कृषि कानूनों का मर्म समझने के लिए इससे बेहतर कुछ नहीं..

कृषि कानूनों का मर्म समझने के लिए इससे बेहतर कुछ नहीं..

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-वीरेन नंदा॥

भारत के किसान मोदी के कृषि कानूनों को काले कानून क्यों कह रहे हैं? इसे समझने की जरूरत है.. आखिर यह तीनों काले कानून है क्या बला? इन्हें किसे फायदा पहुँचाने के लिए बनाया गया है?

यह बात खासकर बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश के किसानों को समझने की जरूरत है क्योंकि यहाँ के किसान उस तरह आंदोलित नहीं हैं जैसे पंजाब, हरियाणा या हिमांचल या पश्चिम यूपी आदि के.

इसका सीधा अर्थ है कि वे खास कर बिहार के किसान इस कानून को सही ढंग से या तो समझ नहीं रहे या मोदी द्वारा उनके खाते में 6 हजार डाले जाने से संतुष्ट हैं..लेकिन यह संतुष्टि उनकी मौत का पैगाम है..

आइये अब बात करें इन तीनों कानूनों पर और होने वाले परिणामों पर..जो कई जगह सामने आने भी लगे हैं..

पहला कानून है- “कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा ) कानून, 2020” :

इस काले कानून के तहत वर्तमान कृषि मंडियों के साथ प्राइवेट मंडियों को खोलकर यह बताया गया कि अब किसान अपनी फसल कहीं भी बेच सकता है.. लेकिन मोदी की चालाकी समझिए कि इस कानून के क्या-क्या परिणाम होंगे, उस पर गौर करें-

1. किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिलेगा क्योंकि राज्य सरकार के अधिकार खत्म कर दिए गए..

2. इस कानून से राज्य सरकार द्वारा राज्य की मंडियों द्वारा खरीदी गई फसल को FCI के माध्यम से किसानों से फसल खरीदने की गारंटी समाप्त कर दी गई है..

3. बैंक से किसान क्रेडिट कार्ड या कैश क्रेडिट की सुविधा खत्म हो जाएगी..

4. राज्य सरकार वर्तमान मंडियों से जब फसल नहीं खरीदेगी तो कॉरपोरेट के दलाल कौड़ियों के भाव किसानों से फसल खरीदेंगे और किसान उन्हें बेचने को मजबूर होंगे क्योंकि वे किसी दूसरी जगह अपनी फसल बेच नहीं पाएंगे..

5. जब FCI किसानों के फसल नहीं खरीदेगा तब गरीबों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली से मिलने वाला सस्ता अनाज मिलना समाप्त हो जाएगा..

6. कारपोरेट पूरे देश का अनाज अपने गोदाम में जमा कर कालाबाजारी कर सकते हैं, क्योंकि तीसरे कानून ‘आवश्यक वस्तु (संशोधन ) कानून 20’ के तहत अब ‘जमाखोरी को अपराध मुक्त’ कर दिया गया है।

7. जमाखोरी कर पूरे देश का अनाज कॉरपोरेट के हाथ में जब चला जायेगा तब अंबानी याा अडानी जैसे कॉरपोरेट किसानों के अनाज किस भाव बेचेंगे यह अभी से सोच लीजिये.. वर्तमान में जब कुछ व्यापारियों द्वारा जमाखोरी कर आलू का भाव 60 रुपये तक पहुँचाया जा सकता है तो सोचिए जब पूरे देश का अनाज एक दो हाथों में कैद हो जाएगा तो किस भाव गेंहू-चावल हमें मिलेगा ? क्या इससे सिर्फ किसान प्रभावित होंगे ? नहीं, देश की पूरी 130 करोड़ आबादी प्रभावित होने जा रही..

अभी करीब 30 करोड़ आबादी देश में भुखमरी की शिकार है..इस कानून के लागू होते ही 99.9999 प्रतिशत जनता भुखमरी की शिकार होगी..

दूसरा कानून है- “मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवा संबंधी किसान समझौता (सशक्तिकरण और सुरक्षा) कानून 2020” :

इसे मोदी ने ‘जोखिम रहित कानूनी ढाँचा’ कहा है.. इस काले कानून के अनुसार फसल की बोआई के समय किसान को उससे प्राप्त होने वाले मूल्य की जानकारी मिल सके और फसल की गुणवत्ता में सुधार हो सके..अब इस कानून से इसके दुष्परिणाम क्या होंगे उसपर गौर करने से पहले 2019 में ‘कॉन्ट्रैक्ट खेती’ के कारण एक बड़ी घटना को याद दिलाना चाहता हूँ..

गुजरात के साबरकांठा जिले में कुछ किसानों के साथ एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ‘पेप्सिको’ ने चिप्स बनाने के लिए एफसी5 नामक अपने पेटेंट किस्म के आलू की खेती के लिए कॉन्ट्रैक्ट किया..बाद में किसानों द्वारा उपजाए आलू को उसने लेने से इनकार कर इस आधार पर कर दिया कि उसके मानक पर यह आलू खरा नहीं उतरा था.. इसलिए उस उपज को नष्ट करने को किसानों को कहा गया..लेकिन इसका मूल्य न मिलता देख कुछ किसानों ने इसे दूसरे को बेच दिया और कुछ ने बीज के लिए अन्य को बेचा..पेप्सिको ने 9 किसान पर 4 करोड़ से ज्यादा का हर्जाना मांगा, इस आधार पर कि किसान “अनुबंध खेती” के तहत कंपनी को ही आलू बेच सकते हैं और बीज भी उन्हीं से लेना होगा और मानक पर खरा न उतरने पर आलू को नष्ट करना होगा, न कि किसी अन्य को बेचना.. अब इस काले कानून से होने वाले असर को समझिए.
1. इस कानून के तहत अनुबन्ध खेती के जरिये मोदी सरकार ने अपने अडानी-अम्बानियों
जैसे कॉरपोरेट घरानों के लिए फायदे की जमीन तैयार की है..
2. इस अनुबंध के जरिये कॉरपोरेट घरानों के पास जब खेतों में उत्पादन का अधिकार मिल
जाएगा तब किसान अपनी मनमर्जी की फसल नहीं उगा पाएंगे..उन्हें वही उपजाना होगा
जो कॉरपोरेट कहेगा और वही उपजाने को ऑर्डर देगा जिसमें उसे ज्यादा मुनाफा होगा..
3. गेंहू-चावल वह तब तक नहीं उपजाने को कहेगा जबतक कि उसे अकूत मुनाफा नहीं मिलेगा..
4. किसान बुरी तरह बर्बाद हो जाएंगे क्योंकि वे इस कानून से इस तरह जकड़ दिए जाएंगे कि वे अपने ही खेत में मजदूर की तरह अम्बानी अडानी जैसों की गुलामी करेंगे..
5. इस अनुबंध के तहत किसानों को उन्हीं मुनाफाखोरों से खाद, बीज, मशीन, तकनीक, और कर्ज लेना पड़ेगा..
6. सरकार कह रही कि किसान की जमीन किसान की ही रहेगी लेकिन सोचिए, जब फसल
कॉरपोरेट के मानक पर खरी नहीं उतरेगी तब उसे वह तत्काल नष्ट करने को कहेगा..
आप उसे दूसरे को बेच नहीं पाएंगे ! तब खेती करने के लिए जो खाद, बीज, मशीन,
तकनीकी सहायता और जो कर्ज उसने दिया था, वो उसकी क्रूरता से वसूली करेगा.. और किसान उसे चुकाने की स्थिति में नहीं होंगे तो वह नए कानून के मुताबिक कॉरपोरेट अपने कर्ज को
वसूलने को राजस्व नियमों के तहत किसान की जमीन कुड़की या नीलाम करा देगा..
7. नए नियमानुसार किसान कोर्ट का दरवाजा भी नहीं खटखटा सकते हैं..

तीसरा कानून है- “आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून 2020”:

इस कानून के तहत जमाखोरी को अब अपराध की श्रेणी से हटा दिया गया है..अब जमाखोरी करने पर कोई सजा नहीं होगी..उसके क्या परिणाम क्या होंगे, देखिए –
1. आवश्यक वस्तु कानून की श्रेणी से आलू, प्याज, दलहन, तिलहन आदि जैसी रोजमर्रा की चीजों को हटा दिया गया है.. इससे किसान भी लुटेंगे और उपभोक्ता भी लुटेंगे..
2. आवश्यक वस्तु यानी रोजमर्रे की चीजों को भी उपभोक्ता माल बना दिया गया है..
3. जब सरकार फसल नहीं खरीदेगी, तो कॉरपोरेट का ही देश के सम्पूर्ण अनाज पर जमाखोरी के जरिये कब्जा हो जाएगा तो वे देश में आवश्यक वस्तु (जैसे- गेहूँ, चावल, मकई, दाल, तिलहन, आलू, प्याज आदि रोजमर्रे की आवश्यक वस्तु, जिससे आदमी की भूख मिटती है) का अपने मुनाफे के लिए कृत्रिम अभाव पैदा करेगा.. तो क्या केवल किसान ही इससे प्रभावित होंगे ? नहीं, देश की करीब 130 करोड़ आबादी प्रभावित होगी और लोग उन वस्तुओं के ऊँचे दाम नहीं दे पाएंगे, तब ? तब देश की पूरी आबादी क्या भूखे मरने को कतारबद्ध नहीं खड़ी दिखेगी!!
यह गौर करने वाली बात है कि इस काले कानून के आने के पहले से ही कॉरपोरेट घराने ने इस पर अपना काम करना शुरू कर दिया था..अदानी समूह की ‘एग्री लोजिस्टिक लिमिटेड’ के बड़े-बड़े गोदाम देश के बठिंडा, बरनाला, मोगा, मनसा, देवास, होशंगाबाद, कन्नौज, कटिहार, दरभंगा, सतना, समस्तीपुर, उज्जैन, पानीपत आदि जगहों में बन चुके हैं और कई निर्माणाधीन हैं.. मुनाफे की गंगा में हाथ धोने की देश की और बाहर की भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ इस ओर रुख कर चुकी हैं, जैसे, वालमार्ट, रिलायन्स, पतंजलि आदि.

जब देश के कृषि मंत्री कहते हैं कि नए कृषि कानूनों को वापस लेने से कॉरपोरेट का विश्वास सरकार पर से उठ जाएगा तो इसका मतलब समझिए..

यह तो हुईं तीन काले कानूनों की कुंडली.
अब आइये देखें बिजली सुधार और वायु प्रदूषण कानून !
बिजली सुधार अध्यादेश :

इस कानून के तहत बिजली क्षेत्र को निजी हाथों में सौंपने का मार्ग तैयार कर दिया है.. इसके तहत सभी उपभोक्ताओं को समान बिजली दर देना होगा..चाहे वह बड़े उद्योगपति हों, किसान हों या आम उपभोक्ता या बीपीएल धारक.. सभी को एक ही रेट से बिजली मिलेगी..

वायु प्रदूषण अध्यादेश:

इस कानून के तहत पराली जलाने वाले किसान को 1 करोड़ रुपये तक का जुर्माना और पाँच साल तक कि सजा देने की बात कही गई है. यहां यह दोमुहाँपन देखिए कि कॉरपोरेट घरानों के उद्योग से निकलने वाले कचरे और प्रदूषण पर कोई बात नहीं कि गई है..

यह स्पष्ट रूप से सामने आ गया है कि कॉरपोरेट घरानों को अकूत मुनाफा पहुँचाने के लिए ही यह तीनों काले कानून लाये गए हैं ताकि मोदी सरकार, भाजपा और आरएसएस को धाराप्रवाह फंड मिलता रहे और वे इस धन की बदौलत सत्ता पर हर हाल में कब्जा जमाये रखें..

दरअसल जो किसान करीब तीन साल से ज्यादा समय से खेती में लागत का डेढ़ गुणा मूल्य सरकार से मांग रहे थे और कर्ज मुक्ति की गुहार लगा रहे थे, वो अब खेती के कॉरपोरेटीकरण और खाद्य सुरक्षा पर होने वाले खतरे को देख अपना अस्तित्व बचाने में जुट गए हैं, जिसका समर्थन देश के सभी वर्गों को करना चाहिए अन्यथा देश का हर नागरिक कॉरपोरेट सेक्टर का गुलाम बनने के लिए अभिशप्त होगा.. मर्जी आपकी कि आप फिर से गुलाम देश में रहेंगे या 70 वर्ष पहले मिली आजादी की सांस लेते हुए जिएंगे-मरेंगे.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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