गोरों के शासन की याद ताजा..

गोरों के शासन की याद ताजा..

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2020 की 30 दिसंबर को सरकार से नाकाम वार्ता के बाद 2021 की 4 जनवरी को किसान संगठनों के प्रतिनिधि फिर सरकार के साथ नए कृषि कानूनों पर चल रहे गतिरोध को खत्म करने के लिए बैठे। विज्ञान भवन में किसान प्रतिनिधियों के साथ वार्ता के लिए आए केन्द्रीय मंत्रियों व अधिकारियों ने आंदोलन के दौरान जान गंवाने वाले किसानों के दो मिनट का मौन रखा। दिवंगतों की आत्माओं को इस मौन से शांति मिलेगी, ऐसी सोच इसके परंपरा के पीछे है।

लेकिन जिन कारणों से किसानों को अपनी जान गंवानी पड़ी, जब वे वहीं के वहीं मौजूद हैं तो उन्हें शांति कैसे मिलेगी। सरकार ने इससे पहले जब भी वार्ता की, या चिट्ठी लिखी या प्रेस कांफ्रेंस की, उसमें कहीं भी आंदोलनरत किसानों की तकलीफों या उनकी मौतों के लिए संवेदना के दो शब्द नहीं निकले। अब जबकि आंदोलन 40 दिन से अधिक का हो चला है औऱ 50 से अधिक किसानों की मौत हो चुकी है, सरकार दो मिनट का मौन धारण कर अपना नरम चेहरा दिखाने की कोशिश कर रही है।

लेकिन वार्ता में जिस तरह की सौदेबाजी की कोशिश हुई, उससे यह पता चलता है कि मोदी सरकार व्यापार की भाषा ही इस्तेमाल करती है, संवेदना की नहीं। इस बार भी वार्ता का कोई अंतिम नतीजा तो सामने नहीं आया है, लेकिन अब वार्ता की अगली तारीख मिल गई है। अब 8 जनवरी को फिर किसान औऱ सरकार के प्रतिनिधि बैठेंगे। दरअसल सरकार फिर कानून वापस लेने की जगह संशोधन की बात कर रही है।

इसके लिए संयुक्त समिति बनाने का प्रस्ताव किसानों को दिया गया, जिससे उन्होंने इंकार कर दिया है। 4 जनवरी की वार्ता से किसानों को काफी उम्मीदें थीं कि नए साल पर उन्हें कोई खुशखबरी मिलेगी। लेकिन सरकार का अड़ियल रवैया इन उम्मीदों पर भारी पड़ता दिखा। पिछली वार्ता में बिजली और पय़ार्वरण को लेकर किसानों की मांगें मानकर सरकार ये प्रचारित कर रही थी कि आंदोलनकारियों की 50 प्रतिशत मांगें मान ली गईं हैं, जबकि सरकार भी जानती है कि ये आंदोलन बिजली औऱ पय़ार्वरण को लेकर बने कानून पर खड़ा नहीं हुआ था। बल्कि किसानों की असल मांग एमएसपी की कानूनन गारंटी औऱ नए कानूनों की वापसी है, जिस पर सरकार अब भी गोलमोल बात कर रही है।

जब किसान कह रहे हैं कि उन्हें कोई संशोधन मंजूर नहीं, बल्कि वे कानून ही नहीं चाहते हैं, तो सरकार सीधे उन मांगों पर अपना फैसला क्यों नहीं सुनाती। 4 जनवरी का दिन ऐतिहासिक हो सकता था, अगर सरकार बिना शर्त के किसानों की मांगें मान लेती। लेकिन अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सरकार और किसानों के बीच का टकराव भी खतरनाक मोड़ की ओर बढ़ सकता है औऱ जाहिर है इसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार पर होगी। किसान तो बिल्कुल गांधीवादी तरीके से अपना विरोध जतला रहे हैं, लेकिन मौजूदा सरकार ब्रिटिश राज से प्रेरित लगती है, जिसे ऐसे आंदोलनों से अपने साम्राज्य की जड़ें उखड़ती दिखाई देती हैं। दो-तीन दिनों से मौसम भी जैसे किसानों के सब्र और हिम्मत का इम्तिहान लेने में लगा है।

रविवार और सोमवार को हुई तेज बारिश ने ठंड के साथ सड़कों पर जमा किसानों की तकलीफें भी बढ़ा दीं। लेकिन किसानों ने इस इम्तिहान को सौ प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण कर लिया। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं, पुरुष सब पहले के जोश के साथ डटे रहे। वे जानते हैं कि वे आज पीछे हटे तो फिर इतना पीछे धकेल दिए जाएंगे कि मुख्यधारा में शामिल होना कठिन हो जाएगा। दिल्ली में तो 26 नवंबर से यह आंदोलन शुरु हुआ है, लेकिन इससे पहले से पंजाब में इन नए कानूनों का विरोध हो रहा था। तब रेलवे ट्रैक पर किसान जमा थे। सरकार जिस तरह चोरी-छिपे नए कानूनों को लेकर आई, और उसके बाद पंजाब में आंदोलकारियों के प्रति उसका निष्ठुर रवैया रहा, उसी से उसकी नीयत का पता चलता है। अब भी यही रवैया सरकार दिखा रही है, फर्क यही है कि इस बार वार्ताओं का मुखौटा सामने है, जिसके उतरने में अब शायद देर नहीं है। 

इतिहास को पलट कर देखिए अंग्रेज शासकों ने भी इस तरह के कितने मुखौटे बार-बार पहने औऱ ये दिखाने की कोशिश की कि वे जो कुछ कर रहे हैं काले भारतीयों के भले के लिए कर रहे हैं। कंपनी बहादुर के इन मुखौटों को स्वाधीनता सेनानियों ने पहचान लिया था औऱ हर बार उन्हें बेनकाब किया था। दुखद है कि भारत में एक बार फिर वही इतिहास दोहराया जा रहा है। बस शासकों का चेहरा बदल गया है, लेकिन शासितों की नियति नहीं। क्या इसी नियति के साथ हम गणतंत्र दिवस मनाएंगे। देश इस पर गंभीरता से विचार करे।

(देशबंधु)

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