सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद..

सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद..

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नए कृषि कानूनों पर किसानों के आंदोलन को डेढ़ महीने से अधिक हो चुके हैं। दिल्ली की सीमाओं पर ठंड, बारिश, शीतलहर सबका सामना करते हुए बुजुर्ग, बच्चे, महिलाएं सभी किसानों के हक में डटे हुए हैं। इस बीच 9 बार किसानों के प्रतिनिधि, केन्द्रीय मंत्रियों के साथ बैठक कर चुके हैं और अब तक किसी वार्ता का कोई नतीजा नहीं निकला। दरअसल किसान कानूनों को रद्द करने से कम कुछ नहीं चाहते और सरकार का रुख है कि इस मांग के अलावा कोई और सुझाव, संशोधन किसान देना चाहें तो वो सुनेगी। इस स्थिति में वार्ताओं को असफल होना ही है। अब अगली बातचीत 15 जनवरी को होनी है।

लेकिन इससे पहले सोमवार का दिन किसान आंदोलन के लिए अहम रहा। दरअसल सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं किसान आंदोलन के विरोध में डाली गईं हैं। जनता को होने वाली तकलीफों का वास्ता किसी याचिका में दिया गया, तो किसी में शाहीन बाग मामले में सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों की याद दिलाई गई। किसान आंदोलन के कारण रोजाना करोड़ों का नुकसान हो रहा है, ऐसे तर्क भी दिए गए। किसान तो इस मसले का हल सीधे सरकार से ही चाहते हैं। लेकिन 9 जनवरी को हुई बैठक में सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट के जरिए किसी समाधान पर पहुंचने की उम्मीद जतलाई थी।  

क्योंकि 11 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में किसान आंदोलन पर फिर सुनवाई होनी थी।  इससे पहले इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने जनता के शांतिपूर्ण प्रदर्शन को उसका हक बताया था साथ ही 17 दिसंबर को हुई सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने केंद्र सरकार से कहा था कि वह इस पर विचार करे कि क्या कृषि कानूनों को होल्ड किया जा सकता है।  इस पर केंद्र की ओर से कहा गया था कि ऐसा नहीं किया जा सकता। और 11 जनवरी की सुनवाई में एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने कानूनों को कुछ समय रोकने की ही बात की। कुछ तल्ख लहजे में अदालत ने सरकार से कहा कि आप कानून को होल्ड कर रहे हैं या नहीं? अगर नहीं, तो हम कर देंगे। वार्ताओं की विफलता, सरकार की ओर से आंदोलन खत्म न करने की पहल, धरना स्थलों पर हो रही आत्महत्याएं, आंदोलन में बुजुर्गों, महिलाओं की भागीदारी

इन सब पर अदालत ने केंद्र सरकार के लिए नाराजगी दिखलाई। दूसरी ओर यह भी कहा कि हम प्रदर्शन के खिलाफ नहीं हैं।  विरोध जारी रह सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या विरोध इसी जगह पर होना चाहिए? अदालत ने शांतिपूर्ण आंदोलन में कुछ अप्रिय घटित होने की आशंका के साथ कहा कि हम नहीं चाहते कि कोई घायल हो। कोर्ट किसी भी नागरिक को ये आदेश नहीं दे सकता कि आप प्रदर्शन न करें, हां ये जरूर कह सकता कि आप इस जगह प्रदर्शन ना करें। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह सुनिश्चित हो कि प्रदर्शन में कोई हिंसा न हो, मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अगर जाने अनजाने में कुछ भी गलत होता है तो इसके लिए सभी जिम्मेदार होंगे। किसी भी क्षण छोटी-सी चिंगारी से हिंसा भड़क सकती है। 

आज की सुनवाई में सरकार ने अदालत में 26 जनवरी को होने वाली ट्रैक्टर परेड का मुद्दा भी उठाया। हालांकि किसान संगठन पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि वे राजपथ पर होने वाली परेड को बाधित नहीं करेंगे। लेकिन जिस तरह उनके उद्देश्यों पर आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं, उससे पता चलता है कि सरकार अब भी किसानों के लिए खुले मन से विचार नहीं कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने बेशक सरकार को मसले को ठीक से न संभालने के लिए फटकार लगाई है, लेकिन कानून रद्द होने की मांग अब भी अटकी ही हुई है।  दरअसल किसान इन कानूनों को पूरी तरह रद्द इसलिए कराना चाहते हैं ताकि उनके खेतों पर और उनकी मेहनत पर उद्योगपतियों का मालिकाना हक न हो जाए। मोदी सरकार ने कभी विकास के नाम पर, कभी खाली खजाने के नाम पर देश की सार्वजनिक संपत्ति का बड़ी निर्ममता से सौदा कर निजीकरण को बढ़ावा दिया है।

खेत-खलिहान पूरी तरह निजीकरण की चपेट में नहीं आए थे, इन कानूनों के लागू होने के बाद इसकी आशंका कई गुना बढ़ गई है। इसलिए किसान इस तरह संगठित होकर अहिंसात्मक तरीके से आंदोलन कर रहे हैं। लेकिन इस आंदोलन को भी तरह-तरह से बदनाम करने की कोशिश की गई। देशद्रोही और खालिस्तानी से होते हुए अब उन पर बर्डफ्लू फैलाने के इल्जाम भी सरकार समर्थकों की ओर से लग गए हैं। इस तरह की कोशिशें बता रही हैं कि किसानों के लिए कैसा तंग नजरिया सरकार का है। ऐसे में इस बात की संभावनाएं क्षीण होती जा रही हैं कि सरकार किसानों की मांग पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करेगी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट से किसानों के लिए राहत की उम्मीद बाकी है।

(देशबंधु)

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