महासेल पर देश या सेल में देश..

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वादों पर थी अपनी जिंदगी,
अब तो वो भी आसरा जाता रहा.!

शायर अजीज लखनवी का ये शेर उन सबके लिए है, जिन्होंने अच्छे दिनों के वादे, हर खाते में 15 लाख, नोटबंदी से कालेधन की वापसी जैसी तमाम बातों को सच मान लिया था और इन्हीं के साथ देश नहीं बिकने दूंगा, के नारे पर भी आंख मूंद कर यकीन किया था। लेकिन जब आंख खुली तो ऐसे क्षेत्र मुश्किल से मिले, जो निजी कंपनियों की भेंट चढ़ने से बच गए हों। शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पेट्रोल, दूरसंचार इन सबका निजीकरण किस चालाकी से किया गया, यह देश ने देखा और अब इसका दायरा बढ़ता जा रहा है।

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का बजट जब संसद में पेश हुआ तो सरकार ने खुलकर निजीकरण का ऐलान किया और जनता को यही यकीन करने कहा जा रहा है कि यह सब विकास को रफ्तार देने के लिए है। जिस तरह त्योहारी सीजन में शॉपिंग मॉल या ऑनलाइन कंपनियां सेल का बंपर ऑफर देती हैं, कुछ उसी अंदाज में मोदी सरकार देश के सार्वजनिक निकायों की सेल बाजार में लगा रही है। इस सेल में आम ग्राहक तो पीछे ही रह जाएगा, केवल धनकुबेरों का मुनाफा होगा। मोदी सरकार का यह बजट किसी नजरिए से आत्मनिर्भर भारत का बजट नहीं लगता, लेकिन सरकार आत्मनिर्भर का झूठ इतनी बार बोल रही है कि जनता उसे सच मानने लग जाए। इस बार कई चुनौतियों के बीच बजट पेश किया गया। कायदे से बजट में उन मुद्दों पर फोकस होना चाहिए था, जिससे पिछले एक साल में बढ़ी परेशानियां कम होतीं।

लेकिन ऐसा न होकर बजट में फिर हवा-हवाई दावे किए गए। रेल योजना 2030 तैयार, अगले 3 सालों में 7 टेक्सटाइल पार्क, स्वच्छ भारत मिशन 2.0 के लिए 1,41,678 करोड़ आबंटित, 2,23,846 करोड़ का स्वास्थ्य बजट, वायु प्रदूषण से निपटने के लिए 2217 करोड़ का आबंटन, सड़क परिवहन मंत्रालय के लिए 1,18,101 करोड़ का अतिरिक्त प्रावधान, ऐसी कई बातें बजट में हैं, जिन्हें पढ़कर लगता है कि कुछ दिनों में भारत में स्विट्जरलैंड की तरह हरियाली और साफ हवा नसीब होगी। विकसित देशों की तरह खुली, चिकनी, चमचमाती सड़कें होंगी, स्वस्थ, हृष्ट-पुष्ट लोग ही नजर आएंगे, पीठ से चिपके पेट वाले कुपोषित लोग दिखेंगे भी नहीं।

लेकिन ये सब कब होगा, इस बारे में बजट कोई आश्वस्ति नहीं देता है। स्वास्थ्य बजट को बढ़ाना तारीफ भरा कदम है, लेकिन असली तारीफ तो तब होगी, जब गांव-कस्बों से लेकर शहरों तक के अस्पतालों में गरीबों को बिना किसी परेशानी के स्वास्थ्य सुविधाएं मिल जाएं। अभी तो हालात ये हैं कि जिसके पास स्वास्थ्य बीमा है, वही बीमार होना झेल सकता है। बीते एक साल में नौकरी गंवा चुके या आधे वेतन पर काम कर रहे लोगों को उम्मीद थी कि सरकार उनके लिए किसी किस्म की राहत लाएगी। लेकिन यहां भी मायूसी हाथ लगी। 

बजट में आयकर के स्लैब में कोई बदलाव नहीं हुआ है, बल्कि एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट सेस की घोषणा कर दी है। जिसके तहत पेट्रोल पर 2.5 रुपए प्रति लीटर और डीजल पर 4 रुपए प्रति लीटर का उपकर लगाया जाएगा। इसके बाद महंगाई बढ़ने की आशंका है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कहना है कि कृषि क्षेत्र को मजबूती देने, किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए इस बजट में बहुत जोर दिया गया है। देश की मंडियों एपीएमसी को मजबूत करने के लिए उन्हें विकसित करने के लिए एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर से मदद का प्रावधान किया गया। जो ये बताते हैं कि इस बजट के दिल में गांव और किसान हैं। अब बजट बनाने वाली तो सरकार है और सरकार के दिल में क्या है, इसका कुछ पता नहीं चल रहा। क्योंकि एक ओर सरकार खुद को किसानों के लिए समर्पित बताती है, मोदीजी कहते हैं कि हम बस एक फोन कॉल की दूरी पर हैं। और उधर दिल्ली की सीमाओं पर 70 दिनों से बैठे किसानों को अब भी अपनी मांगें पूरी होने का इंतजार है।

सरकार अब सीमेंट के अवरोधक बनाने, कंटीले तार लगाने से लेकर सड़कें खोदने और इंटरनेट बंद करने जैसे तमाम उपाय कर रही है कि किसानों तक उनके समर्थक न पहुंचें और साथ ही आम जनता को आवाजाही में तकलीफ हो, तो वह किसान आंदोलन से नाराज हो। ग्रामीण और शहरी भारत के बीच की खाई बढ़ाने में जितने यत्न सरकार कर रही है, उतनी ही कोशिश गरीबी और अमीरी की खाई को पाटने में करती तो आज भारत की तस्वीर बदल जाती। एक ओर विनिवेश से 1.75 लाख करोड़ जुटाने का लक्ष्य, दूसरी ओर बेरोजगारी दूर करने के लिए कोई बड़ी घोषणा का न होना, ये जाहिर करता है कि इस देश के युवाओं, बेरोजगारों, गरीब मजदूर-किसानों और हाशिए पर पड़े लोगों को सरकार ने उनके हाल पर छोड़ दिया है।

(देशबंधु)

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