कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के छात्रों का भविष्य गर्त में..

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के छात्रों का भविष्य गर्त में..

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कोरोना महामारी के कारण छात्रों की पढ़ाई पे जो बुरा असर पड़ा है उसको कुरुक्षेत्र विश्विद्यालय ने अपनी सुस्ती के चलते और बढ़ा दिया है। अक्टूबर 2020 के पहले सप्ताह में यूनिवर्सिटी ने ऑफलाइन व ऑनलाइन एग्जाम ले लिए थे और परिणाम भी जल्दी घोषित करने की बात कही थी।


सबसे ज़्यादा दिक्कत तो पोस्ट ग्रेजुएशन के छात्रों को हो रही है जिन्होंने प्राइवेट और डिस्टेंस से एग्जाम दिए थे। क्योंकि इन छात्रों में से किसी के भी के न प्रथम वर्ष का परिणाम घोषित किया गया है न फाइनल का।जिन प्राइवेट छात्रों का प्रथम वर्ष था वो परिणाम न आने के कारण फाइनल ईयर के फॉर्म नहीं भर पा रहे और सबसे बुरी हालत तो फाइनल ईयर के एग्जाम दिए हुए छात्रों की है क्योंकि बिना मार्कसीट अथवा प्रोविज़नल के वो पीएचडी में एड्मिशन भी नहीं ले सकते।


ऐसे समय में जब यूनिवर्सिटी खुद दूरी कक्षाओं को नए एड्मिशन दे रही है और खुद परिणाम भी घोषित नहीं कर रही ये देखकर निराशा होती है।यूनिवर्सिटी ने कुछ कक्षाओं के परिणाम घोषित किए भी हैं लेकिन उनको देखने पर पता चलता है कि ये यूनिवर्सिटी एग्जाम लेने के लगभग 4 महीने बाद भी छात्रों के भविष्य के लिए संवेदनशील नहीं है। ऐसे बुरे दौर में जब यूनिवर्सिटी को हर दिन कम से कम 5-6 कक्षाओं के परिणाम घोषित करने चाहिए ऐसे में वह 10 दिन के अंदर भी 10 कक्षाओं के परिणाम भी नहीं दे रही है।इस वक़्त जब पूरी दुनिया का छात्र डिप्रेसन में से गुजर रहा है उस दौर में भी कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी को शायद इस बात का इल्म नहीं है कि इनकी इसी कमज़ोरी और सुस्ती के कारण छात्रों पर मानसिक तनाव कितना बढ़ रहा है।अगर ऐसे दौर में कोई छात्र मानसिक तनाव की गिरफ्त में आ जाता है तो इस बुरी स्थिति में यूनिवर्सिटी की सुस्ती का कितना हाथ होगा ये बताने की भी ज़रूरत नहीं है।

हिंदी फाइनल ईयर के छात्र प्रदीप अपनी बात रखते हुए कहते हैं कि “मैंने JRF दिसंबर 2019 को पास कर लिया था और 2020 में मेरी एम.ए. को पूरा हो जाना था और उसके बाद मुझे फेलोशिप प्राप्त करने के लिए पीएचडी में एड्मिसन लेना अनिवार्य था लेकिन यूनिवर्सिटी की लचर व्यवस्था के कारण मैं jnu और mdu यूनिवर्सिटी में पीएचडी सिलेक्शन के लिए इंटरवयू में भी नहीं जा सका क्योंकि वहां पर उस वक़्त तक परिणाम घोषित होना अनिवार्य होता है और महाराष्ट्र ,गुजरात,बिहार,पंजाब की कम से कम 10 यूनिवर्सिटीज में रिजल्ट न आने कारण फॉर्म तक भी अप्लाई नहीं कर पाया।अब यूनिवर्सिटी की सुस्ती का नुक़सान देखा जाए तो मुझ पर ही पड़ रहा है क्योंकि आजकल पीएचडी में वैसे भी एड्मिसन मुश्किल से मिलते हैं और अब अगली बार जब तक फॉर्म निकलेंगे तब तक 1 साल मेरा बेकार हो चुका होगा जबकि मेरे राजस्थान के हरियाणा के दोस्त जो दूसरी यूनिवर्सिटीज के थे उनके एग्जाम भी हमारे साथ ही हुए थे और उनका रिजल्ट आए हुए 1 महीने से ऊपर हो गए हैं।मैं खुद 30 दिसंबर को यूनिवर्सिटी गया था लेकिन वहां vc से मिलने पर मनाही है और कहा गया कि आप कंट्रोलर से मिलें,कंट्रोलर ने ब्रांच में जाने को कहा जहां पे बैठे अधिकारियों ने कहा कि अभी तो तुम्हारे पेपर भी चेक नहीं हुए।अब ऐसे हालात में मेरे पास दूसरा रास्ता बताइए।क्या इस यूनिवर्सिटी से एम.ए. करना ही मेरा जुर्म हो गया?अब भी 2 यूनिवर्सिटीज की पीएचडी के फॉर्म भरने की अंतिम तिथि 25 जनवरी है इसलिए ये आज-कल में रिजल्ट दे दें तो मेरा 1 साल ख़राब होने से बच सकता है।मैं चाहता हूँ हरियाणा सरकार इसमें हस्तक्षेप करे और यूनिवर्सिटी को जल्दी परिणाम घोषित करने का आदेश दे क्योंकि अगर यूनिवर्सिटी ये कहे कि हम कोनफिडेंशल रिजल्ट देने को तैयार है तो वो भी कोई काम का नहीं क्योंकि फॉर्म भरते वक़्त छात्र के पास कक्षा उत्तीर्ण करने का साक्ष्य होना जरूरी है।”


ऐसे ही हिंदी एम.ए. प्राइवेट के प्रथम वर्ष के छात्र राकेश कहते हैं कि “मेरा प्रथम वर्ष था,अभी तक रिजल्ट नहीं आया जिससे फाइनल ईयर के फॉर्म नहीं भर सकता क्योंकि पता नहीं रिजल्ट कैसा रहेगा अगर 55% से कम मार्क्स रहते हैं तो मैं दोबारा से ही प्रथम वर्ष करने की सोचूंगा।यूनिवर्सिटी के इस रवैये के कारण मुझको मानसिक तनाव भी रहने लगा है।”
इसी तरह से सैंकड़ों छात्र हैं जिनका यूनिवर्सिटी के इस रवैये के कारण भविष्य दाँव पर लगा है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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