किसान आंदोलन से नुकसान: नरेंद्र सिंह तोमर

किसान आंदोलन से नुकसान: नरेंद्र सिंह तोमर

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-वीरेंदर भाटिया॥

30 दिसम्बर की बैठक में मन्त्री जी ने किसान संगठनो से कहा कि आपने हमारा बहुत नुकसान कर दिया है। इस वाक्य के बाद मीटिंग में तल्खी आ गयी और काफ़ी देर तक गतिरोध बना रहा। गोकि सरकार का नुकसान 26 मौतों से ज्यादा है, गोकि 33 दिन से घर से दूर सड़क पर पड़े किसान देश की सरकार के लिए कोई मायने नही रखते। गोकि किसानों का करोड़ो रुपया जो आंदोलन पर लग रहा है और करोड़ो का उनका पीछे नुकसान हो रहा है उसकी कोई गणना सरकार की इस नुकसान की गणना में नही है।

किसान आंदोलन से सरकार बता रही है कि उनका ट्रांसपोर्ट ठप्प है, दिल्ली के आसपास की फैक्टरियाँ बन्द हैं, रोजगार ठप्प है आदि। क्या सच मे यह सरकार इन चीजों से चिंतित होती है? जवाब है कदापि नही। नोटबन्दी और लोकबंदी वाली सरकार पूरा देश बन्द करके भी किसी बन्द होने की परवाह नही करती। सरकार की चिंता दरअसल दूसरे नुक्सान की है। सरकार का आनुषंगिक अंग जिसे आरएसएस कहते हैं उसने हिन्दू मुस्लिम करने में बहुत ऊर्जा खपायी है। गांव स्तर तक कक्षाएं आयोजित करने लगा है। हरियाणा पँजाब में गांव गांव तक इन्होंने पहुंच बनाई है। आरएसएस के पास दो महत्वपूर्ण टॉपिक होते हैं जिस पर वह अवाम का माइंड सेट करती है। एक है हिन्दू मुस्लिम एजेंडा और दूसरा है एक राष्ट्र एक कानून। हिन्दू मुस्लिम एजेंडा सफलतापूर्वक आगे बढ रहा था। nrc आंदोलन में जो ध्रुवीकरण करने की औऱ बढ़े तो कोरोना में टोटल उनपर गाज गिरा दी। चुन चुन कर मुस्लिम इंटरोगेट किये। ( जींद हरियाणा की घटना लिखुंगा किसी दिन)। कोरोना जब अपने एजेंडा के पीक पर पहुंचा तो मुस्लिम तब्लीगी किनारे हो गया लेकिन जहर जो फिजाओं में छोड़ गए वह असर करता रहा। किसान आंदोलन ने देश भर को सामाजिक और धार्मिक सौहार्द्र का नया उदाहरण बन कर दिखाया। सरकार को नुकसान यह हुआ कि उनके संगठन की बांट की राजनीति पर जबरदस्त कुठाराघात हुआ है।

एक राष्ट्र एक कानून के मुद्दे की हवा किसानी बिल की वजह से निकल गयी। gst ने राज्यों की हालात खराब की हुई है। कृषि भी केंद्र हथिया लेना चाहता है। केंद्र जो मनमानी कर रहा है उससे संघीय ढांचा बिगड़ रहा है। यदि एक राष्ट्र एक कानून की पैरवी करेंगे तो राज्यो के मुख्यमंत्री बिल्कुल ऐसे होंगें जैसे दिल्ली का मुख्यमंत्री। बिना नख शिख। राज्यों की विधानसभा का कोई अर्थ नही रहेगा। विधायिका के अधिकार केंद्र को शिफ्ट होने लगेंगे। mla भी mc जैसे हो जाएंगे। इस एजेंडा को जबरदस्त झटका लगा है। केंद्रीय कानून एक करिये। विवाह कानून एक करिये। लेकिन राज्यो की शक्तियां छीन कर उन्हें पंगु बनाने की कसरत को किसान आंदोलन ने झटक दिया है।

किसान आंदोलन ने कोरोना साजिश का भंडाफोड़ किया है कि 33 दिन में लाखो लोग समूह में हैं। आपने अलग अलग करके व्यक्ति औऱ समाज को ही अलग थलग कर दिया था। कोरोना की साजिश यूनिटी का भाव खत्म कर देने की साजिश लगती है। कोरोना की आड़ में जो बिल clu ट्रस्ट और फण्ड निर्मित किये गए वे भी किसान आंदोलन में जगजाहिर हो गए हैं।

सबसे बड़ा नुकसान मोदी जी की इमेज को हुआ है। न खाऊंगा न खाने दूँगा। अब मोदी जी डफली इकतारा झोला ताबीज खड़ताल चिमटा लेकर गली गली भी सत्संग करें कि वे पूंजीपतियों के नही आमजन के प्रधानमंत्री हैं, जनता उन पर विश्वास नही करेगी। वे चाहें तो मैं भी हूँ चोकीदार कैम्पेन फिर से चलाकर अपनी स्थिति जान सकते हैं।

एक बड़ा नुकसान या कहिये कि बड़ा चेहरा मीडिया का अनावृत हुआ है। प्रत्येक नागरिक को यह मालूम हो गया है कि मीडिया किसका है और किसकी ब्रांडिग करता है। अन्ना के वक्त लाइव रखने वाला मीडिया 26 मौतों पर खामोश रहता है, किसान सरकार मीटिंग के दिन भी बंगाल की स्टोरी पर आमादा रहता है, दर्शक समझ गए हैं कि असल माजरा क्या है।

अंतिम जो नुकसान इस आंदोलन का सरकार को हुआ है या कहिये आरएसएस bjp को हुआ है वह यह कि जिस जनता को सालों पढ़ाया नही जा सका वह इन 33 दिन में बहुत कुछ पढ गयी है। यक़ीन मानिये कि आंदोलन 30दिन और चल गया तो पढ़ाई के मामले में एक सदी की कमी पूरी कर देगा यह आंदोलन।

देश की असल संस्कृति भाईचारा है, गैर सांप्रदायिकता है यह इस आंदोलन की बडी उपलब्धि है। छह साल से सेक्युलर को गाली देने वालो को सच मे बहुत नुकसान हुआ है इस आंदोलन से।

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