जहां मीडिया के डेढ़ सौ छात्रों में से सिर्फ एक की तमन्ना है ‘पत्रकार’ बनने की

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मेरठ बाइपास पर एक मीडिया कॉलेज है इंडियन फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट। तमाम इंजीनियरिंग, मेडिकल और आईटी कॉलेजों की भीड़ में कुछ अलग सा और छात्र भी ऐसे जिन्हें विद्यार्थी की बजाय ‘जुनूनी’ कहना ज्यादा उपयुक्त होगा। खास बात यह है कि इन छात्रों में अधिकतर मीडिया की भेड़चाल से अलग कुछ नया करने की उत्कंठा है और उनकी यही भावना उन्हें नए मुकाम पर पहुंचा रही है।

इस कॉलेज के छात्रों ने अपना कोर्स पूरा किया तो विजय तेंदुलकर के नाटक ‘खामोश अदालत जारी है’ का मंचन किया। नाटक देखने दिल्ली से कुछ मीडिया वालों को बुलाया गया था तो उसमें मुझे भी शामिल रखा गया था। बच्चों के पहली बार स्टेज पर उतरने और उनके उत्तर भारतीय उच्चारण के बीच इस मराठी नाटक का मंचन सशक्त नहीं तो सराहनीय अवश्य कहा जा सकता था। नाटक देखने आए कई लोगों का मानना था कि अगर ये बच्चे इस शो को दिल्ली के किसी थियेटर में प्रदर्शित करते तो उनकी मंडली को तालियों के साथ-साथ टिकट के पैसों का इनाम भी मिलता।

वैसे तो इस महाविद्यालय को एक ज्वेलर घराने ने इलेक्ट्रॉनिक न्यूज मीडिया की चकाचौंध भरी दुनिया से प्रभावित होकर ही शुरु किया था, लेकिन जब प्रबंधकों को महसूस हुआ कि इसमें बच्चों का भला होने की बजाय बुरा ही हो जाएगा तो उन्होंने अपनी दिशा में कुछ बदलाव कर डाला। इंस्टीट्यूट के एक निदेशक विपुल सिंघल के मुताबिक कॉलेज के शिक्षकों ने उन्हें बताया कि न्यूज मडिया के दर्जनों संस्थान और चैनलों के अपने कॉलेज ऐसे उम्मीदवारों की भीड़ पैदा कर रहे हैं जो प्रशिक्षित मीडियाकर्मियों की बेरोजगारी में ही इज़ाफा करेंगे। ऐसे में उन्होंने अपने छात्रों को कुछ नया सिखाने का फैसला किया।

संस्थान में अपने जमाने के मशहूर हास्य अभिनेता और भारतीय फिल्म प्रशिक्षण संस्थान के पूर्व डीन पेंटल को नाटक विभाग का अध्यक्ष बनाया गया है। रेमो डांस विभाग के अध्यक्ष हैं। इंस्टीट्यूट के ब्रॉशर में रज़ा मुराद, राकेश बेदी, मौशुमी उदेशी, सौरभ शुक्ला और सागर सरहदी जैसे नाम विजिटिंग फैकल्टी के तौर पर लिखे हैं। हालांकि इन बड़े नामों की मौजूदगी हमेशा नहीं रहती, लेकिन कॉलेज की अपनी फैकल्टी भी प्रभावशाली लगी। सबसे खास बात यह पता लगी कि संस्थान के लगभग डेढ़ सौ छात्रों में से सिर्फ एक की तमन्ना ‘पत्रकार’ बनने की है। साफ है, क्रियेटिव होते हुए भी उनमें समाज को अपनी उंगलियों पर नचाने की लालसा नहीं है। कई अपने मकसद में कामयाब भी हो रहे हैं। इंस्टीट्यूट की मुख्य कार्यकारी अधिकारी तनूजा शंकर बताती हैं कि पिछले साल के पास आउट छात्रों में से कइयों को बड़े बैनर की फिल्मों और टीवी सीरियलों में भी चांस मिल चुका है।

अभिनेताओं और निर्देशकों के अलावा इंस्टीट्यूट उम्दा स्तर के तकनीशियन भी पैदा कर रहा है। प्रबंधकों का दावा है कि छात्रों को कैमरा, लाइटिंग और एडिटिंग आदि की विस्तृत जानकारी दी जाती है। हालांकि छात्रों को नब्बे हजार जैसी कम फीस में करोड़ों के उपकरणों पर प्रैक्टिकल का अनुभव मिलता होगा, इसकी उम्मीद कम ही दिखी, लेकिन अगर कोई इस दिशा में सोच भी रहा है तो जान कर अच्छा लगा। कम से कम मीडिया और मिशन के नम पर नई प्रतिभाओं का शोषण तो नहीं होगा.. और न पत्रकारिता के नाम पर ब्लैकमेलिंग, दलाली या फिर दूसरे गोरखधंधे।  मेरा तो मानना है कि राजधानी दिल्ली और इसके आस-पास इस तरह के दो-चार और संस्थान हों जो मीडिया का प्रशिक्षण देने के बावजूद अपने छात्रों में ऐसा जज्बा भरे कि उनमें ‘पत्रकार’ बनने की इच्छा न पैदा हो। कम से कम आने वाली पीढ़ियों की रचनात्मकता को एक सही दिशा तो मिल पाएगी।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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