ये व्हाट्सऐप संदेश खतरनाक है

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मैसेजिंग ऐप व्हाट्सऐप को लेकर इस वक्त काफी खलबली मची हुई है। दरअसल हाल ही में इसके उपभोक्ताओं के सामने नई प्राइवेसी पालिसी रखी गई, जिसमें कहा गया है कि उपभोक्ताओं की जानकारियां फेसबुक और फेसबुक समूह की अन्य कंपनियों के साथ साझा की जाएंगी। गौरतलब है कि व्हाट्सऐप फेसबुक का ही एक अंग है। और इसके अलावा पांच अन्य कंपनियां भी फेसबक समूह का हिस्सा है। नई पॉलिसी के अनुसार ये सभी कंपनियां एक-दूसरे के डेटा को साझा कर सकती हैं। नई पॉलिसी 8 फरवरी 2021 से लागू हो जाएगी। और खास बात ये कि इसमें आपकी राय कोई मायने नहीं रखती हैं। यानी आप इस पॉलिसी से सहमत हैं तो ठीक, वर्ना नई पॉलिसी को स्वीकार नहीं करने की स्थिति में आप व्हाट्सऐप का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे।

व्हाट्सऐप की इस दादागिरी पर जब आपत्तियां उठने लगीं तो अब कंपनी की सफाई आई है कि उसके नए अपडेट से फेसबुक के साथ डाटा साझा करने की नीतियों में कोई बदलाव नहीं आएगा। व्हाट्सऐप के प्रमुख विल कैथार्ट ने कहा कि कंपनी ने अपनी नीति पारदर्शी होने और पीपुल-टू-बिजनेस के वैकल्पिक फीचर की जानकारी देने के लिए अपडेट की है। लेकिन इस सफाई के आने में देर हो चुकी है, क्योंकि अब व्हाट्सऐप को टक्कर देने के लिए सिग्नल और टेलीग्राम जैसे ऐप्स मैदान में उतर आए हैं। सिग्नल की पैरवी तो दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क ने की है।

भारत समेत कई देशों में इन मैसेजिंग प्लेटफार्म के उपभोक्ता अचानक बढ़ गए हैं और व्हाट्सऐप छोड़ने की मुहिम चल पड़ी है। लेकिन ये याद रखने की जरूरत है कि कोई भी कंपनी मुफ्त में अगर कुछ उपलब्ध करा रही है तो उसके पीछे उसका कोई न कोई मुनाफा जरूर होगा। बरसों पहले जब लोगों को शुद्ध घी खाने की आदत थी, तब वनस्पति घी बेचने के लिए गली-चौराहों पर गुमटियां लगाकर इससे बने व्यंजन मुफ्त खिलाए जाने लगे और इसके सैंपल मुफ्त दिए जाने लगे। नतीजा ये हुआ कि मुफ्त की आदत रोजमर्रा की जरूरत में शुमार हो गई। और वनस्पति घी भारतीय रसोई में साधिकार प्रवेश कर गया। मार्केटिंग गुरु मुफ्त की इस तकनीक का इस्तेमाल अब भी करते हैं और ग्राहक मुफ्त के जाल में फंसने के नुकसान को समझते हुए भी इसकी ओर खिंचे चले जाते हैं।

बहुत सी सोशल वेबवाइट्स और ऐप्स  इसी तरह ग्राहकों को आकर्षित करने में कामयाब हुई हैं, जहां आप सोचते हैं कि मुफ्त में मिनटों में संदेशों के आदान-प्रदान की सुविधा आपको मिली है। लेकिन इसके बदले निजता खोने की जो बड़ी कीमत चुकाई जा रही है, उसका अहसास अब हो रहा है जब व्हाट्सऐप यह बतला रहा है कि आपसे जुड़ी जानकारियां वो फेसबुक के साथ साझा करेगा। अब इसे कंपनी की दादागिरी कहें या व्यावसायिक ईमानदारी कि जो वो करने जा रहा है, उसके बारे में आपको पहले ही सचेत किया जा रहा है। लेकिन ये भी एक सुहावना भरम ही है कि अब तक आपकी निजता की पूरी सुरक्षा हो रही थी। 

दरअसल सभी सोशल मीडिया ऐप्स किसी न किसी तरह आपसे संबंधित डेटा इकठ्ठा कर लेते हैं और फिर बड़ी कारोबारी कंपनियां उनका विश्लेषण कर अपने ग्राहकों को लुभाने के लिए नयी स्कीम तैयार करती हैं। इन ऐप्स के इस्तेमाल से पहले जो कानूनी चेतावनी या समझौता आपकी स्क्रीन पर उभरता है, वो अमूमन बहुत लंबा होता है और उसकी भाषा इतनी जटिल और घुमावदार होती है कि सामान्य व्यक्ति के लिए उसे समझना कठिन होता है। हमारा रवैया अक्सर ये होता है कि इतना सब कौन पढ़े और हम झट से स्वीकार वाला विकल्प चुन लेते हैं। हम सोचते हैं कि जो हमारे सामने नहीं है, उससे कैसा खतरा। और इस तरह इन अदृश्य खिलाड़ियों के हाथों हम नाचने लगते हैं। सुबह उठते ही गुडमार्निग मैसेज, दिन भर की गपशप, चुटकुले, पकवानों की रेसिपी से लेकर कारोबार की बातें भी हम मुफ्त मैसेजिंग ऐप पर करने लग गए हैं और दुनिया के किसी कोने में हमारी सारी बातें कोई सुन रहा होगा या देख रहा होगा।

आप किसको कॉल या मैसेज करते हैं, आपकी लेन-देन संबंधी जानकारी, शिपिंग डिटेल, पेमेंट का तरीका,  प्रोफाइल फोटो, आपका डिस्क्रिप्शन, आपके डिवाइस का आईपी एड्रेस, आपके फोन नंबर का एरिया कोड, आपके फोन का ऑपरेटिंग सिस्टम कौन सा है, आपका बैटरी लेवल क्या है, आपके फोन में सिग्नल कितना है, आपका फोन नंबर क्या है और आप किस कंपनी का सिम इस्तेमाल करते हैं, ऐसी तमाम जानकारियां व्हाट्सऐप और दूसरी सोशल वेबसाइट्स ले सकती हैं, बल्कि ले ही रही हैं। दुनिया के कई देशों में निजता की सुरक्षा और साइबर अपराधों को लेकर कड़े कानून हैं, लेकिन भारत का प्रोद्यौगिकी सूचना क़ानून (आईटी ऐक्ट), 2000 पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन और साइबर सुरक्षा पर कुछ हद तक ही कारगर है। इस वक्त व्हाट्सऐप जो नई पॉलिसी ला रहा है, वो इस कानून के खिलाफ है, देखना यही है कि सरकार इस पर कोई कदम उठाती है या लोगों की निजता के साथ खिलवाड़ जारी रहने देती है।

(देशबंधु)

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