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टीम अन्ना का महिमामंडन करने वाली मीडिया अब अपने ही मायाजाल में फंस गई है। कुछ ही दिनों पहले जिस मीडिया ने इस मंडली के हर सदस्य की किसी भी कमी को नजरंदाज कर सर-आंखों पर बिठा लिया था उसे अब अपनी गलती का अहसास होने लगा है। लेकिन लगता है इस अहसास के लिए भी देर हो चुकी है क्योंकि जिसे एक बार खुदा बना दिया जाए उसकी बंदगी न करने वाले को तो क़ाफिर ही कहा जाता है। ऐसा ही कुछ हो रहा है अंग्रेजी के प्रतिष्ठित दैनिक इंडियन एक्सप्रेस के साथ भी, जिसने अन्ना की प्रमुख सलाहकार किरण बेदी की पोल क्या खोली, खुद ही आलोचना का केद्र बन गया।

फेसबुक और ट्विटर के अलावे पर इस अखबार की दशकों पुरानी उस विश्वसनीयता की धज्जियां उड़ रही हैं जिसे कायम करने के लिए कभी रामनाथ गोयंका इमरजेंसी और मीसा तक से डट कर मुकाबला करते रहे। इस अखबार ने कभी राजीव गांधी जैसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री की भी बखिया उधेड़ डाली थी और एनडीए शासन के दौरान पेट्रौल पंप घोटाले का राजफाश कर भाजपा और उसके सहयोगी दलों को भी आइना दिखाया था। हालांकि गोयंका और उनका परिवार संघ और भाजपा के करीबी माना जाता रहा है, लेकिन एक्सप्रेस समूह के अखबारों की निष्पक्षता पर इससे कभी कोई फर्क नहीं पड़ा है।

इंडियन एक्सप्रेस को वैसे तो सन् 1931 में कांग्रेस सदस्य वरदराजुलु नायडू ने शुरु किया था, लेकिन 1935 में इसका स्वामित्व गोयंका के हाथों में आ गया था। आजादी की लड़ाई में इस अखबार ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इसके कई संपादक और पत्रकार समाज के अन्य क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा चुके हैं। एक्सप्रेस के एक पूर्व संपादक अरुण शौरी भी अब भाजपा के एक जाने-माने नेता हैं तथा एनडीए शासनकाल में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं, लेकिन उनके विरोधी भी उनकी पत्रकारिता की निष्पक्षता के हमेशा से कायल रहे हैं। संसद में और संसद के बाहर भी कभी अरुण शौरी पार्टी लाइन पर चलने वाले नेता नहीं माने गए।

1991 में गोयंका की मृत्यु के बाद उनके वंशजों और अखबार के निदेशकों में खटपट होने लगी। आखिरकार 1999 में इस समूह का बंटवारा हो गया। इंडियन एक्स्प्रेस के अलावा दोनों समूह कई शहरों से आई टी, व्यापार और अन्य कई विषयों पर इस समूह के एक दर्जन से भी अधिक पत्र-पत्रिकाएं छापते हैं जिनमें एक्सप्रेस का ट्रेडमार्क जुड़ा होता है।  यह अखबार समूह रामनाथ गोयंका अवार्ड भी बांटता है जिसे भारत में पत्रकारिता का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार माना जाता है।

बहरहाल, किरण बेदी और एक्सप्रेस का नाता कभी मधुर नहीं रहा। जब देश की यह पहली महिला आईपीएस अधिकारी मीडिया को अपनी पब्लिसिटी के लिए इस्तेमाल कर अपना भरपूर गुणगान करवाती रही थीं तब भी एक्सप्रेस ने इनके कई कारनामों पर से पर्दा उठाया था। तिहाड़ जेल के अपने बहुचर्चित कार्यकाल में बेदी अपने एनजीओ के जरिए कई सरकारों से फंड लेकर उनका दुरुपयोग करती रही हैं, लेकिन सिर्फ एक्सप्रेस ने ही इसकी तह में जाने की कोशिश की थी। यह इस अखबार की ही रिपोर्टिंग का असर था कि किरण बेदी का फौरन तबादला कर दिया गया था।

लेकिन शायद अन्ना आंदोलन के दौरान यह अखबार भी रौ में बह गया। जब देश की तमाम मीडिया अन्ना के गुण गा रही थी तब इंडियन एक्सप्रेस ने भी अपने स्वभाव के अनुरूप रिपोर्टिंग नहीं की। इसके रिपोर्टरों ने आंदोलन के समर्थन में जुटी भीड़ के कसीदे तो पढ़े, लेकिन इसकी फंडिंग, दूरगामी परिणाम और साथ देने वालों की तह में न जाकर भीड़ के साथ चलने की कोशिश कर डाली। उस वक्त तो थर्ड मीडिया पर सक्रिय अन्ना लॉबी ने इंडियन एक्सप्रेस के लिंक भी खूब प्रचारित किए, लेकिन किरण बेदी का टिकट फ्रॉड मामला सामने आते ही सब के सुर बदल गए।

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By admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

3 thoughts on “कोई बताएगा कि इंडियन एक्सप्रेस कांग्रेस से प्रभावित है या भाजपा से?”
  1. जो काम मीडिया को करना चाहिए था वो कम अन्ना जी ने किये और मीडिया वाले लल्लू क और अमर सिंह क गुग्न्गन करते रहे , क्या किसी मीडिया वाले ने राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी से पुचा हँ क उनके पास पैसा कहा से अत है

  2. सारा मिडिया जगत ही पैसे के पीछे भागने लगा है और अन्ना जैसे महान आदमी को बी बदनाम कर दिया है ,शरम करो मीडिया वालो .
    Indian express paise se parbhavit ha jo usko paisa deta ha ,ye suke hi gungan karti ha , maine aaj se hi es akhbar ko padna chod duga

  3. मेरे भाई मिडिया दरबार आपने बहुत बढ़िया मुद्दा उठाया है…. वो लोग महामूर्ख हैं जो सोचते हैं कि इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबार का पत्रकार दारू शराब की बोतल पर वही छापेगा जो कही जाए। मुझे तो हंसी आती है क्या लगता है 21 वी सदी मे कोई इतना बड़ा गधा होता है क्या की टीम अन्ना जैसे दो टके के इमान वाले की बात सुने….

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