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स्वयंभू निष्कपट और मूर्ख राजा से चतुर राजा अवाम के लिए बेहतर साबित होता है..

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-दिनेश शर्मा॥

एक समय की बात, एक बड़े विशाल राज्य का राजा चतुर था वो जानता था कि सारी की सारी आवाम अप्रत्यक्ष रूप से कर चुकाती है, इस आधार पर सारी जनता तक कुछ न कुछ पहुंचना चाहिए। उसे कर चुकाने और न चुकाने के आभासी जाल में फांसना ठीक नहीं । सब ठीक चल ही रहा था तो राजा अपनी नीतियों को धीरे धीरे लागू करने की जोड़ गांठ करता रहता था रातों रात अच्छे दिन लाने के सपने बेचने की जरूरत नहीं थी। होता ये के चतुर राजा जनता के कर से विकास रूपी केक काटता अब क्यूंके राजा चतुर था तो केक में से पहले जनता को देने की बात करते हुए केक के छोटे छोटे टुकड़े करके आवाम में बांट देता और आखरी बड़ा हिस्सा अपने पास रख लेता। आवाम अपना अपना हिस्सा लेती जाती और घर चली जाती। अंत तक राजा के पास कोई न बचता और बड़ा हिस्सा राजा के पास रह जाता। उसी हिस्से से आवाम ने अपने बच्चे पढ़ाये लिखाये, बड़ी नौकरियों में हिस्सेदारी की , खेती किसानी में नई मशीनें ट्रेक्टर का उपयोग शुरू हुआ, पक्के मकान बनवाये, सड़को पे कारों के जखीरे तैरने लगे, खूब तरक्की की, कंप्यूटर लैप टॉप मोबाइल इंटरनेट तक पुरानी अवाम की नई नस्लें पहुंची। धीरे लोग खाये पिये अघाये हो गए।

अब सूचनाक्रांति का नया दौर था, किसी रोज़ किसी ने राजा के आखरी में बचे केक की फ़ोटो को इंटरनेट पर डाल दिया। लोगो को बताया गया के उनका विकास और कृपा वहाँ अटकी है, रात दिन के प्रलाप से अब लोगो को भी लगने लगा के हमारा विकास तो हुआ नहीं है। हमें तो केक के छोटे टुकड़े मिले। क्रांति शुरू हुई राजा बदल गया । अब लोगो को लगा के केक का बड़ा टुकड़ा मिलेगा। लोग खुश थे , जबरदस्त भीड़ लगी। संतुष्ट लोगो ने भी बड़े टुकड़े की लालच में नए राजा का समर्थन किया। अब पहले से अर्जित राज्य की साधन संपत्ति के सौदे होने लगे। और विकास रूपी पहले से बड़ा केक मंगवाया गया। अवाम को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर देने वालो में बांटा गया उसी आधार पर पंक्तियां बनाई गई। खैर सभी खुश थे।और इंतज़ार था के बड़ा टुकड़ा मिलेगा।
नए राजा ने एलान किया केक के टुकड़ों की पहले निशानदेही होगी ताकि सब मे बराबर हिस्से किये जा सके। किसी को एक तौला भी कम नही मिलेगा।
कर्णभेदी शोर उठा। फिर राजा ने कहा जब तक केक में निशानदेही होती है आप अपने कर का ब्यौरा और देश के लिए अपने योगदान की लिखित प्रति जमा करवा दे।
5 वर्ष तक निशान देही चलती रही। छटे वर्ष राजा ने और 5 वर्ष इन्तज़ार को कहा, तब तक आवाम थक चुकी थी , परंतु सोचा के चलो अब के केक का बड़ा टुकड़ा मिल ही जायेगा।
उधर राजा उछल उछल कर कपड़े बदल बदल कर केक में बराबर टुकड़ो की निशानदेही करता रहा।
एक दिन वो भी आया के मुनादी हुई के आज केक के टुकड़े होंगे।
केक 6 वर्ष पुराना हो चुका था पर एक उम्मीद थी बराबर बराबर बड़े बड़े टुकड़े मिलने की। राजा ने कहा प्लास्टिक के चाकू से केक नहीं काटा जाएगा ये हमारी संस्कृति के विरुद्ध है। हम अपनी पूर्वजो की तलवार से केक काटेंगे। निशानदेही भी ठीक से हुई नही थी राजा के मंत्रियों ने आगाह किया। परंतु राजा को अपने कौशल पे पूरा भरोसा था। उसने तलवार मंगवाई , तलवार भारी थी और उपयोग में न होने के कारण चाकू से भी कम धार थी । कुल मिलाकर भोथरी तलवार थी। राजा ने मूछों पर ताव देते हुए भोथरी तलवार केक पर दे मारी। भला भोथरी तलवारों से केक कटा करते है, केक के दो टुकड़े हुए और उस भोथरी तलवार से चिपके हुए हवा में उछले और ध……..प्प की आवाज के साथ दोनों टुकड़े उल्टे होकर जमीन पर आ गिरे । सभा मे शांति छा गयी। केक के ऊपर लगी चेरी ही केक में असली थी जो राजा के सर के ऊपर से होते हुए पीछे लपक ली गई। राजा ने तुरंत स्थिति को संभालते हुए कहा के देखो मैंने कहा था न ” ना खाऊंगा ना खाने दूंगा” अब इसे कोई भी नहीं खा सकता। मंत्रियों ने सभा में लोमहर्षक ध्वनि की।
अब राजा ने कहा मैं इससे भी बड़ा केक मंगवाऊंगा आप चिंता मत करिए ये कहते हुए कर बढ़ा दिए गए। आवाम की हालत खस्ता हो चुकी थी वो मन मारे घर की और लौटने लगे। घर लौटते हुए वो सोच रहे थे के भाई अब तो छोटा टुकड़ा भी नहीं मिल रहा, और वो दो आदमी कौन थे जो राजा के पीछे खड़े थे और उस असली चेरी को लपक ले गए?
समझिए इस बात को निष्कपटता सही निर्णय की गारंटी नहीं होती। कोई आदमी निष्कपट और ईमानदार होते हुए भी गलत हो सकता है।
और आप क्या सोच रहे है के कहानी का राजा तो निष्कपट भी नहीं था , निरा मूर्ख था ? सही सोच रहे है ।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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