किसान आंदोलन का विकट संकट..

किसान आंदोलन का विकट संकट..

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-अनिल शुक्ल ||

बेशक़ राकेश टिकैत के आंसुओं ने किसान आंदोलन को फिलहाल उखड़ने से बचा लिया है लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि आंदोलन के भीतर जो कमज़ोरियाँ हैं और इसके नेतृत्व में शासन के षड्यंत्रों को बूझने की जो कार्यकुशलता है वह अब ‘फूल प्रूफ’ हो गयी है।

2 महीने तक शांतिपूर्ण तरीके से चलने वाले किसान आंदोलन का संगठित और सुव्यवस्थित स्वरुप एक और जहाँ पूरे देश को अपनी लालित्यपूर्ण राजनीतिक मेधा से अभिभूत कर रहा था, वही सत्ता पक्ष सहित सियासत के एक बड़े हिस्से में अपने प्रति हैरानी, घृणा और ईर्ष्या भी पैदा कर रहा था। उनके लिए यह बड़ी चिंता का सबब था कि कैसे आंदोलन इतने  वैभवपूर्ण तरीके से चल पा रहा है। गणतंत्र दिवस के दिन जब उन्होंने अपनी ‘ट्रैक्टर परेड’ निकालने की घोषणा की तो समूचा देश जैसे आह्लादित था! कई पीढ़ियों से वह इस दिन टीवी के अपने छोटे से स्क्रीन पर ‘तंत्र’ की बड़ी सी परेड देखता आया था। 2021 के दिन होने वाली ‘गण’ की परेड  से भला उसे क्या आपत्ति हो सकती थी?

अलग-अलग गाँव में अघियानों से सट कर बैठे लोगों से लेकर, शहरों में फुटपाथ से लेकर दफ़्तरों तक, लोग दिल्ली में किसानों की परेड की नयी परिकल्पना से उत्तेजित थे। उनके ज़हन में राजधानी की चौड़ी-चौड़ी सड़कों पर दनदनाते ट्रैक्टर और उन पर लदे किसान, महिला किसान और उनके इष्ट लोगों के बिम्ब उभर रहे थे। उधर वे सारे तत्व जो हुक़ूमत थे, हुक़ूमत वाली पार्टी थे या जिनके तार प्रत्यक्ष-परोक्ष हुक़ूमत से जुड़े थे, उनके भीतर रैली की क़ामयाबी को लेकर नफ़रत और ग़ुस्से के  कैसे बलवले थे, इसका अहसास लगातार 2 दिन तक चली भाजपा की आईटी सेल की अलग-अलग पोस्ट पढ़कर जाना जा सकता है। यह रैली लेकिन महीनों में विकसित हुए एक अनूठे और शानदार आंदोलन के लिए विनाशपूर्ण घड़ी साबित हुई। इसने यह भी साबित किया कि बेशक़ आंदोलन के शिखर पर बैठे अनुभवी और बुज़ुर्ग नेतृत्व को नहीं बरग़लाया जा सकता है लेकिन इसमें शामिल युवा अभी राजनीतिक सोच के तौर पर परिपक्व नहीं और किसी भी रूमानियत के आव्हान से उन्हें झटपट बेहक़ायस जा सकता है। इस आंदोलन में इनकी तादाद बहुत बड़ी है और सोच का यही संकट किसान आंदोलन का विकट संकट है जो आने वाले समय में इसे कमज़ोर करेगा।  

लाल क़िले के नीचे खड़े होकर जब मुख़्तसर निवासी पंजाबी फिल्मों के ‘बी’ ग्रेड अभिनेता दीप सिद्धू ने ‘राज करेगा खालसा’ का नारा बुलंद करके अपने एक चेले के हाथ में ‘निसान साहब’ का भगवा झंडा सौंप कर उसे क़िले की गुम्मद पर चढ़ जाने का आदेश दिया तब मीडिया के ज़्यादातर लोग वहां मौजूद नहीं थे। सिद्धू के एक दूसरे चेले ने इस पूरे परिदृश्य का वीडियो बनाकर वायरल किया और कुछ ही देर में वहाँ पहुंचे मीडिया कर्मियों को सौंप भी दिया। सोशल मीडिया के एक हिस्से में कुछ देर के लिए यह हवा उड़ी कि लाल क़िले से राष्ट्रीय झंडा उतार किसानों ने अपना सिख धर्म का झंडा लहरा दिया है लेकिन जल्द ही टीवी चैनलों की कवरेज ने तिरंगे को अपने स्थान पर फहराता दिखा दिया। यह 6 महीने से चल रहे धर्मनिरपेक्ष किसान आंदोलन की पीठ में घोंपा गया सम्प्रदायिकता का छुरा था। इसके दुष्परिणाम आने वाले दिनों में दिखाई देंगे।   

कौन है यह दीप सिद्धू? 6 महीने पुराने पंजाब के किसान आंदोलन से इसका कोई वास्ता है? क्या मौजूदा किसान आंदोलन बहुजातीय/बहुधार्मिक किसानों की राष्ट्रीय चेतना का एक विराट राजनीतिक कुम्भ है या किसी सम्प्रदायिक और संकीर्ण भावना का छुटमुट प्रतीक? 

पंजाब के 32 किसान संगठनों से अलग राह पर चलने वाली ‘किसान मज़दूर संघर्ष समिति’ और ‘भारतीय किसान यूनियन (क्रांतिकारी) आउटर रिंग रोड पर चलने की अपनी मांग पर अडिग थे तभी कार्यक्रम से ठीक एक दिन पहले सिंघू बॉर्डर की परिधि पर फेंक दिया गया दीप सिंधू मंच पर प्रकट हुआ और उसने चीख-चीख कर आउटर रिंग रोड और लाल क़िले तक पहुँचने का नारा लगाया। उसके साथ गैंगस्टर से सामाजिक कार्यकर्ता बन गया लाखा सिधाना भी शामिल था।

पिछले महीने ही पंजाब के सभी 32 किसान संगठनों ने  दीप और लाखा को सांप्रदायिक मानते हुए उन्हें “आंदोलन का शत्रु” घोषित कर दिया था। 26 नवम्बर को जब किसान आंदोलन दिल्ली की देहलीज तक पहुँच गया था तब दीप सिद्धू ने एक पंजाबी टीवी चैनल को दिए अपने इंटरव्यू में इन किसान नेताओं को ऐसा “कम्युनिस्ट क़साई” बताया “जिन्हें अपनी औलादों को भी बलि का बकरा बनाने में क़तई संकोच नहीं।” अभी 2 हफ़्ता पहले उसने ”एसकेएम’ (संयुक्त किसान मोर्चा) के समक्ष खुद को  शामिल किये जाने की दर्ख्वास्त दी थी जिसे उन्होंने रद्दी की टोकरी में फेंक दिया।

  बीते सोमवार उनके साथ सतनाम सिंह पन्नू और पंढेर के नेतृत्व वाले संगठन सरीके कुछ अन्य लोग भी शामिल हो गए। शाम 6 बजे से आधी रात तक के लिए उन्होंने संघू बॉर्डर के मुख्य मंच पर  क़ब्ज़ा कर लिया। क्या तब भी ‘एसकेएम’ के नेताओं को उनके ख़तरनाक इरादों का अहसाह नहीं हुआ? सोमवार-मंगलवार की रात उन्होंने अपनी योजना को सरंजाम दिया। ‘संयुक्त किसान मोर्चा’ के नेतृत्व को इसकी खबर न हो सकी। मंगलवार की सुबह कोई 50 ट्रेक्टरों में ये लोग निकल भागे। ‘संयुक्त किसान मोर्चा’ के वॉलंटियरों ने इन्हें रोकने की कोशिश की लेकिन संख्या में कम होने से वे इन्हें रोक न सके।

 2019 के लोकसभा चुनाव में दीप सिद्धू न सिर्फ़ भाजपा का प्रचारक था बल्कि गुरुदासपुर लोकसभा संसदीय क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी सनी दियोल का मुख्य चुनाव एजेंट भी था। मंगलवार की शाम जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के साथ उसकी पुरानी तस्वीरें सोशल मीडिया में दौड़ने लग गईं तो सनी दियोल ने विज्ञप्ति जारी करके उससे नाता तोड़ने की घोषणा की। इसके बावजूद भाजपा ‘विक्रम’ बनने के इस देशव्यापी प्रचार से कहाँ बच सकी जिसके कन्धों पर दीप सिद्धू जैसा ‘बैताल’ लदा था।

जिस तरह ला क़िले जैसे राष्ट्रीय स्मारक सहित सार्वजनिक संपत्तियों की तोड़फोड़ की गयी है वह दर्शाती है कि यह 2 महीने से शांतिपूर्ण धरना देने वाले किसान नहीं बल्कि पेशेवर गुंडों का ऐसा गिरोह था जिसने आंदोलन को गंभीर क्षति पहुंचाने की नीयत से यह सब कुछ सुनियोजित तरीके से किया। आईटीओ पर बसों की तोड़फोड़ कर जिन एक दर्जन लोगों को पकड़कर किसानों ने जॉइंट कमिश्नर पुलिस को सौंपा है वे किसान नहीं हैं। 

अराजकता के इस समूचे प्रकरण से लेकिन ‘एसकेएम’ नेतृत्व को अपराध मुक्त नहीं किया जा सकता। सवाल यह है कि इतने बड़े आंदोलन की लीडरी करते वक़त उन्हें सोमवार की रात के षड्यंत्र की खबर थी। तब उन्होंने इस बात को रात में ही मीडिया और प्रशासन के संज्ञान में क्यों न डाल दिया और क्यों नहीं रात में ही अपनी ‘रेंक एन्ड फ़ाइल’ (पांतों) को इस षड्यंत्र को रोके जाने के लिए तैयार किया? क्या युवा किसानों की भीड़ सिद्धू, लाखा, पन्नू और पंढेर के भड़काऊ आव्हान का शिकार हो गयी? तब ‘एसकेएएम’ नेतृत्व ने उनके समक्ष हथियार क्यों डाल दिए? आखिर लाल क़िले पर गढ़े गए झूठ के भीतर का सच साबित करने की ज़िम्मेदारी तो उन्हों की थी।

आज़ादी के बाद का सबसे बड़ा किसान आंदोलन आज गंभीर हिचकोलों का शिकार है। क्या यह संकट उसके भीतरी तत्वों से जनित है? ‘संयुक्त किसान मोर्चा’ के नेताओं का कहना कि उनके भीतर का दिखने वाला यह संकट वस्तुतः उन बाहरी शक्तियों द्वारा पैदा किया गया है जिनके सामने वे अभी तक अविजित बने हुए थे। शासन के षड्यंत्र और दूषित हमलों का दौर अभी जारी रहने वाला है। किसान आंदोलन को इससे बचने की रणनीति को और भी सुदृढ़ करना होगा।

About Post Author

अनिल शुक्ल

अनिल शुक्ल: पत्रकारिता की लंबी पारी। ‘आनंदबाज़ार पत्रिका’ समूह, ‘संडे मेल’ ‘अमर उजाला’ आदि के साथ संबद्धता। इन दिनों स्वतंत्र पत्रकारिता साथ ही संस्कृति के क्षेत्र में आगरा की 4 सौ साल पुरानी लोक नाट्य परंपरा ‘भगत’ के पुनरुद्धार के लिए सक्रिय।
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