क्या कलमाड़ी, राजा, कनिमोझी और सिब्बल भी हो सकते हैं टीम अन्ना में शामिल?

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-सतीश चंद्र मिश्र।।

देश में सक्रिय रिश्वतखोरों, घोटालेबाजों,जालसाजों,आर्थिक अपराधियों को इन दिनों अपने फुलप्रूफ बचाव एक नया और अचूक मन्त्र मिल गया है. स्वयम को “जनलोकपाल बिल” का समर्थक घोषित करते ही ऐसे लोगों को उनके द्वारा किये गए हर पाप से मुक्त मान लेने की एक सामाजिक राजनीतिक परम्परा को जन्म देने के कुटिल प्रयास जोर शोर से प्रारम्भ हो चुके हैं.

इसी का परिणाम है कि राष्ट्रीय पुरस्कार कोटे से खुद को मिलने वाली 75% सरकारी रियायत की आड़ में किरण बेदी ने अपनी हवाई यात्रा के लिए 5733 रुपये का टिकट खरीदने के बाद उसी हवाई यात्रा के टिकट खर्च के रूप में फर्जी बिल बनाकर 29181 रुपये वसूले, ऐसी ही अन्य यात्रा प्रकरणों में फर्जी बिलों के सहारे कभी 17134 रुपये के टिकट के लिए 73117 रुपये वसूले तो कभी 14097 रुपये के टिकट लिए 42109 रुपये वसूले. अपनी यात्राओं से सम्बन्धित किरण बेदी का ये फर्जीवाड़ा पिछले कई वर्षों से चल रहा था और ऐसे एक दर्जन उदाहरणों की सूची तो उसी अख़बार ने प्रकाशित की, जिसने किरण के इस फर्जीवाड़े को उजागर किया है.

दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ उजागर हुई अपनी इस करतूत से किरण बेदी मुकर तो नहीं सकीं किन्तु अपना बचाव ये कह कर किया कि मैं वसूली गयी ज्यादा धनराशि को क्योंकि अपने ही NGO को दान करती रहीं हूँ इसलिए इसमें कुछ भी गलत नहीं है और ये मेरा होम इकोनॉमिक्स है. किरण बेदी ने अपनी सफाई में यह भी कहा कि ,क्योंकि  हम जनलोकपाल बिल के लिए आन्दोलन कर रहे हैं इसलिए सरकार हमें बदनाम करने के लिए ऐसे हथकंडे इस्तेमाल कर रही है. किरण बेदी की यह सफाई कई प्रश्नों को जन्म देती है. क्या पिछले कई वर्षों से वो अपनी हवाई यात्राओं का फर्जीवाड़ा सरकार के कहने पर कर रही थी.? क्या उनके फर्जी यात्रा बिल उनको सरकार बनवा कर देती थी…? क्या उनकी तथाकथित “होम इकोनामिक्स” का सिद्धांत सरकार द्वारा बनाया और लागू करवाया गया था…?

और सबसे बड़ा सवाल तो ये कि CWG घोटाले के महाखलनायक सुरेश कलमाडी यदि यह कहें कि उन्होंने 1400 से 2000 गुणा अधिक तक के मूल्य पर खरीदी गयी वस्तुओं की खरीददारीं में की गयी जालसाजी के कारण खुद को मिले लाभ की रकम अपने ही एक NGO को दान कर दी है तो क्या इस तर्क के आधार पर सुरेश कलमाडी को निर्दोष मान लिया जाना चाहिए…? इसके अतिरिक्त किरण बेदी के पक्ष में टीम अन्ना और उसके भक्त कुछ न्यूज चैनलों द्वारा यह तर्क भी दिया जा रहा है कि किरण बेदी की हवाई यात्राओं के बिल के फर्जीवाड़े में सारा लेनदेन बैंकों के चेकों के द्वारा किया गया है अतः इसको भ्रष्टाचार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. यह कुतर्क देते समय टीम अन्ना और उसके भक्त कुछ न्यूज़ चैनल यह क्यों भूल गए की सारे सरकारी सौदों और ठेकों में समस्त भुगतान सरकारी चेकों के माध्यम से ही किया जाता है, तो क्या यह मान लिया जाए कि उनमें किसी प्रकार के भ्रष्टाचार कि कोई संभावना होती ही नहीं है…? इसके अतिरिक्त पुलिस की नौकरी के दौरान किरण बेदी को मिले वीरता पदक के कारण उनको उनकी हवाई यात्राओं, रेल यात्राओं में मिलने वाली 75 % की छूट क्या  इसलिए दी जाती रही है कि वो उसकी कीमत फर्जी बिल बनाकर दूसरों से वसूलें.?

इसी प्रकार टीम अन्ना के एक दूसरे महारथी अरविन्द केजरीवाल हैं. ये महाशय उन पर बकाया लाखों रुपये की सरकारी रकम केवल इसलिए नहीं चुकाना चाहते क्योंकि वो खुद को “जनलोकपाल बिल” के सबसे बड़े झंडाबरदारों में से एक मानते हैं. उस बकाये को लेकर खुद को दी जाने वाली हर कानूनी नोटिस को अरविन्द केजरीवाल अब यह कहकर नकार रहे हैं की “जनलोकपाल बिल” की उनकी मांग के कारण सरकार उनको परेशान करने के लिए ऎसी नोटिस भिजवा रही है. जबकि सच ये है की 2007 में खुद केजरीवाल बाकायदा पत्र लिखकर अपने ऊपर बकाये की बात तथा उस बकाये को नहीं चुकाने का दोषी भी स्वयम को मानते हुए सरकार से उस बकाये को माफ़ करने की प्रार्थना भी कर चुके हैं. लेकिन  सरकार ने उनकी मांग को असंवैधानिक करार देते हुए उसी समय अस्वीकार कर दिया था. तब 2007 में अरविन्द केजरीवाल किस जनलोकपाल की कौन सी लड़ाई लड़ रहे थे.? उल्लेखनीय है की इस समयावधि के दौरान मैग्सेसे पुरस्कार समेत कई अन्य पुरस्कारों के रूप में केजरीवाल लगभग 30 लाख रुपये की राशी प्राप्त कर उसे अपने ही NGO को दान में दिया गया दिखा चुके हैं लेकिन सरकारी बकाये के लिए खुद के पास पैसा नहीं होने का रोना सार्वजनिक रूप से रोते हुए उस बकाये को नहीं चुकाने की जिद्द पर अड़े हुए हैं.

इसी प्रकार शत-प्रतिशत वेतन लेने के बावजूद अपनी नौकरी से महीनों से गायब, अपने अध्यापन कार्य के दायित्व एवं कर्तव्य का केवल दस से बीस प्रतिशत तक निर्वहन करने वाला एक भ्रष्ट शिक्षक इन दिनों भ्रष्टाचार की “मुख़ालफत” का नकाब पहन के ईमानदारी का सबसे ऊंचा झंडा लेकर कर घूम रहा है और टीम अन्ना के मंच से ईमानदारी, नैतिकता के पाठ सिखाने वाले धुआंधार भाषण भी दे रहा है …!!! टीम अन्ना की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का प्रवक्ता भी बना हुआ है. अपनी नेतागिरी के चक्कर में सैकड़ों निर्दोष छात्रों के भविष्य से निर्मम खिलवाड़ करने के भ्रष्टाचार से सम्बन्धित यह मामला उन “गलेबाज़” कवि कुमार विश्वास का है जो चुटकुलों और जुमलों की चटनी के साथ सतही रोमांटिक कविताओं की सस्ती चाट के मंचीय “गवैय्या” है और इन दिनों सैकड़ों छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करते हुए अन्ना टीम के भाषणबाज़ प्रवक्ता बनकर घूम रहे है और अपने इन हथकंडों पर उठ रही उँगलियों को केवल इसलिए सरकारी साज़िश बता रहे हैं क्योंकि ये महाशय खुद को “जनलोकपाल बिल” आन्दोलन का झंडाबरदार मानते हैं.

उल्लेखनीय है कि इस से पहले शांति भूषण-प्रशांत भूषण से सम्बन्धित ज़जों कि “सेटिंग” की बात वाली सही सिद्ध हो चुकी CD तथा नोयडा में माया सरकार से कौड़ियों के मोल मिले करोड़ों के भूखंडों और करोड़ों के भूराजस्व की चोरी की बात को भी इसी प्रकार जनलोकपाल आन्दोलन की दुहाई देकर उन पर धूल  झोंक देने के कुटिल प्रयास किये गए थे.

आखिर टीम अन्ना किस प्रकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने दोहरे चेहरे चरित्र और चाल वाली ये कैसी लड़ाई लड़ रही है…???  इन दिनों अपने भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए जिस तरह का कुतर्क टीम अन्ना के दिग्गज और उसके भक्त दे रहें हैं. उसके चलते उनको अपने जनलोकपाल बिल में ये भी नियम बनवा देना चाहिए कि यदि कोई घूसखोर,चोर,लुटेरा, या किसी भी अन्य प्रकार का कोई आर्थिक अपराध करने वाला व्यक्ति यदि NGO बना कर अपने भ्रष्टाचार से की गयी अवैध कमाई उसमे जमा करता हो तथा खुद को टीम अन्ना के जनलोकपाली ड्रामे का समर्थक घोषित करता हो तो उसको अपराधी नहीं माना जायेगा एवं उसको पकड़ने वाले, गिरफ्तार करने वाले अधिकारी कर्मचारी को ही कठोर दंड दिया जाएगा……!!!

मेरा तो यह मानना है कि अपने इन नैतिक मानदंडों के चलते निकट भविष्य में टीम अन्ना को कलमाडी, राजा, कनिमोझी, चिदम्बरम, सिब्बल, लालू, मायावती, मारन और अमर सिंह को भी जनलोकपाल की कोर कमेटी में शामिल करवाने का प्रयास करना चाहिए. क्योंकि दो चोरों में कोई अंतर नहीं होता भले ही उन दोनों में से एक हीरा चोर हो और दूसरा खीरा चोर ही क्यों ना हो. क्योंकि बात अवसर की होती है, जिसे हीरा चुराने का मौका मिलता है वो हीरा चुरा लेता है और जिसे खीरा चुराने का मौका मिलता है वो खीरा चुरा लेता है. होते दोनों ही चोर हैं और एक सी ही मानसिकता और एक सी ही प्रकृति एवं प्रवत्ति के मालिक होते हैं.

वर्तमान यूपीए/कांग्रेस सरकार की तुलना में कई गुणा अधिक भ्रष्ट एवं सशक्त इंदिरा सरकार के खिलाफ 1974 में जयप्रकाश नारायण ने जब निर्णायक जनयुद्ध प्रारम्भ किया था तब लाख कोशिशों और अनेकों अराजक हथकंडों के बावजूद इंदिरा गाँधी और उनकी निरंकुश सरकार जयप्रकाश नारायण तथा उनके प्रमुख साथी-सहयोगियों के खिलाफ किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार का कोई आरोप तक नहीं लगा सकी थी अंततः इंदिरा ने उनको विदेशी ताकतों का एजेंट बताकर जेल के सींखचों के पीछे पहुंचा दिया था.

याद यह भी दिला दूं कि जयप्रकाश नारायण ने तत्कालीन इंदिरा सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन करने के लिए उसी सरकार से आन्दोलन करने की अनुमति, आन्दोलन करने के लिए सुविधाजनक स्थान दरी, दवाई, सफाई, पानी और बिजली की सुचारू व्यवस्था की मांग नहीं की थी. सरकार और उसकी पुलिस से चिट्ठी लिखकर बार बार ये आश्वासन नहीं माँगा था कि उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाएगा (अन्ना के रामलीला मजमें के लिए ये सारे हथकंडे अपनाये गए थे). इसकी बजाय दो से ढाई वर्षों तक कारागर के सींखचों के पीछे भयंकर यातनाएं भोगकर जयप्रकाश नारायण और उनके साथी सहयोगियों ने अपने जनसंघर्ष को निर्णायक बिंदु तक पहुँचाया था. आज अभी 6 महीने भी नहीं बीते हैं और स्थिति यह है की अन्ना टीम का हर सदस्य दस्तावेजी सबूतों के साथ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरा नज़र आ रहा है. अतः अन्ना हजारे और उनकी जन-लोकपाल मुहिम की तुलना जयप्रकाश नारायण एवं उनके कालजयी आन्दोलन से करने वालों को अपनी तुलना की समीक्षा गंभीरता पूर्वक करनी चाहिए.

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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14 thoughts on “क्या कलमाड़ी, राजा, कनिमोझी और सिब्बल भी हो सकते हैं टीम अन्ना में शामिल?

  1. .if small thiefs exposes big thiefs is it not good ? I think if all thiefs expose each other then public will know all thiefs & will decide who should go to parliamentAssemblies

  2. क्या तुम मीडिया वाले कभी रिश्वत नहीं लेते, क्या तुम्हे सब कुछ ऊटपटांग बोलने का हक है, आज तुम सबसे ज्यादा भ्रस्ट हो, जो की टीम अन्ना क खिलाफ तुम्हारी लेखनी से स्पष्ट दिख रहा है..इसका मतलब कांग्रेस जो भी खिलवाड़ देश क साथ कर रही है उसे करने दिया जाये..?? क्या जिसने थोडा बहुत भी हेर फेर किया उसे सबसे बड़े घोटालेबाजों के खिलाफ और देश हित में कुछ भी कहने और करने का हक नहीं है..??

  3. ये लोग अब जन्लोक्पल को ठिकाने लगाने के लिए चाल चल रहे हैं . देश इन्हें माकूल जवाब देगा.

  4. इसका मतलब ये हुआ की भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाने के लिए और भ्रष्टाचारी को पकडवाने के लिए साफसुथरी छबि का होना और उसके बाद उन भ्रष्टाचारियों के द्वारा उसका टेस्ट लिया जाना जरूरी है जैसे पहले अन्ना का टेस्ट लिया गया जब उनके पास कुछ नहीं मिला तो माफ़ी मांग ली फिर अन्य लोगों को की टेस्टिग चल रही है अगर इस तरह की टेस्टिंग चलेगी तो आने वाले सौ साल में भी कोई एसा नहीं मिलेगा जो बिलकुल इमानदार हो क्योंकि
    इस भ्रष्टाचार के पर्दूषण ने सब को कम से कम खीरा की चोरी तो सिखा ही रखी है तो आखीर में यही होगा की भ्रष्टाचारी यही कहेंगे की हम तो नहीं सुधरेंगे लेकिन इस म्रत्यु लोक में किसी भी चीज का अंत जरूर है तब चाहे पृथ्वी पर भगवान् को ही क्यों न अबतरित होना पड़े

  5. खली भ्रटाचार की बात करनेवाला हर आदमी कही भी किसी भी समाज सेवी संस्था में सनिल हो सकता है सिर्फ बात करनी है जनता को समझने या परखने का वक्त कहा है वि तो पीछे चलनेवाली है उसका काम है यही बस इससे ज्यादा की आशा मत रखना यहाँ सभी लोग इमानदार है पकड़ गया वो चोर

  6. यह जो लिखने वाला है तू सबसे बड़ा गूसखोर है तू बता तुझे कितने पैसे मिले

  7. I think you are govt. paid writer.What will you say about kapil sibbal,digvijay singh and all those corrupt,ohh i forgot Sonia Gandhi and his xxxxxxx son rahul Gandhi.If they are too innocent and don’t even have 1 paisa from this corruption, then why don’t they bring all black money stashed in Swiss bank. Sonia Gandhi and her team is giving license to Italian banks and swiss bank to establish their banks in India like East India Company.Can you give me a name of any middle class or upper class who are not corrupt and want to open their bank account in these banks??? nop….you won’t because there is no such name. People here in india don’t have money to open account in deshi banks and they are bringing foreign banks here in india. Stop writing such articles and support to a good cause.

  8. इस अन्ना गिरोह के सारे मेम्बरों के कुकर्म एक बाद एक करके उजागर हो रहे हैं.
    ताज्जुब ये है कि इस सबके लिए ये गिरोह सरकार को जिम्मेदार बता रहा है, मानों सारे कुकर्म इस गिरोह ने सरकार के कहने से किये हैं.
    ये उसी तरह की मक्कारी भरी बातें कर रहे हैं जिस तरह 64 सालों तक कांग्रेस हर समस्या हर संकट के लिए, अपनी असफलताओं के लिए विदेशी ताकतों और पाकिस्तानी हाथ को जिम्मेदार बताकर देश की आँखों में 64 सालों से धुल झोंक रही है. ये अन्ना गिरोह भी कांग्रेसी मुर्गों कि ही तरह कुकड़ू कूँ करता नज़र आने लगा है.

  9. ये जितने सरकारी कर्मचारी हैं इनको नौकरी से रिटायर होने के बाद या नौकरी छोड़ने के बाद ही “ईमानदारी चालीसा” का पाठ करने कि क्यों सूझती है.
    इस किरण बेदी ने अपनी तीस साल की नौकरी में कितने घूसखोर पुलिस वालों को पकड़वा कर जेल भेजा है, सजा दिलवायी है …? इसका उत्तर शून्य है.
    क्या इसके समय पुलिस की नौकरी गीता, भागवत रामायण का पाठ करने वाले साधू संत किया करते थे…?
    इसकी जालसाजी का ये पहला किस्सा नहीं है, अपनी बेटी की जाली नागरिकता दिखा कर उत्तर-पूर्व के कोटे से उसका एडमिशन मेडिकल कालेज में करवाने कि इसकी जालसाजी उजागर होने के बाद सारे देश में इसकी थू-थू हुई थी.कुख्यात अंतर्राष्ट्रीय अपराधी हत्यारे चार्ल्स शोभराज पर इसके द्वारा की गयी जरूरत से ज्यादा मेहरबानियों के किस्से देश में खूब चर्चित हुए थे.
    इसी प्रकार 16 साल तक इनकम टैक्स जैसे विभाग में काम करते रहे अरविन्द केजरीवाल ने उस दौरान कितने भ्रष्ट नेताओं, अधिकारीयों, व्यापारियों और उद्योगपतियों को देश के सामने बेनकाब कर सज़ा दिलवाई…? इसका भी उत्तर शून्य है.
    अपने विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार और उसके जिम्मेदार अधिकारीयों, कर्मचारियों के खिलाफ ये केजरीवाल 16 सालों तक तब क्यों नहीं बोला…? पिछले कुछ सालों में NGO के गोरखधंधे के लिए अमेरिका से मिली बेशुमार दौलत के बाद इसको अचानक इमानदारी के बेतहाशा दौरे क्यों पड़ने लगे….? ये पूरी टीम अन्ना ठगों और जालसाजों का एक गिरोह है. इस गिरोह को इसी तरह बेनकाब करते रहिये आपको बधाई.

  10. सतीश जी,बिलकुल ठीक बेनकाब किया है इनको. ये सब NGO के गोरखधंधे के ज़रिये गरीबों के नाम पर मिलने वाले देशी विदेशी दान की रकम तक हड़प कर लेते हैं. लेकिन पूरे देश को ईमानदारी का पाठ पढ़ाने का ढोंग भी करते हैं.
    आपने ठीक लिखा है , इस बात से मै भी सहमत हूँ और मेरा मानना है कि राष्ट्रीय पुरस्कार की बिक्री कर के, जाली बिल बनाकर चौगुनी पांच गुनी रकम वसूलने वाली किरण बेदी अगर राजा या कलमाडी की कुर्सी पर होती तो उनको भी मात दे देती.
    जब जरा सा मौका मिलते ही दस-बीस हज़ार की बेईमानी उसने बेशर्मी के साथ कर डाली तो बड़ी रकम का मौका मिलते ही ये तो राजा और कलमाडी से भी बड़ा कमाल चुटकियों में दिखा देती

  11. आप के कुछ तथ्य सही हो सकते है पर आप की भाषा से पता चल रहा है की आप सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में पत्रकारिता कर रहे है . कृपया भ्रस्टाचार और काले धन को ही सबसे बड़ा मुद्दा बना रहने दे , हीरा चोर और खीर चोर दोनों के समान सजा नहीं दी जा सकती .

  12. चलिए मान लेते है की ये सब गलत है लेकिन इन्होने जो मुद्दा उठाया है उस बारे में आप क्या कहेंगे?
    इनपर कानून को अपना कम करने दीजिये ,जन्लोकपाल पर भी आगे काम होते रहने दीजिये.
    इससे मुख्य मुद्दा भटक न जाये.

    1. अरे भैया तुम्हारा कहना राईट है पर बात है की किरण बेदी जी और अरविन्द जी पर ये मामले पहले क्यों नहीं उजागर किये जब इन्होने कोई अच्छी मुहीम छेड़ी तब ही लोग इनके पीछे पड़े है क्यों ये सब पहेले भी तो हो सकता था ANNAJI के आन्दोलन से पहले भी और जिन लोगो की तुम बात कर रहे हो ये लोग पहले किसी अच्छे आन्दोलन से नहीं जुड़े है जो सरकार ने इनपर कार्य WAHI की है इन सब पर कार्य वही घोटाले मीडिया में आने के बाद हुई है जिन सब का सरकार को पता था इसलिए इन बैमानो को इनके साथ जोड़ना अच्हा नहीं HAI

      1. अशोक जाट, ये केजरीवाल और किरण बेदी कितने लम्बे समय से जालसाजी का जाल बिछाये हैं इसकी सख्ती से जांच होनी चाहिए, ना कि आपके अनुसार उनकी जालसाजी को इसलिए अनदेखा कर देना चाहिए क्योंकि वो अभी तक पकड़े नहीं गए. ये तर्क तो कुछ ऐसा ही है जैसे कोई जेबकतरा जेब काट के भाग निकलने के कुछ दिनों बाद पकड़े जाने पर यह दलील दे कि क्योंकि मुझको उस समय नहीं पकड़ा गया था इसलिए मुझको अब पकड़ा जाना गैरकानूनी है.

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