मजबूत प्लेयर बनने की शर्त..

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सोमवार को राज्यसभा में आंदोलनजीवी शब्द से देश को नई बहस में उलझाने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बुधवार को लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद भाषण दिया। और इस बार भी मुद्दों पर साफ-साफ बात न कर शब्दजाल बुनते हुए प्रधानमंत्री नजर आए।

शायद प.बंगाल चुनाव को ध्यान में रखते हुए उन्होंने विवेकानंद को उद्धृत किया कि हर राष्ट्र के पास एक संदेश होता है, जो उसे पहुंचाना होता है, हर राष्ट्र का एक मिशन होता है, जो उसे हासिल करना होता है, हर राष्ट्र की एक नियति होती है, जिसे वो प्राप्त करता है। पता नहीं मोदीजी भारत से कौन सा संदेश दुनिया को देना चाहते हैं या भारत को किस नियति तक पहुंचाना चाहते हैं। क्योंकि वे जो कह रहे हैं और जो कर रहे हैं, उसमें जमीन-आसमान का अंतर दिखाई दे रहा है।

राज्यसभा में उन्होंने एफडीआई का नया मतलब दिया फ़ॉरेन डिस्ट्रक्टिव आईडियोलॉजी और इससे बचने की सलाह दी थी। जबकि लोकसभा में वे उत्तर कोरोना काल में दुनिया में बदलते संबंधों पर बात कर रहे थे और ये समझा रहे थे कि भारत एक कोने में कटकर नहीं रह सकता। हमें मजबूत प्लेयर बनकर उभरना होगा। दुनिया में लोकतंत्र और मानवाधिकारों के हक में बोलने वालों पर पलटवार करके क्या हम मजबूत प्लेयर बन सकते हैं, या मोदीजी ने इसके लिए भी कोई रणनीति तैयार की है।

राज्यसभा में आंदोलनजीवी शब्द कहकर उन्होंने लोकतांत्रिक तरीके से विरोध कर रहे लोगों का मजाक उड़ाया था, जबकि लोकसभा में ये वह बता रहे थे कि लोकतंत्र हमारी सांसों, हमारी रगों में बसा हुआ है। अगर वाकई ऐसा है तो फिर मोदी सरकार में सवाल पूछने वालों पर कार्रवाइयां क्यों हो रही हैं, क्यों आवाज उठाने वालों पर कानून का बेजा इस्तेमाल हो रहा है, क्यों लोकतांत्रिक रैंकिंग में हम पिछड़ते जा रहे हैं।

राज्यसभा में प्रधानमंत्री इस बात को आनंददायक बता रहे थे कि कम से कम सांसद उन पर अपनी खीझ उतार सकते हैं, लेकिन लोकसभा में कांग्रेस के हंगामे पर वे कुपित होकर अधीर रंजन चौधरी से कहते हैं कि अब ज्यादा हो रहा है। अपनी बात पर जरा सा व्यवधान प्रधानमंत्री को बर्दाश्त नहीं हो पा रहा और वे चाहते हैं कि जनता उनके फैसलों को किसी भी हाल में बर्दाश्त करे, बस कोई सवाल न करे।

कृषि कानूनों को काले कानून कहने पर प्रधानमंत्री का कहना है कि कांग्रेस रंग छोड़े और कानून के प्रावधानों पर चर्चा करे। क्या यह चर्चा सरकार को संसद में कानून पारित करवाने से पहले नहीं करना चाहिए थी।

अगर पर्याप्त चर्चा के साथ विपक्ष द्वारा दिए गए सुझावों और संशोधनों के साथ, कृषि अर्थशास्त्रियों और किसान संगठनों से बातचीत के बाद कानून बनते तो आज देश में ऐसे हालात नहीं बनते कि जगह-जगह किसानों को महापंचायत करनी पड़ती या ढाई महीनों तक आंदोलन करना पड़ता।

प्रधानमंत्री ने कोरोना काल और उसके बाद के हालात को लेकर देश की सुनहरी तस्वीर लोकसभा में पेश की। उनके मुताबिक कोरोना काल में सरकार ने करोड़ो लोगों को आर्थिक मदद की, राशन पहुंचाया और ये सब आधार, जनधन योजना आदि के कारण संभव हुआ। वे इसके लिए उन लोगों की खिंचाई करते नजर आए, जिन्हें आधार की अनिवार्यता पर आपत्ति है।

लेकिन वे बड़ी चालाकी से कुछ बातों को छोड़ गए, जैसे लाखों प्रवासी मजदूर पैदल अपने घर जाने को मजबूर हुए। सरकार ने कुछ अर्थशास्त्रियों की इस सलाह को अनसुना किया कि गरीबों की जेब में सीधे नकद डाला जाए।

जिस मनरेगा को वे यूपीए सरकार का बनाया गड्ढा बताते थे, उससे कोरोना काल में कितनी मदद मिली। कैसे कम से कम दो करोड़ लोग इसलिए बेरोजगार हो गए, क्योंकि सरकार ने अचानक लॉकडाउन का ऐलान किया। अब मोदीजी कह रहे हैं कि देश में गाड़ियों की रिकार्ड सेल हो रही है, जीएसटी का रिकार्ड कलेक्शन हो रहा है, ये आंकड़े अर्थव्यवस्था में जोश भर रहे हैं।

उन्हें ये भी बताना चाहिए कि ये कौन सी अर्थव्यवस्था है, जिसमें देश की संपत्ति का निजीकरण कर जोश भरा जाता है। देश की जीडीपी माइनस में चली गई, उसका नुकसान सरकार क्या बेचकर पूरा कर रही है।

2047 में आजादी के सौ साल होने पर देश कहां होगा, इसका संकल्प लेने का काम इस परिसर का है, यह प्रधानमंत्री ने कहा। क्या यह बेहतर नहीं होता कि वे आजादी के शताब्दी समारोह की तैयारी करने से पहले यह देखते कि जिस परिसर यानी संसद में खड़े होकर चुनावी भाषण जैसी बातें कर रहे हैं, वहां इस वक्त नागरिकों के हितों और उनकी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए कितने ईमानदार प्रयास हो रहे हैं। कथनी और करनी के फर्क को यह सरकार मिटा ले तो वाकई हम मजबूत प्लेयर बन जाएंगे।

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