क्या हम एक नए वर्ल्ड ऑर्डर की ओर नहीं बढ़ रहे हैं ?

क्या हम एक नए वर्ल्ड ऑर्डर की ओर नहीं बढ़ रहे हैं ?

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-विजय शंकर सिंह॥

जिन्होंने केवल नफरत फैलायी हो, दंगे करवाये हों, लोगों को आपस मे लड़ाया हो, जिनका इतिहास ही फासिज़्म के आका से शुरू हुआ हो, जो जन आंदोलनों में भी अपनी ही जनता को खालिस्तानी कहते हों, जो किसान कम्युनिटी को जाट, गुर्जर, आदि के आलग अलग खानों में बांट देते हों, जो पंजाब हरियाणा की किसान जनता में आपसी फूट डालने के लिए सतलज यमुना नहर योजना की फाइल निकालने में लगे हों, जो सरकार बनाने के लिये खुलेआम बोलिया लगाते रहे हों, जो चीनी घुसपैठ को स्वीकार करने का साहस तक जुटा न पा रहे हों, जो अपनी ही जनता को राजधानी में न आने देने के लिये राजधानी की किलेबंदी कर ले रहे हों, ऐसे लोगो से यदि आप आर्थिक तरक़्की की आस लगाए बैठे हैं तो आप अपनी सोच पर पुनर्विचार करें। इनकी कोई स्पष्ट आर्थिक सोच और दृष्टि नहीं है। कभी रही ही नही है। इनके अधिवेशन का एक भी आर्थिक दस्तावेज हो तो बताएं ? अब जब यह कुछ कर नहीं पा रहे हैं तो विदेशी निवेश जैसे खूबसूरत शब्द, जिसका सीधा अर्थ है, सबकुछ बेच दो, की आड़ में अपनी आर्थिक नीति का बखान करते हैं। आज स्थिति यह है कि एयरपोर्ट, बंदरगाह, सड़क, एलआईसी, बैंक आदि सभी सरकारी प्रतिष्ठान बेचने का निर्णय सरकार ने ले लिया है। निजीकरण भी एक नीति है। पर हर नीति का कुछ न कुछ तार्किक आधार भी होता है। निजीकरण और सब बेच दो का क्या तार्किक आधार है, यह तो सरकार पहले स्पष्ट करे।

कभी कभी मुझे यह भी लगता है कि, हम एक बेहद खतरनाक साज़िश में फंस रहे है, और वह साज़िश है देश की आर्थिक परतंत्रता। इससे निपटने के लिये जिस प्रकार ने निर्भीक और स्टेट्समैन सरीखे नेतृत्व जी ज़रूरत है, वह आज हमारे पास नही है। पिछले 6 साल से हमारी आर्थिक हैसियत गिरती जा रही है। कभी कभी आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक आदि से कुछ उत्साहजनक रेटिंग आ जाती है तो हम बजाय उस पर सवाल उठाने के कि ऐसा कैसे होगा या बेहतर क्यों नही हो रहा है, के बारे में सोचने के, उसी की दुंदुभी बजाने लगते है। वर्ल्ड बैंक हो या आईएमएफ इन दोनों का उद्देश्य देश की आर्थिक तरक़्की है, लेकिन तभी तक जब तक वह आर्थिक तरक़्की उन संस्थाओं की स्वार्थपूर्ति का सांधन बनी रही रहे। एक आत्मनिर्भर भारत दुनिया के किसी भी बड़े देश को चुभता है। एकाधिकारवाद की ओर सतत बढ़ता हुआ पूंजीवाद भारत की आर्थिक प्रगति से यदि अचंभित है तो, वह इसे नियंत्रित भी करना चाहता है। इसीलिए देश मे जानबूझकर ऐसे नैरेटिव गढ़े जाते है कि, सार्वजनिक क्षेत्र अक्षम हैं और उनके बजाय निजी क्षेत्रों को सब कुछ सौंप देना चाहिए। एक समय ऐसी स्थिति आ सकती है कि सरकार के पास कोई काम ही न बचे और वह बस इतनी बेबस हो जाय कि आखिर में पूंजीवादी कॉकस के ही रहमो करम पर आ जाय। कहने के लिये भले ही राजनीतिक सत्ता जनप्रतिनिधियों के हांथ में हों पर वे जनप्रतिनिधि जनता के हांथ में रहेंगे या नहीं, यह नहीं पता। यह एक नयी दुनिया का संकेत है।

हम एक नए वर्ल्ड ऑर्डर की ओर बढ़ रहे है। हम ही नहीं, पूरी दुनिया ही एक नए निज़ाम की ओर अग्रसर है। वह निज़ाम है, पूंजी का अधिक से अधिक केंद्रीकरण और पूंजी के साथ सत्ता का भी अतार्किक केंद्रीकरण। अब कोई मुल्क किसी अन्य देश को साम्राज्यवादी विस्तार की तरह अपना उपनिवेश नहीं बनाएगा। यह समय ई मार्केटिंग का है। अब उपनिवेशवाद का स्वरूप भी बदलेगा और अब जो न्यू वर्ल्ड आर्डर आएगा वह ई उपनिवेशीकरण का होगा। मुझे लग रहा है, एक छोटा लेकिन बेहद ताकतवर और वह भी आर्थिक रूप से ताकतवर समूह, हमारे आप के खाने के मेन्यू से लेकर पढ़ने, सोचने और लिखने के सिस्टम को नियंत्रित करेगा। वह एक दायरा खींच देगा। उसी दायरे में आप को लिखना पढ़ना और सोचना होगा। यदि आप मनमाफिक लिखना पढ़ना चाहेंगे तो वह ऐसा नहीं होने देगा और एक समय ऐसा आ जायेगा कि आप के मेधा की भी उसे ज़रूरत तभी पड़ेगी जब वह अपने उद्देश्य की ओर बढ़ेगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने दस्तक दे दी है। नेट, किंडल, और गूगल ने किताबो को अप्रासंगिक करना शुरू कर दिया है। और यह दुनिया धीरे धीरे चपटी होती जा रही है।

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