देशभक्ति और शहादत की दीवार खड़ी कर उसके पीछे छुपाए गए संविधान का दिन!

देशभक्ति और शहादत की दीवार खड़ी कर उसके पीछे छुपाए गए संविधान का दिन!

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-सुनील कुमार॥
गणतंत्र दिवस पर देश में महीनों से चल रहे किसान आंदोलन का तनाव तो दोपहर बाद शुरू हुआ, लेकिन इसके पहले के एक-दो दिनों से देश आजादी और देशभक्ति के गानों में डूबा हुआ था। इन दिनों टीवी के अनगिनत चैनलों पर दर्जनों रियलिटी शो चलते हैं, जो कैलेंडर के मौसम को देखकर लोगों की भावनाओं पर अपनी उंगलियां धरते हैं। टीवी के कई कार्यक्रम रिटायर्ड फौजियों से भरे हुए थे, जिनकी जंग की हसरत पंचतत्वों में विलीन हो जाने के बाद भी कायम रहेगी। दूसरी तरफ गणतंत्र दिवस पर सम्मान के नाम पर मौजूदा फौजियों को स्टूडियो में बिठाकर सम्मान किया गया, और उनकी बहादुरी या शहदत की कहानियां दोहराकर टीवी के दर्शकों को खासा रूलाया भी गया। यह मौका गणतंत्र दिवस का था, जिस दिन देश का संविधान लागू हुआ था, न कि जिस दिन देश आजाद हुआ था। लेकिन किसी भी राष्ट्रीय पर्व को युद्धोन्माद, देशभक्ति, और समर्पण से जोडऩे की जो संस्कृति पैर मजबूत जमा चुकी है, वहां हर मौके पर फौज और शहादत का महिमामंडन करने में लग जाती है। इसमें कोई दिक्कत नहीं है सिवाय इसके कि बहादुरी की कहानियों और आंसुओं के बीच एक रूखा-सूखा शब्द, संविधान, खो जाता है।

अगर निशाना टीआरपी न होता, दर्शक संख्या बढ़ाने की अर्नबी फिक्र न होती, तो शायद गणतंत्र दिवस पर अमल किए गए संविधान पर भी कुछ चर्चा हो सकती थी। लेकिन देश में आज न सिर्फ टीवी-मीडिया, बल्कि सत्ता के कब्जे की कमाल और संस्थाओं की नीयत संविधान को फर्श पर पड़े बाकी कचरे के साथ बुहारकर पड़ोसी के घर के सामने फेंक देने की रहे, तो फिर संविधान पर चर्चा ही क्यों छेड़ी जाए? फिर यह तो बहुत खतरनाक बवाल की बात है कि संविधान पर चर्चा होगी तो फिर यह भी बात होगी कि इस देश में वह किस कदर नाकामयाब हो चुका है, ताकतों ने उसे किस हद तक खारिज कर दिया है। नाकामयाबी की बातों से भी भला कहीं टीआरपी बढ़ती है? न चैनल की बढ़ती, न ही मुल्क की सरकार की। इसलिए यह कोई मासूम चूक नहीं थी कि संविधान लागू होने के दिन फिर तो झंडे से जोड़ा गया, डंडे से तोड़ा गया, सरहदों पर दुश्मन से खतरे से जोड़ा गया, लेकिन संविधान से नहीं जोड़ा गया। इस दिन को किसानों को बदनाम करने के लिए तो इस्तेमाल किया गया, लेकिन संविधान को श्रद्धांजलि देने के लिए नहीं किया गया। वोटों की मंडी में तिजारत करने वाले बड़े धूर्त होते हैं, और वे जानते हैं कि जलते-सुलगते मुद्दों को किस तरह किनारे धकेला जा सकता है। वे देशभक्ति के नाच-गाने से लेकर, बदन का कोई हिस्सा खो चुके किसी फौजी की बहादुरी तक का इस्तेमाल कर लेते हैं, लेकिन देश में कहां-कहां संविधान को कुचला जा रहा है, किन तबकों के संवैधानिक अधिकार छीने जा रहे हैं, उस तक कल्पना को नहीं आने दिया जाता।

जिन तबकों को संविधान ने कुचलने के सिवाय और कुछ नहीं किया है, उन तबकोंं को यह दिन नजरों से उसी तरह दूर रखना चाहता है जिस तरह अहमदाबाद के फुटपाथी बेघरों को दीवार बनाकर ट्रंप की नजरों से दूर रखा गया था, या जिस तरह देश के सबसे साफ शहर एमपी के इंदौर में बेघर-बेसहारा बुजुर्गों को म्युनिसिपल ने कचरा गाड़ी में लादकर शहर के बाहर फेंककर साफ शहर के बाशिंदों की नजरों से दूर कर दिया गया था। कुछ लोगों ने इंदौर में बेघर-बुजुर्ग नाम की गंदगी को हटाने के वीडियो बनाए, और जिन्हें देखकर देश के लोग हिल गए। लेकिन देश के लोगों के संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी इस तरह कुछ मिनटों के वीडियो पर कैद नहीं हो सकती, इसलिए देशभक्ति के वीडियो का सैलाब स्टूडियो से शुरू होकर लालकिले तक बहता रहा।

लोकतंत्र में जब कुछ खास दिनों की अहमियत को पूरी तरह अनदेखा करके उनसे ठीक अलग किस्म के गैरमुद्दों की ओर लोगों को ध्यान खींच लिया जाए, तो वह उस दिन को कुचलने की साजिश की कामयाबी होती है। संविधान पर चर्चा आज भला कौन चाहते हैं? सत्ता पर बैठे लोग तो नहीं चाहते, और इसलिए देश में जनमत और जनधारणा बनाने की ताकत रखने वाली अधिकतर संस्थाएं भी नहीं चाहतीं, ताकतवर मीडिया का एक बड़ा हिस्सा भी नहीं चाहता। जब लोग चुनावों के ठीक पहले के बरसों में मुगलों की जुल्म की कहानियां बताने वाले टीवी सीरियल का वक्त मासूम समझते हैं, वे गणतंत्र दिवस पर देशभक्ति के सैलाब को भी मासूम समझ सकते हैं, या बता सकते हैं। गणतंत्र दिवस तो एक आजाद देश को आजाद हुए बरसों हो जाने के बाद उसके संविधान के लागू होने का दिन है, और आज उस संविधान की हत्या करते हुए भी इस दिन का जश्न महज आजादी पर फोकस रखना कोई मासूम काम नहीं है।

हिन्दुस्तान में एक भी टीवी चैनल ऐसा रहा हो तो हम उसके बारे में जरूर जानना चाहेंगे जिसने गणतंत्र दिवस पर अपनी बहस इस देश में संविधान की कामयाबी या नाकामयाबी पर केन्द्रित रखी हो। स्कूल-कॉलेज या किसी और दफ्तर में जहां कहीं झंडे के सामने भाषण हुए हों, क्या वहां पर कोई भी चर्चा देश के कमजोर तबकों के संवैधानिक अधिकारों पर हुई होगी? सच तो यह है कि संविधान लागू होने की सालगिरह के तुरंत बाद गांधी की हत्या का दिन आता है, और अब तो लोग यह भी भूल चले हैं कि गांधी की हत्या संविधान के तहत बने कानूनों के खिलाफ थी। अब तो देश में खुलेआम एक तबका इतना मुखर है कि उसे गांधी को कोसने और गोडसे को पूजने को छुपाने की जरूरत भी नहीं लगती है। ऐसा क्या गणतंत्र दिवस मनाना जो गोडसे की पूजा पर फिक्र के बिना पार हो जाए? किसी भी मौके की सालगिरह अगर उस मौके और वजह की अनदेखी करते हुए हो, तो उससे अच्छा है कि वह न ही हो। धूमिल ने शायद दशकों पहले इस नौबत का अंदाज लगा लिया था और लिखा था- क्या आजादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है जिन्हें एक पहिया ढोता है, या इसका कोई खास मतलब होता है?

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