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अदालत की मीडिया से स्वनियमन की अपेक्षा, क्या नकेल कसे बगैर मान जाएगा मीडिया.?

Sanjaya Kumar Singh
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-संजय कुमार सिंह॥
दिल्ली दंगे के अभियुक्त, उमर खालिद की एक याचिका पर दिल्ली के एक मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने मीडिया से यह अपेक्षा की है कि वह स्वनियमन के तकनीक का उपयोग करे। अदालत ने कहा कि स्वनियमन सर्वश्रेष्ठ है। अदालत ने माना कि ‘लीक’ चार्जशीट के आधार पर खबरें चलाकर मीडिया ने उमर खालिद की छवि खराब की है जबकि सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में माना है कि किसी व्यक्ति की छवि मूल्यवान है और संविधान की धारा 21 के तहत उसके अधिकारों का एक पहलू है। यही नहीं, किसी पुलिस अधिकारी के समक्ष अपराध कबूलना कानून की नजर में स्वीकार्य सबूत नहीं है फिर भी मीडिया ऐसी खबरें देता है। दूसरी ओर, इस मामले में जांच अधिकारी ने कहा है कि ‘लीक’ पुलिस ने नहीं की है। मौजूदा व्यवस्था में उनका इतना कहना पर्याप्त है पर उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस ने कोई प्रेस कांफ्रेंस नहीं की है। जब करती है तब शायद कोई पूछता नहीं या शिकायत ही नहीं होती।


अदालत ने कहा कि मीडिया की कोई कार्रवाई अगर किसी अभियुक्त का सम्मान कम करती है तो इसका उसके उन अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव होगा जिसकी गारंटी भारत के संविधान से मिली है। इसलिए, किसी भी खबर को प्रकाशित करने से पहले सभी तथ्यों की जांच की जानी चाहिए और आवश्यक स्पष्टीकरण हासिल किया जाना चाहिए। अदालत ने इस बात पर चिन्ता जताई कि गलत खबर देने वाले मीडिया संस्थानों में से किसी ने अभी तक भूल सुधार नहीं किया है। कहने की जरूरत नहीं है कि मीडिया की आजादी के मद्देनजर मीडिया से स्वनियमन की अपेक्षा लंबे समय से की जाती रही है। पर मीडिया ट्रायल इस समाज की एक गंभीर समस्या है।

अभी तक लीक चार्ज शीट और सूचनाओं से सरकार विरोधी या आम लोगों की छवि खराब हो रही है। इसके अपने नुकसान हैं और इस संबंध में नियम तथा उनका पालन जरूरी है। सरकार के लिए मीडिया को नियंत्रित करना बहुत आसान है और मीडिया एक तरह से नियंत्रित है भी। पर इसका मतलब यह नहीं है कि आम लोगों की छवि के मामले में ध्यान नहीं दिया जाए। स्वनियंत्रण की जरूरत लंबे समय से समझी जा रही है लेकिन मीडिया पर कोई असर नहीं हो रहा है। और बात सिर्फ मीडिया की नहीं है। मीडिया तो स्वतंत्र है लेकिन पुलिस की चार्जशीट कैसे लीक हो जाती है। वह भी अभियुक्त को मिलने से पहले।
इसपर ध्यान क्यों नहीं दिया जा रहा है? उमर खालिद से संबंधित इस मामले में चार्जशीट अभियुक्त को मिलती उससे पहले ही मीडिया के पास पहुंच गई। मीडिया ने चार्ज शीट के हवाले से या वैसे ही, उमर खालिद के खिलाफ खबरें चला दी कि उसने उत्तर-पूर्व दिल्ली के दंगों को हवा देने में अपनी भूमिका मान ली है और चक्का जाम करने के लिए महिलाओं व बच्चों को जोड़ने में शामिल था। अदालत ने कहा है कि ऐसी गलत और दुर्भावनापूर्ण खबरों से निष्पक्ष ट्रायल का अभियुक्त का अधिकार कम हुआ है। अभियुक्त की शिकायत है कि झूठी खबरों से निष्पक्ष ट्रायल का उसका अधिकार प्रभावित हुआ है। उसने इस अपील से किसी राहत की मांग नहीं की थी बल्कि उपयुक्ति निर्देश की अपेक्षा की है ताकि भविष्य में मीडिया निष्पक्ष ट्रायल को बाधित न करे सके।


अदालत ने कहा है कि अभियुक्त ने कभी किसी पुलिस अधिकारी के समक्ष अपराध में शामिल होना स्वीकार नहीं किया है फिर भी भिन्न मीडिया संस्थानों ने यह दिखाने की कोशिश की है कि अभियुक्त ने अपराध में शामिल होना स्वीकार कर लिया है। ऐसी खबरें संविधान की धारा 21 के तहत एक निष्पक्ष ट्रायल के आवेदक / अभियुक्त के बुनियादी अधिकारों का भी उल्लंघन हैं और चार्ज शीट के चुनिन्दा अंशों का सही या गलत ढंग से हवाला देने का मकसद अभियुक्त की छवि खराब करना और इस मान्यता को नष्ट करना है कि दोषी साबित होने तक कोई भी अभियुक्त निर्दोष है।
अदालत के इस और पहले के ऐसे आदेशों के मद्देनजर मुझे डर है कि मीडिया में संपादक के ऊपर या उनकी जगह कोई पुलिस इंस्पेक्टर या पीआईबी अधिकारी बैठा दिया जाए तो कैसा रहे। मनमानी ज्यादा दिन नहीं चलती है, किसी की नहीं चलती है और ऐसे में मुझे लगता है कि मीडिया अगर आत्म नियमन की पक्की व्यवस्था नहीं करेगा तो उसकी नकेल कस दी जाएगी। मीडिया अब ऐसा रहा भी नहीं कि कोई उसका समर्थन करेगा या नकेल कसने से किसी को असुविधा होगी। लेकिन तब ब्रेकिंग न्यूज का क्या होगा? देखा जाए।

About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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