किसान आंदोलन: वही हुआ जैसा सरकार चाहती थी..

Desk 1

नए कृषि कानूनों पर सरकार के साथ चल रहे गतिरोध का हल किसान सरकार की ओर से ही चाहते थे। वे नहीं चाहते थे कि यह मामला न्यायालय तक पहुंचे। लेकिन फिर भी मामला अदालत में गया और वहां से जो फैसला आया, उसमें वही हुआ, जिसकी आशंका किसानों को थी। यानी कानून रद्द नहीं हुए, केवल कुछ समय के लिए निलंबित हुए हैं और अब एक समिति बनाने का फैसला किया गया है, जो गतिरोध पर चर्चा करेगी। जबकि किसानों की मांग साफ है कि नए कानून रद्द हों। इस मांग को पूरा करने की जिम्मेदारी सरकार की है और वो ये जिम्मेदारी पूरी नहीं कर रही, इसलिए किसान भीषण परिस्थितियों में भी आंदोलनरत हैं।

सरकार के साथ जब भी किसानों की वार्ता हुई, वो बेनतीजा इसलिए रही क्योंकि सरकार किसानों की मुख्य मांग को सुनना ही नहीं चाहती। पिछली बैठक के तो पहले ही केन्द्रीय कृषि मंत्री की ओर से कह दिया गया था कि कानून वापस लेने पर कोई बात नहीं होगी, यानी सरकार पीछे नहीं हटेगी, ये उसने तय कर लिया है। ऐसा साफ दिख रहा है कि मोदी सरकार ने इन कानूनों को अपने अहंकार का सवाल मान लिया है, जिसमें पीछे हटते ही अहंकार के शीशे की तरह चूर-चूर होने का खतरा रहेगा। सरकार के लिए जनता से बड़ी अपनी जिद है, ये बात अब जगजाहिर है। जिद का यही इल्जाम किसानों पर भी सरकार लगा सकती है, लेकिन उनके जिद पर अड़े रहने या पीछे हटने में जीवन और मौत में से एक का चुनाव करने वाली बात है।

उनकी मांग बेमानी नहीं है, क्योंकि वे इन कानूनों के लागू होने में अपने भविष्य के संभावित खतरों को पहचान रहे थे। जिसमें उनके साथ-साथ पूरे देश के लिए जीवन का संकट हो सकता है। मंडी के बाहर, मनमानी कीमतों पर फसल खरीदने की छूट देने का सीधा मतलब है कार्पोरेट घरानों के लिए मुनाफे की थाल सजा कर परोस देना। मुमकिन है शुरुआत में वे किसानों को ऊंची कीमतें देकर उन्हें यह भरम दें कि मंडी से अधिक फायदा उन्हें बाहर बेचने से मिल रहा है। वे जाल बिछाकर दाना डालेंगे और एक बार जब किसान उसमें फंस गए, तो फिर उनके लिए उस जाल को काटना लगभग नामुमकिन होगा। तब खेत बेशक किसानों के होंगे, लेकिन उस पर क्या उगे, और वो उपज कहां, कितने दामों में बिके, इसे तय करने का हक उनका नहीं होगा। कुछ ही वक्त में देशी-विदेशी व्यापारियों की जरूरत के मुताबिक फसलें उगाई जाने लगेंगी और देश के खाद्यान्न की जरूरत विकास की नई परिभाषाओं में बेमानी बना दी जाएगी। फसलों की जमाखोरी बेलगाम होगी, तो तय जानिए कि देश में अमीरी-गरीबी के बीच की खाई भी इतनी गहरी हो जाएगी, जिसे पाटना नामुमकिन होगा।

ऐसे कई खतरों को भांपते हुए ही किसान आंदोलन खड़ा हुआ। अगर समिति बनाने की बात से किसान राजी होते तो आंदोलन खत्म हो चुका होता और 50 से अधिक लोगों को इस महान उद्देश्य के लिए अपनी जान न गंवानी पड़ती। लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि इस आंदोलन के दौरान हुई शहादतें बेकार न हो जाएं। समिति बनाने के सुझाव से किसान पहले ही असहमत थे, सोमवार को संयुक्त किसान मोर्चा ने इस आशय का एक बयान भी जारी किया गया था, जिसमें कहा गया था कि कृषि क़ानूनों को लागू किए जाने से रोकने के सुप्रीम कोर्ट के सुझाव का सभी संगठन स्वागत करते हैं लेकिन वे सामूहिक और व्यक्तिगत रूप से सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित किसी कमेटी की कार्यवाही में शामिल होने के प्रति अनिच्छुक हैं। उन्होंने कहा है कि वे सर्वसम्मति से कृषि कानूनों को रद्द करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा है, ‘सरकार के उस रवैये और दृष्टिकोण को देख रहे हैं जिसमें इसने आज अदालत के सामने बार-बार यह साफ़ किया है कि वह (सरकार) समिति के समक्ष क़ानून को निरस्त करने की चर्चा के लिए सहमत नहीं होगी।’ 

सोमवार को किसान संगठनों ने समिति बनाने को लेकर अपना नजरिया साफ कर दिया था। लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट ने क़ानूनों पर अगले आदेश तक रोक लगाने के साथ चार सदस्यों वाली समिति बनाई। अदालत ने कहा कि अगर किसान सरकार के समक्ष जा सकते हैं तो समिति के समक्ष क्यों नहीं? अगर वो समस्या का समाधान चाहते हैं तो हम ये नहीं सुनना चाहते कि किसान समिति के समक्ष पेश नहीं होंगे। यानी अब गेंद समिति के पाले में है। इस समिति में भूपिंदर सिंह मान (अध्यक्ष भाकियू), डॉ प्रमोद कुमार जोशी (अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान), अशोक गुलाटी (कृषि अर्थशास्त्री) और अनिल धनवट (शेतकरी संगठन, महाराष्ट्र) होंगे।

खास बात ये है कि समिति के चारों सदस्य नए कृषि कानूनों के समर्थन में पहले अपने विचार व्यक्त कर चुके हैं। देश में कई और जाने-माने कृषि विशेषज्ञ हैं, जो इस समिति का हिस्सा हो सकते थे, लेकिन नहीं हुए। अब देखना यही है कि ये समिति आंदोलनकारी किसानों के दृष्टिकोण को कैसे समझेगी। वैसे सरकार ने कृषि कानून को राज्यसभा में पारित कराने के लिए मतदान को जरूरी नहीं समझा था, और ध्वनिमत से पारित करवाया था, इन कानूनों को बनाने से पहले जरूरी विचार-विमर्श नहीं किया गया था। और अब भी इन कानूनों को विचार के लिए किसी संसदीय समिति के पास नहीं भेजा गया। अगर ऐसा होता तो इसमें संसद की खास भूमिका रेखांकित हो सकती थी।

(देशबन्धु)

Facebook Comments

One thought on “किसान आंदोलन: वही हुआ जैसा सरकार चाहती थी..

  1. क्या बकवास और मनगढत कहानी है बीना किसी आधार के…अब क्या Supreme Court भी सरकार चलाती है क्या? कुछ तो लिहाज करो.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Next Post

क्या इंसाफ के लिए ऐसी कमेटी बनाई है?

-सुनील कुमार॥किसान आंदोलन को लेकर दो दिन पहले बड़ी हमदर्दी दिखाने वाला सुप्रीम कोर्ट उस शाम से ही शक के घेरे में था, कल आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश उस शक को गहरा कर गया, और शाम होते-होते यह साफ हो गया कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे […]
Facebook
escort eskişehir - lidyabet - macbook servis - kabak koyu
%d bloggers like this: