किसान आंदोलन अभी चलेगा, जानिए क्यों.?

Sanjaya Kumar Singh
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-संजय कुमार सिंह॥
किसान आंदोलन से निपटने का सरकारी तरीका शुरू से ही गलत रहा है। अव्वल तो इस सरकार को आंदोलनों से निपटने का कोई अनुभव नहीं था और शुरू में जो घिसे-पिटे, जाने-पहचाने, टू मच डेमोक्रेसी वाले उपाय किए गए उससे यह आंदोलन बहुत बड़ा था। इसमें कोई दो राय नहीं है कि आंदोलन की गंभीरता या विशालता को लेकर सरकार को गलत जानकारी थी। इसके कई कारण हो सकते हैं। सबसे पहले तो यही संभावना है कि नीचे के स्तर पर सही जानकारी हो और जहां से कार्रवाई का निर्णय होता है वहां तक सही जानकारी किसी कारण से नहीं पहुंची हो या ना पहुंचाई गई हो। यह भी संभव है कि सर्वोच्च स्तर पर जानने की जरूरत ही नहीं समझी गई हो और (गोदी) मीडिया की रिपोर्ट पर यकीन किया जा रहा हो। कारण कुछ भी हो, जानकारी सही नहीं होने का यकीन 26 जनवरी को हो गया।
उसके बाद सरकार की प्रतिक्रिया सरकार जैसी नहीं, गुस्साए सांड़ जैसी हुई। इसमें दीप सिद्धू दिखा ही नहीं। इसका अलग नुकसान हुआ और बाद में उसपर ईनाम घोषित करना पड़ा लेकिन उससे ना कोई फायदा होना है ना कोई नुकसान होगा। मुझे नहीं लगता कि वह कोमल शर्मा से अलग जाएगा। जब जाएगा जब उसके बारे में सोचा जाएगा। फिलहाल तो यही कि सरकार को जब लगा कि किसान कानून को समर्थन है तो उससे निपटने की बजाय बदला लेने जैसी कार्रवाई शुरू की गई। इसके तहत बहुत सारे अलग-अलग, नामुमकिन को मुमकिन और आत्मनिर्भर होने जैसे काम किए गए। बहुतों का उल्टा असर हुआ और सबसे बड़ा असर यह हुआ कि इसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान सक्रिय हुए। राकेश टिकैत एक बड़े (सरकार विरोधी) नेता के रूप में उभरे।
राजनीति में कौन किसके लिए बैटिंग कर रहा है इसे समझना मुश्किल नहीं होता है लेकिन इसपर अटकल नहीं लगाना चाहिए। कुछ दिन में चीजें बिल्कुल साफ हो जाती हैं। चाहे वह 56 ईंची सीने का दावा हो या विदेश में रखे काले धन को वापस लाने का और उससे हर किसी को 15 लाख रुपए मिलने का। इसलिए, अभी मैं मुख्य मुद्दे पर ही रहूंगा कि किसान आंदोलन का केंद्र हरियाणा से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आ गया है। कोई भी समूह अलग नहीं हुआ है यह ज्यादा बड़ी बात है और पंजाब, हरियाणा के किसान जुड़े हुए हैं यह दूसरी बड़ी बात है। कार्रवाई इस तथ्य के आलोक में होनी चाहिए पर सरकार की अपनी जिद्द है। इसे आप उसकी राजनीति या आत्मविश्वास भी मान सकते हैं। ऐसे में यह मानना कि इसे दबाया जा सकता है – गलत है। पर यही दिखाई दे रहा है। मुझे लगता है कि इसका कारण उत्तर प्रदेश का चुनाव है। जिस ढंग से आंदोलनकारियों को घेरा गया है, गोदी मीडिया के बावजूद खबरें आना रोकने के लिए स्वतंत्र पत्रकारों को डराया, धमकाया, प्रतिबंधित और नियंत्रित किया गया है। उससे लगता है कि तैयार इस आंदोलन को बिना खबर चलने देने की है।
सरकार उत्तर प्रदेश चुनाव में इसका संभावित असर टटोलेगी। इसे अपने फायदे में करने की कोशिश करेगी और इसमें समय लगेगा। कोशिशें नाकाम हो सकती हैं, चालें गलत हो सकती हैं। इसलिए इस आंदोलन को लंबा चलने देने की तैयारी हो रही है। इससे विरोध की ताकत का भी अंदाजा लगेगा। इंटरनेट बंद करके, पत्रकारों का पहुंचना रोक कर, विदेशियों के ट्वीट पर परेशान होकर सरकार यही बता रही है कि वह चाहती है कि किसान थक जाएं। इस बीच उनकी नाराजगी का राजनीतिक नुकसान उत्तर प्रदेश में देख लिया जाए फिर सोचा जाएगा। प्रचारकों की सरकार अपने पक्ष में हवा बनाना जानती है। भक्त मीडिया और ट्रोल के साथ मिलकर किसी भी चीज को पक्ष में मोड़ने की कला लाजवाब है। इसलिए सरकार को फिलहाल इससे परेशानी नहीं है। खत्म करने की जल्दी नहीं है। इंतजाम यही है कि खबरें न छपें, चर्चा न हो।
सीमा पर इंटरनेट बंद रहने से परेशानी कितनी होगी और जनता उसे कैसे-कितना झेलेगी यह भविष्य बताएगा। पर यह तो साफ है कि इंटरनेट के लिए जनता की नाराजगी को किसानों पर मोड़ दिया जाएगा। नुकसान की परवाह न समर्थकों को है और ना सरकार को। इंटरनेट बंद रहने पर सीएनएन की खबर और रिहाना तथा दूसरी हस्तियों के ट्वीट को मैं उस स्तर पर देखता हूं। लेकिन यहां ऐसा है नहीं। अगर हुआ तो बदली स्थिति में देखा जाएगा। फिलहाल एक कॉल की दूरी और कीलों का सच यही है कि किसान अगर आंदोलन लंबा चलाने के लिए तैयार हैं तो सरकार झेलने के लिए तैयारी कर रही है। अपने लोगों से विरोध करवाने और बदनाम करने की कोशिशों की पोल खुल गई है। इसलिए थोड़ा समय चाहिए।

About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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