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अभूतपूर्व बजट पेश करने का दावा कितना सच कितना झूठ..

अभूतपूर्व बजट पेश करने का दावा कितना सच कितना झूठ..

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नागरिक आत्मनिर्भर हो जाएं तो देश आत्मनिर्भर हो ही जाएगा पर हम उल्टा चल रहे हैं.. बिल्कुल बेकार में..

-संजय कुमार सिंह॥
इस बार के बजट की सबसे निराशाजनक बात है कि एमएसएमई और पर्यटन क्षेत्र के लिए इसमें लगभग कुछ नहीं है। कम पैसों में रोजगार सबसे आसानी से इन्हीं दो क्षेत्रों में बनते हैं। देश में बेरोजगारी की जो दशा है उसमें रोजगार के मौके पैदा करना सबसे जरूरी है। सरकार कौशल विकास और अप्रेंटिसशिप ऐक्ट में संशोधन की बात कर रही है वह अपनी जगह जरूरी और सही हो सकता है लेकिन जो आज नौकरी के बिना भूखा मर रहा है वह काम सीखकर नौकरी पा जाएगा इसकी गारंटी कहां है? नौकरियां कम हैं क्योंकि बाजार नहीं है और यह सब एक दूसरे से जुड़ा है। नोटबंदी और जीएसटी के बाद कोरोना के कारण वैश्विक मंदी और भारत में बिना-सोचे समझे लॉक डाउन करने से यह स्थिति बनी है और इससे निपटना आसान नहीं है।

अभूतपूर्व बजट पेश करने का दावा और प्रचारकों के दम पर उसे अभूतपूर्ण साबित करना भी संभव है लेकिन उससे नौकरी नहीं मिलेगी। रोजगार तलाशने वालों को बहुचर्चित पकौड़ा योजना से लेकर टैक्सी चलाने जैसे काम में लगाया जा सकता है और इससे वे कम खर्च में बिना किसी खास कौशल और निवेश के पहले दिन से आत्म निर्भर हो सकते हैं। इसके लिए किसी विशेष कर्ज योजना या पूंजी की आवश्यकता भी नहीं है। आवश्यक प्रोत्साहन से काफी काम हो सकता है। लेकिन इस ओर कोई ध्यान नहीं है। इसी तरह पर्यटन क्षेत्र में ध्यान देकर काफी रोजगार पैदा किया जा सकता है। हांग कांग पर्यटन पर काफी ध्यान दे रहा है पर भारत में ज्यादातर होटल लंबे समय तक बंद रहे और अभी भी खाली चल रहे हैं। इससे जुड़े दूसरे रोजगार धंधे का अनुमान आप लगा सकते हैं।


बजट में बड़े उद्योगों और पैसे वालों का ख्याल तो रखा गया है और कम पढ़े-लिखे लोगों के लिए कौशल विकास तथा अप्रेंटिस कानून में संशोधन जैसी चीजें हैं पर एक कार टैक्सी के रूप में चलाकर भी व्यक्ति अपना परिवार चला सकता है। इसी तरह पकौड़े बेचकर अगर कोई परिवार चलाना चाहे तो यह संभव भले है पर शुरू करना आसान नहीं है। हाल में मैंने लिखा था कि बैंक का खाता खोलने के लिए आधारकार्ड के अलावा कोई और दस्तावेज जरूरी है। 18-20 साल का कोई बेरोजगार अगर कोई धंधा करना चाहे तो पहले मतदाता परिचय पत्र, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस या पासपोर्ट जैसा कोई दस्तावेज बनवाए। कुछ और दस्तावेज मान्य हैं जैसे टेलीफोन या बिजली का बिल लेकिन 18-20 साल के बच्चों के नाम यह सब होना मुश्किल है। इसमें जो समय और खर्च होता है उससे कोई भी हतोत्साहित होगा और खाता नहीं खुलेगा। इसके बिना कोई काम नहीं होगा।


मैंने कार चलाने का उदाहरण दिया। उसका इच्छुक तो ड्राइविंग लाइसेंस बनवा लेगा और उसके लिए जरूरी भी है। लेकिन पकौड़े बेचने के लिए अगर आप दुकान किराए पर लें तो बिजली का कमर्शियल मीटर लगवाना ज्यादा जरूरी है और दूसरे दस्तावेज के बिना शायद खाता ही नहीं खुले। मैं मानकर चल रहा हूं कि भारत में सभी बच्चों के पास आधार कार्ड होगा। अगर इसे जरूरी किया गया है और उपयोगी भी है तो खाता खोलने के लिए पर्याप्त क्यों नहीं है। खाता खोलने से पहले कोई दुकान किराए पर कैसे लेगा, मीटर कैसे लगवाएगा और आवश्यक सामान कैसे खरीदेगा? ठीक है कि सबका उपाय है पर सरकार क्या कर रही है? और जो भी उपाय है सबके लिए पैसे चाहिए। पासपोर्ट या ड्राइविंग लाइसेंस बिना जरूरत सिर्फ पहचान के लिए बनवाने भर पैसा कितने लोगों के पास है? नोटबंदी से अगर कालाधन खत्म हो गया है तो चिन्ता किस बात की है। नहीं हुआ है तो उसके लिए कुछ पश्चाताप जरूरी है न कि आम लोगों को परेशान करना।


नए कारोबारों को एमएसएमई में पंजीकरण कराना भिन्न कारणों से जरूरी है पर आलाम यह है कि वहां करोड़ रुपए के निवेश और पांच करोड़ रुपए के कारोबार की बात होती है जबकि भारत में कई कारोबार कुछ हजार रुपए के निवेश से शुरू हो सकते हैं और कुछ लाख रुपए के कारोबार से न्यूनतम वेतन से ज्यादा कमाई हो सकती है। आम लोगों के लिए यह बेहद सुविधाजनक है और जरूरत इस बात की है कि लोगों को इसके लिए प्रेरित किया जाए, आवश्यक सहायता दी जाए और हर कोई आत्म निर्भर हो सके। पर टिकटॉक जैसे ऐप्प हों या चीनी सस्ते टैबलेट भारत में विकसित करने से क्या फायदा जब आसानी से उपलब्ध हैं। सरकार अपनी राजनीति में लोगों की भावनाओं से खेल रही है और जनता की जरूरतों का उसे अनुमान ही नहीं है। ना जनता से संपर्क है। किसान आंदोलन से निपटने के तरीकों से पता चल रहा है कि यह दूरी और बढ़ रही है।

About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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