Home गौरतलब किसानों की मांगों में अभी असल पेंच बाकी है..

किसानों की मांगों में अभी असल पेंच बाकी है..

-विजय शंकर सिंह॥

किसान आंदोलन की शुरुआत की जड़ तो वे तीन किसान कानून हैं जिनपर अभी तक न तो कोई सहमति बनी है और न ही कोई संकेत सरकार की तरफ से दिया गया है।

वे कानून,
● सरकारी मंडी के समानांतर निजी मंडी को अनुमति देना।
● कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में पूंजीपतियों के पक्ष में बनाये गए प्राविधान,
● जमाखोरी को वैध बनाने का कानून हैं।

यही तीनो कानून हैं जो किसानों की अपेक्षा पूंजीपतियों या कॉरपोरेट को पूरा लाभ पहुंचाते हैं औऱ इन्ही तीन कानूनों से किसानों को धेले भर भी लाभ नहीं होने वाला है।

इन्ही तीन कानूनों को तो सरकार ने कॉरपोरेट के दबाव या यूं कहें अम्बानी अडानी के दवाव के कारण कोरोना आपदा के समय जून में जव लॉक डाउन जैसी परिस्थितिया चल रही थीं तो एक अध्यादेश लाकर कानून बनाया।

बाद में तीन महीने बाद ही गलत तरह से राज्यसभा ने सभी संवैधानिक मर्यादाओं को ताक पर रख कर इन्ही अध्यादेशों को नियमित कानून बना दिया गया। किसानों की खेती किसानी पर सबसे बड़ा खतरा तो यही तीन कृषि कानून हैं।

यह तीन कानून इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि कॉरपोरेट का कृषि में दखल, इन्ही तीन कानूनों के वापस लेने से प्रभावित होगा। यह तीनों कानून कॉरपोरेट के कहने पर ही तो लाये गये है फिर इन्हें बिना कॉरपोरेट की सहमति के सरकार कैसे इतनी आसानी से वापस ले लेगी ?

यह तीनों कानून कृषि सुधार के हैं ही नही बल्कि यह तीनों कानून तो कॉरपोरेट विस्तार के लिये हैं। किसान संगठन इस पेचीदगी को समझ रहे हैं और वे अब भी अपने स्टैंड पर मजबूती से जमे हैं।

पराली प्रदूषण के मामले में सरकार द्वारा किसानों को मुकदमे से मुक्त करने से कॉरपोरेट को कोई हानि नहीं है। न यह एक्ट उनके लिये दिक्कत तलब पहले था और न अब है। कॉरपोरेट के उद्योग तो पराली प्रदूषण की तुलना में कहीं बहुत अधिक प्रदूषण फैलाते हैं। वह उनके खिलाफ प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड महज खानापूर्ति बराबर कार्यवाही करता है। पराली प्रदूषण एक्ट से किसानों को ही नुकसान था और अब उन्हें ही इससे मुक्त होने पर राहत मिली है। इस राहत से कॉरपोरेट को न तो कोई समस्या थी और न इससे हटने से उन्हें कोई राहत मिली है।

प्रस्तावित बिजली कानून 2020 नही लाया जाएगा, यह वादा भी सरकार ने किया है। इस कानून का विरोध तो बिजली सेक्टर के इंजीनियर साहबान और कई जागरूक बिजली उपभोक्ता संगठन कर रहे हैं। यह मसला अलग है। अब यह बिल सरकार ने फिलहाल बस्ता ए खामोशी में डाल दिया है। अच्छी बात है। यह किसान हित मे है।

अब देखना यह है कि उन कृषि कानूनो पर सरकार का क्या दृष्टिकोण और पैंतरा रहता है जो सीधे सीधे कॉरपोरेट को लाभ पहचाने और कृषि में उनका वर्चस्व स्थापित करने के लिये आपदा में अवसर के रूप में लाये गये है । सरकार क्या अपने चहेते कॉरपोरेट को नाराज करने की स्थिति में है या नही।

अब अगली बात 4 जनवरी 2021 को होगी। आंदोलन अभी जारी रहेगा और इसे अभी जारी रहना भी चाहिए। आज तो अभी असल मुद्दों पर सरकार ने कुछ कहा भी नही है। पर सरकार ने यह ज़रूर कहा है कि आंदोलन शांतिपूर्ण है और इसे उन विभाजनकारी शब्दो से नहीं नवाजा है, जिनसे बीजेपी आईटी सेल आंदोलन की शुरूआत से ही आक्षेपित करता रहा है।

Facebook Comments
(Visited 1 times, 1 visits today)

Leave your comment to Cancel Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.