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यह कैसा देश है जहां सबसे रईस राष्ट्रपति सांसद नहीं खरीद…

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अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के खिलाफ संसद पर हमले के लिए लोगों को भडक़ाने और उकसाने के आरोप के साथ निचले सदन में महाभियोग प्रस्ताव खासे बहुमत से पास हो गया है। दस रिपब्लिकन सांसदों ने भी अपनी ही पार्टी के राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग के पक्ष में वोट दिया। अब संसद के उच्च सदन में अगर ट्रंप की पार्टी के 17 लोग साथ देते हैं, तो वहां से भी महाभियोग चलाने का प्रस्ताव पास हो जाएगा। हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि यह कई वजहों से मुश्किल रहेगा क्योंकि वहां रिपब्लिकन पार्टी का खासा बहुमत है, और महाभियोग के लिए वहां दो तिहाई वोट लगेंगे। फिर भी ट्रंप के आलोचक उम्मीद कर रहे हैं कि 17 रिपब्लिकन आत्मा की आवाज पर वोट देंगे, और अपने कार्यकाल के आखिरी दो-चार दिनों में ट्रंप को महाभियोग का सामना करना पड़ेगा।
दरअसल अमरीकी राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग को लेकर यहां लिखने का कोई इरादा नहीं था, लेकिन वहां की इस संसदीय प्रक्रिया के एक हिस्से पर लिखना जरूरी है। ट्रंप की पार्टी के 10 सांसदों ने निचले सदन (भारत की संसद की लोकसभा की तरह) में अपनी पार्टी के राष्ट्रपति के खिलाफ वोट दिया, और उच्च सदन (भारत की संसद की राज्यसभा की तरह) में भी कुछ रिपब्लिकन सांसदों से ऐसी उम्मीद की जा रही है, लेकिन इस पूरे सिलसिले में कहीं भी पार्टी व्हिप जैसे किसी शब्द की कोई चर्चा नहीं है। भारतीय संसद में बात-बात पर पार्टियां अपने सांसदों को व्हिप जारी करती हैं जिसके मुताबिक उन्हें न केवल सदन में मौजूद रहना होता है, बल्कि अपनी पार्टी के कहे मुताबिक वोट भी देना होता है। ऐसा न करने पर उनकी सदस्यता खत्म हो सकती है। लेकिन भारतीय संसदीय व्यवस्था के तीन गुना से अधिक पुरानी अमरीकी व्यवस्था में अब तक हिन्दुस्तानी-बंदिशों की तरह सांसदों को गुलाम नहीं बनाया गया है। अपनी पार्टी के गुलाम, पार्टी की विचारधारा ही नहीं, पार्टी के मनमाने फैसलों को समर्थन करने पर मजबूर गुलाम। इससे यह तो होता है कि सांसदों की खरीदी-बिक्री का खतरा शायद कुछ घट सकता है, लेकिन बिना ऐसे किसी कानून के अमरीकी संसद में किसी सांसद की खरीद-बिक्री की कोई चर्चा कभी सुनाई नहीं पड़ती।
संसदीय लोकतंत्र में अलग-अलग देशों के नियम-कायदों में फर्क हो सकता है, रहता ही है, लेकिन हिन्दुस्तान में दलबदल विरोधी कानून के तहत जिस तरह पार्टी व्हिप के खिलाफ जाने पर भारत में संसद और विधानसभाओं में सदस्यता जा सकती है, उससे संसद विचारों के आजाद मंच की जगह गिरोहबंदी पर काम करने वाली एक जगह बन चुकी है। यह सिलसिला सदन में सदस्य के अपने विचारों को रखने की संभावनाओं को खत्म कर देता है, और सदस्यों के लिए महज अपनी पार्टी की सोच और फैसले से बंधे रहना एक मजबूरी हो जाती है। ऐसे में सदन को सदस्यों के निजी विचारों का जो फायदा मिलना चाहिए, वह संभावना पूरी तरह खत्म हो जाती है, और अलग-अलग सदस्यों वाला यह सदन खेमों में बंटकर ही काम करता है। एक पार्टी के लोग एक आवाज बोलते हैं, एक ही सोच और फैसला सामने रखते हैं, और इस तरह सदन निर्वाचित व्यक्तियों की पंचायत होने के बजाय उनकी पार्टियों के बीच बहस की सीमित संभावनाओं वाली जगह बनकर रह जाती है।
भारत की ऐसी तंग सीमाओं को देखते हुए अमरीका की आज की व्यवस्था पहली नजर में एक संसदीय आजादी की व्यवस्था लगती है, लेकिन भारत के संदर्भ में ऐसा सोचते ही तुरंत यह लगता है कि इस किस्म का समर्थन या विरोध खरीदना हिन्दुस्तान में कितना आसान हो जाएगा? यहां तो सांसद और विधायक, सरकार के मंत्री, चुनाव में खड़े होने जा रहे उम्मीदवार, किसी को भी खरीदा जा सकता है, कोई भी अपने आपको बेचने के लिए संसदीय-मंडी में खड़े हो सकते हैं। मजे की बात यह है कि चिल्हर दलबदल पर तो रोक लग गई है, लेकिन थोक में दलबदल एक बहुत आसान काम हो गया है। एक-तिहाई सांसद-विधायक अगर दलबदल को न जुट पाएं, तो कुछ विधायक-सांसद इस्तीफे देकर भी बाकी लोगों में से एक-तिहाई के दलबदल की संभावना पैदा करते हैं, या अपनी सरकार गिरा देते हैं। और यह देश दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने के घमंड में डूबा ही रहता है।
अमरीका की लोकतांत्रिक सोच में, वहां की संसदीय व्यवस्था में दूसरी कई खामियां हो सकती हैं, होंगी, लेकिन पार्टी की नकेल से सांसदों और विधायकों को बांधकर रखने की व्यवस्था नहीं है, और उसके बाद भी सांसद-विधायक बिक नहीं रहे हैं, यह कुछ अटपटी बात जरूर है। पिछले कई दिनों से जब से अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में मौजूदा राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को बहुमत नहीं मिला, और वे हारते चले गए, तो हिन्दुस्तान में तो ऐसे लतीफे खूब चले कि ट्रंप को अपने हिन्दुस्तानी दोस्तों से सांसद खरीदने की तरकीबें पूछ लेना चाहिए, लेकिन अमरीका के भीतर ऐसे लतीफे का मतलब भी शायद कोई समझ नहीं पाए होंगे।
हर लोकतंत्र में दूसरे देश के लोकतंत्र से कुछ, या कई बातें सीखने की संभावना हमेशा रहती है। अमरीकी सांसद बिना बिके हुए अपनी अंतरात्मा की आवाज पर आज वोट किस तरह दे रहे हैं, और उनकी पार्टी उन्हें कोई चेतावनी भी जारी नहीं कर रही है, और उनके बारे में ऐसी कोई अफवाह भी नहीं है कि उन्होंने अपनी आत्मा बेच दी है, इस नजारे को देखकर हिन्दुस्तानी लोकतंत्र को कुछ सीखने की जरूरत है जो कि हाल के बरसों में लगातार बिकने वाले लोगों की खबरों से पटा हुआ है।
-सुनील कुमार

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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