बड़े बेआबरू होकर, व्हाईट हाउस से ट्रम्प निकले..

बड़े बेआबरू होकर, व्हाईट हाउस से ट्रम्प निकले..

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संयुक्त राज्य अमेरिका में जो बाइडेन के 46वें राष्ट्रपति के रूप में शपथग्रहण के साथ ही एक बार फिर डेमोक्रेटिक पार्टी की सत्ता में वापसी हो गई है। लेकिन इसे महज सत्ता परिवर्तन के तौर पर न देखकर युग परिवर्तन की तरह देखा जा रहा है। दरअसल पिछली रिपबल्किन सरकार में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी कार्यशैली और बयानों के कारण इस कदर विवादों में घिरे, कि कार्यकाल के आखिरी दिनों में उन्हें बोझ की तरह देखा जाने लगा।

राष्ट्रपति पद का अंतिम दिन बिता कर जब वे व्हाइट हाउस से अपनी पत्नी के साथ विदा हुए, तो बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले, वाला माहौल बन चुका था। सोशल मीडिया पर उनकी विदाई का जश्न मनाया जा रहा था। और जिन देशों में ट्रंप की तरह ही अड़ियल, संकीर्ण मानसिकता वाले विवादास्पद राष्ट्रप्रमुख हैं, उनकी ऐसी ही विदाई के अरमान खुलकर सोशल मीडिया पर प्रकट होने लगे। अपने चार साल के कार्यकाल में डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को महान बनाने का नारा देते हुए कई ऐसे फैसले लिए, जिससे अमेरिका की छवि वैश्विक स्तर पर खराब हुई। उसके बावजूद यकीन था कि उन्हें दोबारा सत्ता मिलेगी। यकीनन उन्हें अच्छे-खासे वोट मिले और जो बाइडेन को उन्होंने कड़ी टक्कर दी, लेकिन जीत बाइडेन की ही हुई।

ट्रंप इस हार को शुरु से बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे और चुनावों को गलत साबित करने के सारे हथकंडे उन्होंने अपनाए, जो अंतत: विफल साबित हुए। इसके बाद छह जनवरी को उनके उकसाने पर उनके समर्थकों ने कैपिटल हिल पर जिस तरह का उत्पात मचाया, वह तो अमेरिकी लोकतांत्रिक इतिहास में अनूठी घटना थी। इस घटना ने साबित कर दिया कि श्वेत वर्चस्ववाद, संकीर्ण और कट्टर राजनीति किसी भी देश या समाज को किस तरह बांट कर रख देती है, भले ही उसका मूल चरित्र कितना भी उदार और लोकतांत्रिक क्यों न हो। 

बहरहाल, ट्रंपकाल की इन सारी घटनाओं ने उनकी विदाई और जो बाइडेन के स्वागत की उत्सुकता को बढ़ा दिया। जो बाइडेन ने शपथग्रहण के दौरान जो भाषण दिया, उसमें बार-बार एकता और लोकतंत्र का जिक्र हुआ। बाइडेन ने कहा कि लोकतंत्र में जिस सबसे मुश्किल चीज की जरूरत होती है, वो है एकता। जिन ता$कतों ने हमें बांटने की कोशिशें कीं वे असली हैं लेकिन नई नहीं हैं। लड़ाई हमेशा जारी रहती है और जीत कभी भी सुनिश्चित नहीं होती है। बाइडेन की ये बातें भारतीय संदर्भ में भी खरी उतरती हैं। भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो बाइडेन को बधाई प्रेषित कर साथ काम करने की उम्मीद जतलाई।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का यही तकाजा भी यही है। अफसोस है कि मोदीजी ने कई बार कूटनीतिक संबंधों और निजी संबंधों में घालमेल करने की गलती की। बराक ओबामा को घनिष्ठ मित्र बताने के बाद वे डोनाल्ड ट्रंप के भी इतने करीबी हो गए कि अमेरिकी मंच से अबकी बार ट्रंप सरकार का नारा लगा बैठे।

जबकि ट्रंप ने इस निकटता के बावजूद भारत को स्वार्थपरक तरजीह ही दी। अब जो बाइडेन के साथ नए सिरे से भारत को संबंध स्थापित करने होंगे। हालांकि बाइडेन ने बतौर सीनेटर भारत के साथ अमेरिकी रिश्तों को प्रगाढ़ करने पर जोर दिया है। भारत ऐसा पहला देश है जिसे अमेरिका के सामरिक गुटों में शामिल न होते हुए भी रक्षा साझीदार का दर्जा मिला है और यह बराक ओबामा के कार्यकाल में जो बाइडेन के प्रयासों के कारण संभव हुआ। अमेरिका-भारत की परमाणु संधि में जो बाइडेन का अहम योगदान रहा। चीन के विरोध में ट्रंप ने तो खुलकर बयानबाजी की, जिससे भारत को यह अहसास होता रहा कि चीन के साथ विवादों पर अमेरिका का साथ मिलेगा।

लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति का गणित दो और दो चार जितना सीधा-सरल नहीं होता है। यहां कई तरह के आर्थिक, सामरिक, भौगोलिक समीकरणों को देखते हुए हिसाब बिठाया जाता है। इसलिए देखना होगा कि बाइडेन सरकार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का किस तरह और कितना साथ देती है। वैसे इस बार अमेरिका की सरकार में खास बात ये है कि भारतीय मूल के लोग कई प्रभावशाली पदों पर हैं।

भारतीय-अमेरिकी कमला हैरिस तो उपराष्ट्रपति ही बन गई हैं। यह भी अमेरिकी लोकतांत्रिक इतिहास में पहली घटना है कि कोई महिला और वह भी अश्वेत इस पद पर पहुंची है। कमला हैरिस ने जम्मू-कश्मीर से 370 हटाने और उसके पुनर्गठन की निंदा की थी, जो मोदी सरकार को नागवार गुजरी थी।

वाशिंगटन से प्रतिनिधि सभा की सदस्य प्रमिला जयपाल ने मोदी सरकार के इस फैसले पर निंदा प्रस्ताव रखा था, जिसके बाद विदेश मंत्री एस जयशंकर ने प्रमिला जयपाल से मिलने से ही इंकार कर दिया था। अब सुश्री जयपाल बाइडन सरकार का राजनीतिक एजेंडा तैयार करने के वाली प्रवर समिति में हैं। देखना है कि पिछली घटनाओं का कितना असर भावी संबंधों पर पड़ता है। महामारी की रोकथाम और अर्थव्यवस्था की बहाली को बाइडेन ने अपनी पहली प्राथमिकता बनाया है। इसके लिए एक कार्य-दल का गठन हो सकता है, जिसमें भारतीय मूल के डॉ. विवेक मूर्ति की अग्रणी भूमिका होगी। उनके अलावा नई सरकार में ऊर्जा मंत्रालय के लिए स्टेनफ़र्ड के प्रो. अरुण मजूमदार और वित्त एवं निवेश विभागों के लिए राज चेट्टी के नाम भी आगे चल रहे हैं।

बताया जा रहा है कि बाइडेन का शपथग्रहण भाषण तैयार करने में भारतीय मूल के विनय रेड्डी की अहम भूमिका रही है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि अमेरिका की नई सरकार में भारतीय मूल के कई लोग प्रभावशाली रहेंगे। लेकिन इससे अमेरिका-भारत संबंधों में कोई खास बदलाव होगा, ऐसा नहीं है, क्योंकि अंतत: सभी देश अपने हितों को पहले रखकर ही दूसरों के साथ संबंध निर्वाह करते हैं। हां, विदेशों में बसे भारतीयों की ऐसी उपलब्धियों पर गर्व करने वालों को यह जरूर सोचना चाहिए कि हम खुद अपने देश में शुद्ध रक्त, विशुद्ध भारतीय, हर कोई हिंदू है, जैसी बात करके विश्व के सामने भारत की कैसी संकीर्ण छवि बना रहे हैं।

खैर… महामारी, लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी, कई देशों से तनावपूर्ण संबंध ऐसे कई मसले जो बाइडेन और कमला हैरिस को विरासत में मिले हैं। इनका समाधान करते हुए अमेरिकी समाज को फिर से एकजुट करने का कठिन काम वे कैसे पूरा करते हैं, इस पर विश्व की निगाहें हैं।

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