“सबसे पहले” के प्रयोग के बाद 91.6% प्रभावी टीके का “संयोग”

Sanjaya Kumar Singh
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-संजय कुमार सिंह॥
आत्मनिर्भर होने की कोशिश में लगे भारत ने कोविड-19 का टीका सबसे पहले बनाने के चक्कर में जो प्रयोग किया और संयोग से जो मौतें हुईं उसके बावजूद रूसी स्पूतनिक V लगभग तैयार है और आज हिन्दुस्तान टाइम्स में इससे संबंधित खबर पहले पन्ने पर है। खबर का शीर्षक है, रूस का स्पूतनिक V टीका 91.6 प्रतिशत प्रभावी है। यह दावा कोई ऐसे ही नहीं कर दिया गया बल्कि दुनिया के सबसे पुराने और सबसे सम्मानित मेडिकल जर्नल्स में से एक, द लैनसेंट ने स्पूतनिक V के तीसरे चरण के चिकित्सीय परीक्षण के अंतरिम विश्लेषण के परिणाम छापे हैं जो टीके की उच्च कार्यकुशलता और सुरक्षा की पुष्टि करता है। बहुत संभावना है कि यह प्रतिशत परीक्षण से संबंधित स्थितियों में हो और वास्तविक स्थिति में या भविष्य में यह और बेहतर हो। फिलहाल, स्पूतनिक V दुनिया के तीन वैक्सीन्स में से एक है जिसकी कार्यकुशलता 90 प्रतिशत से ज्यादा है।

स्पूतनिक V से संबंधित प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, यह जाने-पहचाने ह्युमन एडनोवायरल वेक्टर्स प्लैटफॉर्म पर आधारित है और कोरोनावायरस के खिलाफ पहला पंजीकृत वैक्सीन है। हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर छपी इस खबर के अनुसार, स्पूतनिक V का निर्माण भारत में भी किया जा रहा है। भारत में किए जा रहे परीक्षण भी अच्छी तरह चल रहे हैं। कल जारी इससे संबंधित विज्ञप्ति के अनुसार इस विश्लेषण में 19,866 स्वयंसेवकों से संबंधित आंकड़े शामिल थे जिन्हें स्पूतनिक V वैक्सीन या प्लेसबो की पहली और दूसरी खुराक दी गई थी और यह तब की बात है जब अंतिम नियंत्रण बिन्दु कोविड-19 के 78 पुष्ट मामलों पर था। 60 साल से ऊपर के 2144 बुजुर्ग स्वयंसेवकों के समूह में कार्यकुशलता 91.8 प्रतिशत थी और सांख्यिकी के लिहाज से 18-60 वर्ष वाले समूह से अलग नहीं थी। विश्लेषण किए गए मामलों में 98 प्रतिशत से ज्यादा स्वयंसेवकों में ह्यूमोरल इम्युन रेसपांस और 100 प्रतिशत में सेल्यूलर इम्युन रेसपांस का विकास हो गया।

स्पूतनिक V का टीका लगवा चुके स्वयंसेवकों में वायरस को बेअसर (न्यूट्रलाइज) करने वाले एंटीबॉडीज का स्तर कोविड-19 से ठीक होने वाले मरीजों के मुकाबले 1.3-1.5 गुना ज्यादा है। ज्यादातर प्रतिकूल घटनाएं (94%) हल्की थीं और इनमें फ्लू जैसे सिनड्रोम, टीके वाली जगह पर प्रतिक्रिया, सिरदर्द और शक्तिहीनता शामिल है। दावा किया गया है कि टीकाकरण से संबंधित कोई गंभीर प्रतिकूल प्रभाव नहीं हुआ। इसकी पुष्टि डाटा निगरानी करने वाली स्वतंत्र समिति ने की। भारत में टीका लगवाने वालों की मौत तक हो चुकी है। हालांकि मामले को रफा-दफा कर दिया गया और मौत का दूसरा कारण बता दिया गया। भले ही आम लोग इससे सहमत न हों।


जहां तक भारत का सवाल है, देश में महामारी की आशंका हुई तो सरकार को इलाज और लोगों को उसके प्रभाव से बचाने की व्यवस्था करनी थी। इसके लिए योजना बनाना और धन जुटाना सबसे प्रमुख काम था। सरकार ने पहले तो संकट को स्वीकार ही नहीं किया और फिर अचानक बंदी की घोषणा कर दी। आपदा राहत कोष बनाने की बजाय गैर सरकारी पीएम केयर्स बनाया जो पहले से मौजूद प्रधानमंत्री राहत कोष के समानांतर है। सरकार की ओर से आपदा से लड़ने के लिए कितना धन दिया गया यह जाने बगैर परिवहन और यातायात सुविधा बंद होने से लोग सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर हुए। उन्हें रोकने का कोई इंतजाम नहीं था और पुलिसिया डंडे खाकर भी लोग इधर-उधर जाते रहे। व्यवस्था और योजना के नाम पर कुछ नहीं था।


कल्पनातीत अराजकता और पीएम केयर्स के नाम पर भारी वसूली की धक्कमपेल जिस महामारी के कारण हुई उससे बचाव के लिए टीके के नाम पर अब राजनीति चल रही है। और सबसे पहले टीका पेश करके आत्मनिर्भर भारत का प्रचार चल रहा है। प्रचारकों की यह रणनीति चाहे जितनी कामयाबी पा ले सच्चाई यह है कि पूरी तरह परीक्षित और कायदे-कानूनों का पालन करके तैयार किया गया टीका दुनिया के बाजार में आने ही वाला है पर हम सबसे पहले या सबसे आगे के नाम पर तमाम कायदे कानूनों को नजरअंदाज कर रहे हैं। भारत जैसे गरीब देश में इस नए वायरस का टीका खोजने का कोई मतलब नहीं था। बन जाने के बाद हम हमेशा खरीद सकते थे।


टीका बनाना लंबा, महंगा और अनुभव का काम है। दवाइयां जल्दबाजी में नहीं बनती हैं और बनाने की कोशिशों का फायदा कम, नुकसान ज्यादा होगा और दवाइयां बन जाने के बाद दूसरे देश उसका फायदा उठाएंगे। हम दवाई बन जाने और सफल होने के बाद खरीद सकते थे और हम अपने लोगों की जान जोखिम में डालकर दवाई बनाने का प्रयोग कर सकते थे। हमने दूसरा विकल्प चुना है। इसका कोई लाभ नहीं है तब भी। वह भी तब जब टीबी, मलेरिया, डेंगू जैसी बीमारियों से देश में हर साल सैकड़ों लोग मरते हैं। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में एनसेफ्लाइटिस से हर साल सैकड़ों बच्चे मरते हैं। गोरखपुर के बाद बिहार में लगभग ऐसी ही बीमारी की खबर थी। जिसे चमकी कहा जाता है। इनसे बचाव के उपाय नहीं हैं। पर सरकार कोरोना का टीका बनवा रही है। आप इसे ठीक मानिए या सही, जरूरी मानिए या गैर जरूरी तथ्य यह है कि इस टीके के लिए अंतरराष्ट्रीय कायदे कानूनों को ताक पर रख दिया गया है। परीक्षण से पहले प्रयोग की अनुमति दे दी गई है।

About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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