ईयू और ब्रिटेन से सीख सकती है बाकी दुनिया..

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-सुनील कुमार॥
नए साल का पहला दिन यूरोपीय यूनियन के लिए बहुत अलग किस्म का है क्योंकि ब्रिटेन आज उससे अलग है। यूनाईटेड किंगडम, यूके, नाम से प्रचलित ब्रिटेन 1973 में यूरोपीय समुदाय में शामिल हुआ था, और आधी सदी के जरा से पहले वह उससे अलग हो गया। दुनिया में देशों के कई किस्म के संगठन हैं, मुस्लिम देशों का अलग संगठन हैं, दक्षिण एशिया के देशों का अलग संगठन हैं, पेट्रोलियम उत्पादक देशों का अलग संगठन हैं, अमरीका की अगुवाई में सैनिक संधि वाला देशों का एक संगठन हैं, लेकिन यूरोपीय यूनियन, ईयू, सबसे ही अलग और सबसे वजनदार संगठन है। इस मायने में कि इसके सदस्य देशों के बीच आवाजाही के लिए कोई वीजा नहीं लगता था, एक-दूसरे में टैक्स-मुक्त कारोबार हो सकता था, और भी कई किस्म की ऐसी बातें ईयू में थीं कि वह एक संगठन से अधिक, प्रदेशों का एक देश सरीखा लगता था। अब अपने एक सबसे बड़े और ताकतवर सदस्य को खोकर ईयू के लिए भी एक नई दिक्कत की शुरुआत है, और ब्रिटेन के लिए भी। यूनाईटेड किंगडम के भीतर ब्रिटेन के साथी-देशों में भी ईयू से अलग होने पर असहमति है, और जिस ब्रिटेन ने बहुमत से अलग होने का जनमतसंग्रह किया था, वह ब्रिटेन भी इससे हिला हुआ है।
यूरोपीय यूनियन का मानना है कि अलग होने के इस फैसले, ब्रेग्जिट से ईयू और ब्रिटेन दोनों कमजोर होंगे। पूरे योरप में कम से कम दो पीढिय़ां ऐसी निकल चुकी हैं जिन्होंने ब्रिटेन और ईयू को एक ही देखा था, और इस एकता के तमाम फायदे पाए थे। अब इतने बड़े और संस्थापक देशों में से एक, ब्रिटेन के बाहर होने से ईयू भी कमजोर होगा जो कि पश्चिमी दुनिया में अमरीकी एकाधिकार के मुकाबले एक अलग किस्म की ताकत बनकर खड़ा हुआ था।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ब्रेग्जिट के मुद्दे पर ही जीतकर सत्ता पर आए थे, और उन्होंने कहा है कि अब ब्रिटेन के हाथों में आजादी आई है। बाकी यूरोपीय यूनियन भी यह मानता है कि ब्रिटेन से किसी न किसी किस्म के संबंध ईयू के बने रहेंगे, लेकिन ब्रिटेन और बाकी ईयू के बीच कामकाज कैसे चलेगा, नए व्यापार-नियम कैसे काम करेंगे, यह सब अभी असमंजस में डूबा रहस्य ही है। इस बारे में लिखने की जरूरत आज इसलिए हो रही है कि दुनिया के और दूसरे देशों में जहां ऐसे लचीले संबंधों वाले संगठन बनाने की बात होती है, उन्हें भी इससे सबक लेना चाहिए कि हर देश के लोगों की अलग-अलग महत्वाकांक्षाएं होती हैं, और जब किसी बड़े संगठन का हिस्सा बनकर अपनी संभावनाओं को दूसरों के साथ बांटना पड़ता है, तो अपने देश की सरकार पर, सत्तारूढ़ पार्टी पर एक बड़ा दबाव पड़ता है। हिन्द महासागर के भारत वाले इलाके में पड़ोसी देशों के साथ अधिक गहरे कारोबारी, और आवाजाही संबंधों की बात बहुत से आशावादी लोग हमेशा ही करते हैं। लोगों को लगता है, और सही लगता है, कि भारत और पाकिस्तान के बीच फौजी-सरहदी तनाव कम हो, तो दोनों देशों की अपनी फौजों पर बड़ी बर्बादी भी घटेगी जो कि सरहद के दोनों तरफ के गरीबों के काम आएगी। ब्रिटेन और ईयू के रिश्ते टूटने को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच अच्छे रिश्ते चाहने वालों को निराश होने की जरूरत नहीं है। अखंड भारत का फतवा देने वाले युद्धोन्मादियों से परे कोई भी ऐसी संभावनाएं नहीं देखते कि भारत और पाकिस्तान की सरहद मिट जाएगी। पाकिस्तान एक हकीकत है जो कि मिट नहीं सकती। और भारत और पाकिस्तान के बीच अपनी-अपनी घरेलू वजहों से सरहदी तनाव बनाए रखने की राजनीतिक मजबूरी भी दोनों सरकारों के सामने रहेगी, इसलिए भी भ्रष्ट हथियार खरीदी जारी रहेगी। ईयू से ब्रिटेन के अलग होने की कोई तुलना भारत और पाकिस्तान के अलग होने से नहीं की जा सकती, लेकिन जिस तरह ईयू एक संगठन बना था, वैसा कोई संगठन भारत के इर्द-गिर्द मुमकिन नहीं है। जिस तरह अलग होने के बाद भी ईयू और ब्रिटेन के बीच सभ्य समाज जैसे रिश्ते बचे रहेंगे, वही एक मिसाल भारत और पाकिस्तान के काम आ सकती है कि विभाजन के बाद भी एक शांतिपूर्ण सहअस्तित्व संभव है। जो लोग अपनी तंगसमझ, अपने तंगनजरिए, और अपने बहुत सीमित-स्वार्थी एजेंडा से परे दुनिया को देखना जानते हैं, वे दुनिया की आज की घटनाओं के तजुर्बे का फायदा उठा सकते हैं। शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की सोच दुनिया के बहुत से देशों के बीच एक समझदारी स्थापित कर सकती है। सरहदें मिटना न आसान है, और न हर मामले में समझदारी ही है, लेकिन सरहद के दोनों तरफ एक-दूसरे की मौत की कामना किए बिना जीना तो मुमकिन है।

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