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जिंदगी और मौत का सवाल है..

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शनिवार 16 जनवरी को भारत में दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान शुरु हुआ। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली रिकार्ड बनाने पर केन्द्रित रही है। सबसे बड़ी पार्टी, सबसे अधिक चंदा, सबसे अधिक शासित राज्य, सबसे ज्यादा रैलियां, सबसे बड़ी मूर्ति, सबसे ज्यादा ट्रेनों को एक साथ हरी झंडी और इसी क्रम में सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान उनके शासन में शुरु हुआ। जिस तरह नोटबंदी, जीएसटी जैसे आर्थिक फैसलों की घोषणा उन्होंने की, मंगलयान और चंद्रय़ान जैसे अंतरिक्ष कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी रही, उसी तरह वैक्सीन बनने से लेकर उसे लगाने की शुरुआत की घोषणा भी उनके श्रीमुख से ही हुई।

मोदीजी ने बड़े भावुक अंदाज में टीकाकरण अभियान शुरु करने का ऐलान करते हुए उन स्वास्थ्य कर्मियों को याद किया, जो संक्रमण के कारण असमय दुनिया से चले गए। वाकई जिन लोगों ने निस्वार्थ भाव से, अपनी जान जोखिम में डालकर दूसरों की सेवा की, उनके प्रति जितनी कृतज्ञता दिखाई जाए, वो कम है। काश मोदीजी कुछ भावुकता उन लोगों के लिए प्रदर्शित करते जो लॉकडाउन जैसे अविचारित फैसलों के कारण अपनी जान जोखिम में डालकर घर लौटने मजबूर हुए और अब भी जिनका जीवन सामान्य अवस्था में नहीं लौट पाया है। इनमें से बहुतेरे लोगों को तो वोट के बदले फ्री वैक्सीन का वादा भी किया गया। हालांकि तब तक तय नहीं था कि वैक्सीन कब  आएगी। लेकिन अब एक नहीं दो-दो वैक्सीन आ चुकी हैं औऱ उनके लगने की शुरुआत भी हो गई है।

सरकार ने पहले स्वास्थ्यकर्मियों और फ्रंटलाइन वर्कर्स को वैक्सीन लगाने का निश्चय किया है और शनिवार को देश भर के कई अस्पतालों में टीकाकरण की शुरुआत हुई। कहा जा रहा है कि अगले कुछ महीनों में 30 करोड़ लोगों को टीका लग जाएगा। सरकार ने पहले दिन 3 लाख लोगों को वैक्सीन लगाने का लक्ष्य रखा था। लेकिन वैक्सीन की गुणवत्ता, साइड इफेक्ट्स आदि के कारण बने संशय के कारण इस लक्ष्य से काफी कम लोगों को वैक्सीन लगे। पहले दिन 1 लाख 91 हजार लोगों ने टीका लगवाया। इसमें दिल्ली एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया भी शामिल हैं।

हालांकि वैक्सीन को लेकर सवाल अब भी उठ रहे हैं। दिल्ली के आरएमएल अस्पताल के कई डाक्टरों ने वैक्सीन लगवाने से इंकार कर दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील करते हुए वैक्सीन्स को पूरी तरह सुरक्षित बताया है। लेकिन उनकी यह अपील और कारगर साबित होती अगर वे खुद वैक्सीन लगवाने की पहल करते। मोदीजी जो बाइडेन से प्रेरित होकर इसका लाइव प्रसारण करवाते तो उनके प्रशंसक उनके और ज्यादा मुरीद हो जाते। कई विपक्षी नेताओं ने भी ऐसी ही मांग की है। इससे उन्हें भी करारा जवाब मिल जाता। लेकिन शायद सरकार लखनवी तहजीब में जनता से पहले आप का निवेदन कर रही है। जनता को कोरोना से जितनी जल्दी सुरक्षा मिले, उतना अच्छा। लेकिन अगर इस सुरक्षा की ढाल में संदेह के छेद हों, तो उन्हें भरने का काम सरकार को ही करना होगा। 

दरअसल सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटेक दोनों की वैक्सीन को एक साथ आपातकालीन मंजूरी मिलने पर सवाल उठे थे कि भारत बायोटेक की कोवैक्सीन के तीसरे चरण का परीक्षण अभी पूरा नहीं हुआ है, फिर उसे कैसे मंजूरी दे दी गई। तब यह कहा गया कि इसे क्लिनिकल ट्रायल मोड में वैकल्पिक टीके के तौर पर इस्तेमाल की मंजूरी दी गई है। इसका मतलब है कि आपात स्थिति में ही इसको इस्तेमाल करने की बात कही गई थी।

वैक्सीन बनाने वाली दोनों कंपनियों सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के सीईओ अदार पूनावाला और भारत बायोटेक के चेयरमैन कृष्णा इल्ला के बीच वैक्सीन को मंजूरी मिलने के बाद विवाद भी सामने आया था। अदार पूनावाला ने भारत बायोटेक की वैक्सीन को मंजूरी मिलने पर आपत्ति जतलाते हुए इसे पानी के समान बताया था। जिस पर कृष्णा इल्ला ने सख्ती से जवाब भी दिया था। इस के कुछ समय बाद ही दोनों ने अपने विवाद को समाप्त करते हुए महामारी को खत्म करने के लिए मिलकर काम करने निश्चय दर्शाया था। कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय के दखल के बाद दोनों के बीच सुलह हुई।

लेकिन सवाल अब भी वहीं है कि क्या वाकई कोवैक्सीन तीसरे परीक्षण के डेटा सामने आने से पहले सुरक्षित मानी जा सकती है। उसे अदार पूनावाला ने किस आधार पर पानी कहा था। क्या यह महज कारोबारी प्रतिद्वंद्विता है या इसके पीछे कोई पुख्ता कारण है। अगर कारोबारी कारणों से इस तरह के विवाद खड़े हुए हैं, तो क्या सरकार इसका संज्ञान लेगी। वैक्सीन को लेकर उठ रहे संशयों का समाधान जनता के बीच पारदर्शी तरीके से होना चाहिए। क्योंकि सवाल जिंदगी का है।

(देशबंधु)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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