ट्यूब पर एक वीडियो के जरिए अपने मन की बात रखी। उन्होंने कहा कि ‘पहले लोग इंटरनेट पर दोस्त बनाने आते थे और अब लोग दुश्मन बनाने आते हैं। ऐसे दुश्मन जो आपको जानते तक नहीं हैं। हम ये क्यों भूल गए हैं कि इंटरनेट सूचना और मनोरंजन के लिए है। अगर हम किसी चीज को बैन करना चाहते हैं तो इंटरनेट पर हो रही नफरत को हम बैन क्यों नहीं करते। लोग बिना सोचे-समझे घंटों-घंटों बहस करते हैं, लड़ते हैं, गालियां देते हैं, हम ऐसा क्यों कर रहे? हम इंटरनेट का सही इस्तेमाल क्यों नहीं कर सकते?’ इंटरनेट के इस्तेमाल को लेकर बहुत गहरी बात मुनव्वर ने कही है।

गौरतलब है कि मुनव्वर को इस साल जनवरी के शुरुआती दिनों में हिंदू देवी देवताओं और गृहमंत्री अमित शाह के अपमान के आरोप में मध्यप्रदेश पुलिस ने हिरासत में लिया था। हालांकि पुलिस को कोई वीडियो नहीं मिला, जिसमें मुनव्वर ऐसा करते नजर आए। मात्र एक शिकायत पर उन्हें कई दिनों तक जेल में रखा गया। उन्हें सेशन कोर्ट और हाईकोर्ट से जमानत भी नहीं मिली, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 6 फरवरी को उन्हें जमानत दी और फिर नाटकीय तरीके से उनकी रिहाई हुई। एक ऐसा मजाक जो कभी किया ही नहीं गया, उसके लिए मुनव्वर की आजादी के अधिकार का हनन हुआ।

लेकिन इसके बावजूद मुनव्वर नफरत मिटाने की ही अपील समाज से कर रहे हैं। उन्होंने जो भुगता है, उसके बाद मन में कड़वाहट लाए बिना मुनव्वर कहते हैं- इस भेड़चाल का कोई भी शिकार हो सकता है। मैं शिकार तो नहीं हुआ। मुझे तो सिर्फ खरोंच आई और वो भी उस चीज की वजह से, जो मैंने की तक नहीं थी। किसी की सियासत से किसी की ज़िंदगी बर्बाद हो सकती है। मैंने कभी नहीं चाहा कि किसी का दिल दुखा दूं। मैंने लोगों को हंसाना चुना है। देश के युवाओं को मुनव्वर की इन बातों को गौर से सुनना और समझना चाहिए। जब समाज हमें नफरत के लिए तैयार करने लगता है, तो इसका मतलब हमारे दिलों से प्रेम, सद्भाव, करुणा जैसे भावों को खत्म करने की साजिश चल रही है। इसलिए वैलेन्टाइन्स डे जैसे दिनों पर नैतिकता के ठेकेदार प्रेमी जोड़ों पर नफरत के चाबुक चलाते हैं।

10-12 साल पहले वैलेन्टाइन्स डे पर एसएमएस से संदेश प्रसारित होते थे कि 14 फरवरी को भगत सिंह को फांसी हुई थी, लेकिन इस दिन को पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव में हम मोहब्बत के दिन के रूप में मनाते हैं। झूठ का यह बुलबुला कुछ बरस लोगों को झांसा देता रहा। हकीकत ये है कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी 23 मार्च को दी गई थी। शहीदे आजम भगत सिंह के नाम पर झूठा राष्ट्रवाद थोपा जा रहा था। 

अब कुछ बरसों में वैलेन्टाइन्स डे को मातृ-पितृ दिवस के रूप में मनाने का आह्वान किया जाने लगा है। गोया प्रेम दिवस मनाने से मां-बाप के प्रति प्यार में कोई कमी आ जाती है। दरअसल राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति के नाम पर एक झूठा विमर्श खड़ा कर दिया गया है। बात-बात में हिंदुत्व के लिए खतरा बताया जाने लगा है। किसी फिल्म का दृश्य, किसी गीत के बोल, कोई कलाकृति, कोई उपन्यास, किसी से भी हमारी संस्कृति को इस तरह खतरा बताया जाता है, मानो सारी दुनिया अपने काम छोड़, केवल हमारे धर्म और आस्थाओं को चोट पहुंचाने की साजिशें कर रही है। और मजे की बात ये है कि इस हिंदुस्तान में जहां दुनिया भर से लोग आए और फिर यहीं के हो कर रह गए, तब भी हमारी संस्कृति, परंपराएं, धर्म सब सदियों से बचे रहे। अब जबकि हम आजाद हैं, हमारा संविधान है, हिंदुस्तान के लोगों द्वारा चुनी गई सरकार है, तब अचानक धर्म पर इतना खतरा क्यों महसूस होने लगा है, यह विचारणीय प्रश्न है।

क्या यह सब इसलिए नहीं है कि धर्म के नाम पर डर पैदा करने से राज चलाने में आसानी होती है। डरा कर सत्ता हासिल करने की सियासत पुरानी है, बस अब उसका तरीका बदला हुआ है। अब हमें डर के साथ, नफरत करने का मोहरा भी बनाया जा रहा है। जो धर्म, जाति, धन-दौलत, सामाजिक हैसियत, राजनैतिक विचारों में हमारे जैसा नहीं है, उन सबसे नफरत करो, यही आज के युवाओं को बतलाया जा रहा है। वक्त के साथ-साथ नफरत का भार बढ़ता जाएगा, तब हम खुल कर सांस लेने के लिए प्रेम भरा आकाश तलाशेंगे। इसलिए बेहतर यही होगा कि आज से हर उस चीज से बचें, जो हमें नफरत का पाठ पढ़ाती है। हमारे अंदर के इंसान को मारकर हमें हिंसा करने वाली कठपुतली बनाती है।

(देशबंधु)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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