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कृषि कानूनों पर जनमत संग्रह का विचार खतरनाक..

कृषि कानूनों पर जनमत संग्रह का विचार खतरनाक..

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-शकील अख्तर॥

रघु ठाकुर इतने छोटे नेता नहीं हैं कि उनकी बात को ऐसे ही दरगुजर किया जाए। समाजवादी विचार के प्रमुख चेहरे रहे हैं। हाल ही में उन्होंने तीन कृषि कानूनों पर जनमत संग्रह का सुझाव दिया है। अभी सरकार और भाजपा ने इसे लपका नहीं है मगर गिमिक्स ( शाब्दिक जादुगरी) से जल्दी प्रभावित हो जाने वाले भोले समाजवादी इस विचार पर झूम उठे।
1967 के लोहिया के गैर कांग्रेसवाद आंदेलन जिससे जनसंघ को सबसे ज्यादा राजनीतिक लाभ मिला से लेकर जार्ज फर्नांडिस के गुजरात दंगों तक का समर्थन भाजपा और संघ परिवार के लिए बुस्टर डॉज साबित हुए। समाजवादी दोस्त इन बातों से दुःखी हो जाते है। जिस विचार, नेतृत्व के साथ उन्होंने अपनी जवानी लगाई उस पर उठने वाले सवाल उन्हें विचलित कर देते हैं। यहां यह बताना अप्रसांगिक नहीं होगा कि हम जब भी 1967 के अंग्रेजी हटाओ आंदोलन से हिन्दी बेल्ट के विद्यार्थियों को हुए बड़े नुकसान, 1977 के मोहभंग, मधु लिमये की चेतावनियों पर लिखते हैं तो अपने ईमानदार विश्वास को लिए लड़ने वाले समाजवादी मित्र नाराज हो जाते हैं। मगर हमें बुरा नहीं लगता। हां, अफसोस जरूर होता है। इस बात का कि वे चीजों पर पुनर्विचार करने को तैयार नहीं हो पाते। दुविधा से मुक्ति मुश्किल है। और तब और ज्यादा जब आपने अपनी जिन्दगी का बड़ा हिस्सा उन्हीं विश्वासों की जीते हुए बिताया हो।
खैर, तो अगर कृषि कानूनों पर जनमत संग्रह हो जाए तो किसान आंदोलन को कितने वोट मिलेंगे? जो माहौल अभी किसानों को पक्ष में दिखाई दे रहा है वह तिरोहित हो जाएगा। मीडिया दोगुनी ताकत से और व्हाट्सएप किसानों को देशद्रोही से आगे पापी, अपराधी, समाज तोड़क जाने क्या क्या बताने लगेगा। नरेटिव सेट करने में कोई मोदी जी से मुकाबला कर सकता है? जब देश में हर हर महादेव के बदले हर हर मोदी का जयकारा चलाया जा सकता है तो कुछ भी हो सकता है! जनमत संग्रह को मतलब होगा कि देश में एक ऐसा माहौल बना देना जहां सफेद और काले, सत्य और असत्य का भेद ही मिट जाए। प्रचार तंत्र में क्या किसान, सरकार और भाजपा के आईटी सेल से जीत पाएंगे? पासंग भर भी मुकाबला नहीं कर पाएंगे। देश इस समय जिस नशे में डूबा हुआ है वह और गहरा हो जाएगा।
साथ ही दूसरी बात, यह शब्द हमें, भारत को सूट ही नहीं करता। भारत के लिए जनमत संग्रह कश्मीर से जुड़ा हुआ है। जिसे भारत हर बार ठुकरा चुका है। जनमत संग्रह की बात यूएन में पाकिस्तान करता है। कश्मीर में अलगाववादी करते हैं। मगर भारत नहीं।
शब्द अपने आप में बहुत महत्व रखते हैं। चाहे अनायास कह दिए गए हों, या जानबुझकर। ताकतवर लोग या कहें मेन्युप्लेट करने की क्षमता रखने वाले लोग उसका फायदा उठा लेते हैं। अन्ना आंदोलन में एक शब्द आया लोकपाल! ऐसा प्रचार किया गया कि लगा कि सभ्यता और शासन व्यवस्था के इतिहास में इससे बड़ा कोई विचार ही नहीं है। बच्चे बच्चे की जबान पर लोकपाल। आज कहां है लोकपाल? वह अपना काम कर गया। पहले दिल्ली की और फिर देश की सरकार बदल
गया। यह एक कामयाब शब्द रहा।
ऐसा ही एक उदाहरण और जो बुरी तरह फ्लाफ रहा। आरटीआई। जब यूपीए सरकार इसको लाई तो सबसे ज्यादा उसी के खिलाफ इसका उपयोग हुआ। आरटीआई एक्टिविस्ट नाम की नई प्रजाति पैदा हो गई। कई पत्रकार इसके नाम पर अंतरराष्ट्रीय फैलोशिप और पुरस्कार ले आए। मगर आज आरटीआई के नाम पर आप एक कागज नहीं निकलवा सकते। यूपीए सरकार के खिलाफ वह एक्ट काम करता था। मगर आज नहीं।
राजनीति में ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं जब आपका बनाया हुआ कानून, आइडिया ही आपको नुकसान कर जाए। आमतौर ऐसी चीजें अति आदर्शवाद के तहत ही बनाई जाती हैं और सत्ता आपके हाथ से फिसलते ही वह पलटवार करने लगती है। नोटा ऐसा ही कानून है। जो अब गैर भाजपा दलों को नुकसान पहुंचा रहा है। भाजपा को वोट डालने जाने वाले आज कन्फ्यूज नहीं हैं। वे सीधा बटन दबाते हैं। मगर गैर भाजपा दलों को वोट देने वालों के मन में मीडिया कैंपेन ने इतने संदेह पैदा कर दिए हैं कि वे नोटा को भी विकल्प के तौर पर देखते हैं।
उदाहरणों की कमी नहीं हैं कि कैसे कांग्रेस उन विचारों, कार्यक्रमों को लागू करती है जिसके लिए परिस्थितियां पूरी तरह तैयार नहीं होतीं। और कांग्रेस की सरकार जाते ही वे उसी को नुकसान करने लगती हैं। ईवीएम सबसे बड़ी मिसाल है। कांग्रेस इसके खिलाफ बोलती है। प्रस्ताव भी पास किया। मगर अब कुछ करने की स्थिति में नहीं है। इसी तरह लोकसभा और राज्यसभा के दो दो नए चैनल खोलना। सरकार का करोड़ों रुपया खर्च हुआ। और निष्पक्षता के नाम पर उसी के खिलाफ दिखाया जाता था। और अब तो खैर दिखाया ही जा रहा है।
दोनों चैनलों में बड़ी तादाद में कांग्रेसी नेताओं ने गैर कांग्रेसियों और संघ के लोगों को भर्ती किया। यही हाल दूरदर्शन का था। हालत यह थी कि यूपीए चेयर परसन सोनिया गांधी का लाइव प्रोग्राम भी नहीं दिखाया जाता था। एक बार रायबरेली उनके लोकसभा क्षेत्र का प्रोग्राम जब नहीं चला। और किसी ने पूछा तो बताया गया कि तार छोटा था इसलिए नहीं दिखा पाए। दस साल में पांच सूचना प्रसारण मंत्री रहे। और जिन लोगों को वे दूरदर्शन पर प्रमोट करते रहे ये वे लोग थे जिन्हें वाजपेयी सरकार लाई थी। यूपीए सरकार जाते ही इन्हीं लोगों ने लिखकर कांग्रेस के मंत्रियों का मजाक उड़ाया कि कैसे
वे लोग सिर्फ खुद का प्रचार चाहते थे। सरकार का और उसके कार्यक्रमों और नीतियों का नहीं।
तो कमजोर, अकुशल और कन्प्यूजड आदमी अपनी ही तलवार से घाव खाता है। कांग्रेस ने भी खाए और अभी ये रघु ठाकुर किसानों की हिमायत करते हुए उनके आंदोलन को वैसी ही चोट पहुंचाना चाहते हैं। जनमत संग्रह किसान को और कोने में धकेल देगा। उस पर होने वाले हमलों को बढ़ा देगा। जरूरत इस बात की थी कि किसान के पक्ष को कैसे मजबूत किया जाए। इस बात की नहीं कि किसान मुद्दे को कैसे डायवर्ट किया जाए। जनमत संग्रह बहुत खतरनाक विचार है।
जैसा कि शुरू में उपर लिखा अंग्रेजी हटाओ आंदोलन की तरह। अंग्रेजी तो हटी नहीं और मजबूत हो गई। मगर उत्तर भारत की एक पूरी पीढ़ी अंग्रेजी में कमजोर हो गई। यहां यह बताना दिलचस्प होगा कि आजादी के बाद जवान हो रही पहली पीढ़ी अंग्रेजी में बेहतर थी। लेकिन दूसरी पीढ़ी आंदोलन के प्रभाव में अंग्रेजी से दुश्मनी कर बैठी। फिर आई तीसरी पीढ़ी जो आज जवान है और भारत का नाम दुनिया भर में रोशन कर रही है कि अंग्रेजी में महारत है। विदेशों में पहली पीढ़ी के बाद इस तीसरी पीढ़ी ने ही मेडिकल, आईटी, बिजनेस, प्रबंधन में अपनी काबिलियत की तूती बुलवाई। हमने उत्तर भारत के
कई मध्यम वर्गीय परिवारों में दादा पोते की अंग्रेजी में मजेदार गुफ्तगु सुनी है। जिसमें 67 के आंदोलन की मार खाया हुआ बाप अपनी टूटी फूटी अंग्रेजी में शामिल होने की कोशिश करता है

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