किसानों की शहादत से हिली हुई दिखी अदालत..

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-सुनील कुमार॥॥
देश के सुप्रीम कोर्ट में जब कुछ बुनियादी बातों पर बहस चलती है, तो फिर वह सिर्फ वकीलों के बीच नहीं चलती जज भी उसमें हिस्सेदार रहते हैं। वैसे तो अदालती कार्रवाई में वकीलों का दर्जा जजों से अलग रहता है, लेकिन जज कई बार अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए वकीलों से जिरह करते हैं, और उनका नजरिया, उनका तर्क निकलवाने की कोशिश करते हैं। कई बार वे अदालती कार्रवाई के दौरान किसी औपचारिक फैसले, या आदेश के पहले भी जुबानी अपना रूख साफ करते हैं, और उनकी बातों को सुनकर दोनों पक्षों के वकील अपनी रणनीति में फेरबदल भी करते हैं। कानून की साधारण समझ रखने वाले लोगों को भी किसी अच्छे रिपोर्टर की लिखी गई अदालती कार्रवाई को पढक़र देश के संविधान, लोगों के बुनियादी हक और जिम्मेदारी, के बारे में बहुत कुछ समझने मिलता है।


आज जब सुप्रीम कोर्ट में किसान आंदोलन को लेकर दायर की गईं कई याचिकाओं को एक साथ जोडक़र सुनवाई की जा रही थी, तो अभी-अभी केन्द्र सरकार द्वारा बनाए गए किसान कानूनों को लेकर अदालत ने अपने तेवर दिखाए, और किसान आंदोलन को लेकर केन्द्र सरकार का जो रूख है उस पर तो खासी नाराजगी जाहिर की। सुप्रीम कोर्ट बेंच ने यह साफ कर दिया कि अगर सरकार खुद होकर इन कृषि-कानूनों पर रोक नहीं लगाती है, तो अदालत रोक लगा देगी। इस पर हक्का-बक्का केन्द्र सरकार के वकील ने कहा कि भारत का अदालती इतिहास रहा है कि वह कानून पर रोक नहीं लगा सकती। उन्होंने कहा कि जब तक कोई कानून विधायी क्षमता के बिना पारित न हुआ हो, या मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न करता हो, तब तक अदालत संसद के कानून पर रोक नहीं लगा सकती। इस पर अदालत ने साफ किया कि वह कानून पर रोक नहीं लगा रही है, लेकिन उसके अमल पर रोक लगा रही है। अब इस बारीक फर्क को लेकर देश के सबसे बड़े सरकारी वकील और जजों के बीच भी खुली बातचीत से यह खुलासा होता है कि कानून को रोकना, और उसके अमल को रोकना दो अलग-अलग बातें हैं।

किसान आंदोलन के शहीद

लेकिन इस एक मुद्दे से परे भी अदालत ने बहुत खुलकर केन्द्र सरकार की खिंचाई की है, और इस किस्म से किसान आंदोलन के दौरान हो रही मौतों पर भारी फिक्र जाहिर की है, और यह साफ किया है कि वह ऐसी मौतों के चलते चुप नहीं रह सकती, और इन मौतों के लहू से वह चुप रहकर अपने हाथ नहीं रंग सकती। अदालत ने किसान आंदोलन के दौरान किसी हिंसा के खतरे पर भी फिक्र जाहिर की, आंदोलनरत किसानों के बीच कोरोना जैसे किसी संक्रमण के फैलने का खतरा भी अदालत ने देखा, और यह साफ किया कि सुप्रीम कोर्ट को किसानों के भोजन-पानी की फिक्र है। अदालत ने सरकार से यह भी पूछा कि जिस तरह किसान खुदकुशी कर रहे हैं, क्या इस कानून को रोका नहीं जा सकता? अदालत ने कहा कि एक भी याचिका ऐसी नहीं है जिसमें कहा गया हो कि ये कानून अच्छे हैं, किसानों के भले के हैं। महीने भर से चल रही बातचीत को लेकर भी अदालत ने खफा होकर सरकार से कहा कि उसे यही समझ नहीं आ रहा है कि सरकार समाधान का हिस्सा है, समस्या का हिस्सा है? जाहिर है कि मीडिया में और सोशल मीडिया में जिस तरह किसानों की शहादत सामने आ रही है, उन्हें सुप्रीम कोर्ट अनदेखा नहीं कर पाया है।


अभी किसान आंदोलन पर, और किसान कानूनों पर अमल पर अदालत का फैसला बहुत दूर हो सकता है, और यह भी हो सकता है कि आज अदालत यह कड़ा रूख दिखाने के बाद अपने फैसले में सरकार के साथ दिखे, लेकिन आज अदालत का जो रूख है वह भी किसानों के लिए, और उनके हमदर्द हिन्दुस्तानियों के लिए राहत की बात है। अदालत के कहे हुए शब्दों से दो बातें साफ हैं, पहली बात तो यह कि संसद में बाहुबल से पास करवाए गए किसान विधेयकों को लागू करने की हड़बड़ी से सुप्रीम कोर्ट बिल्कुल भी सहमत नहीं है, और उसका कड़ा रूख दिख रहा है कि इनके अमल को रोक दिया जाए। दूसरी बात साफ दिख रही है कि इस आंदोलन में लोग जितनी तकलीफें उठा रहे हैं, जिस तरह बुजुर्ग और महिलाएं इसमें शामिल हैं, जिस तरह मौतें और खुदकुशी हो रही हैं, उनसे सुप्रीम कोर्ट हिला हुआ है। अदालत का ऐसा रूख भी इस देश के लोकतांत्रिक आंदोलनों के लिए मायने रखता है। ऐसा दिख रहा है कि किसानों और सरकार के बीच बेनतीजा सीधी बातचीत को देखते हुए अदालत एक कमेटी भी बना सकती है जो कि दोनों पक्षों से बात करके किसी किनारे पर पहुंच सके। कुल मिलाकर आज अदालत का रूख देश के किसानों और लोकतांत्रिक तबकों के लिए राहत का है, और पिछले कुछ समय से सुप्रीम कोर्ट को लेकर जनता में ऐसी सोच बन रही थी कि वह सरकार के साथ सहमत, या सरकार के फैसलों के प्रतिबद्ध न्यायपालिका है, यह धारणा आज के अदालती रूख से कुछ कमजोर जरूरी होगी। अदालत की जुबानी टिप्पणियों के बाद उसके आदेश, और उसके फैसले से किसानों को कितनी राहत मिलती है यह देखना अभी बाकी है, और उसमें लंबा वक्त लग सकता है। आगे-आगे देखें होता है क्या।

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