सरकार को ईमानदारी बरतनी चाहिए..

सरकार को ईमानदारी बरतनी चाहिए..

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दिल्ली की सीमाओं पर डटे किसानों का आंदोलन अब दूसरे महीने में प्रवेश कर चुका है। इस बीच छह दौर की बातचीत सरकार और किसान संगठनों के बीच हो चुकी है और सारी वार्ताएं विफल रही हैं। अब 30 दिसंबर को सातवीं बार बातचीत होगी। वार्ता का एजेंडा किसानों ने अपनी ओर से साफ कर दिया है कि तीनों कृषि कानून वापस करने के तरीके पर चर्चा हो, एमएसपी को कानूनी रूप दिया जाए, कई फसलों पर गारंटी मिले, एनसीआर में हवा की गुणवत्ता खराब होने को लेकर लाए कानून को वापस लिया जाए और बिजली बिलों को लेकर लाए गए नए विधेयक को वापस लिया जाए।

 किसानों ने अपनी मांगें साफ-साफ शब्दों में सामने रख दी हैं, और अब ये सरकार पर निर्भर करता है कि वो इन मांगों को सुनकर आंदोलन खत्म करवाती है या फिर अपनी अकड़ पर बरकरार रहती है। वैसे सरकार का अब तक का रवैया यही नजर आ रहा है कि वह संशोधन जैसी गोलमोल बातों में किसानों को उलझाती रहेगी। अमूमन इस तरह के टकराव में वार्ताएं तभी सफल होती हैं, जब दोनों पक्ष थोड़ा-थोड़ा झुकें। लेकिन इसके साथ एक अनिवार्य शर्त ये भी होती है कि दोनों पक्ष बराबर होना चाहिए।

किसान आंदोलन में यह बराबरी वाली बात नहीं है, क्योंकि यहां एक पक्ष पीड़ित है औऱ दूसरा पक्ष सत्ता की शक्ति से संपन्न है। पीड़ित अगर और झुके तो उसे पीड़ा का बढ़ना ही माना जाएगा और ऐसे में इंसाफ की गुंजाइश नहीं रहेगी। किसान आंदोलन अगर खत्म करवाना है तो इसके लिए सरकार को कानून वापस लेने ही चाहिए और मंडियों में व्याप्त खामियों या एमएसपी की कमजोरियों को दूर करने के लिए किसानों को भरोसे में लेकर नए उपाय तलाशने होंगे। लेकिन सरकार अब तक ऐसा कुछ करने की पहल नहीं कर रही है, बल्कि किसान आंदोलन को गलत साबित करने या मुद्दों से ध्यान भटकाने के तमाम हथकंडे अपनाए जा रहे हैं।

जैसे अभी किसान आंदोलन के बीच में मुख्यधारा के मीडिया में चर्चा का एक विषय ये बना दिया गया है कि इस वक्त राहुल गांधी विदेश प्रवास पर चले गए। भाजपा नेता और टीवी स्टूडियो में बैठे एंकर इसे लेकर तंज कस रहे हैं। एक चैनल में कहा गया किसान मैदान में, राहुल बाबा ननिहाल में। एक भाजपा नेता ने कहा कि उन्हें नानी याद आ गई। इस तरह की टिप्पणियों से फिर जाहिर हो गया कि असल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए भाजपा और उसके प्रायोजित मीडिया का सबसे आसान खेल ये है कि गांधी परिवार को बदनाम किया जाए। जनता के बीच ऐसा माहौल बनाया जाए कि राहुल गांधी पार्ट टाइम की राजनीति कर रहे हैं या वे देश की समस्याओं को लेकर गंभीर नहीं हैं। जबकि असल बात ये है कि देश की समस्याओं के लिए सरकार जिम्मेदार होती है और उन्हें दूर करने की जिम्मेदारी भी सरकार की ही होती है। बेशक राहुल गांधी अगर इस वक्त किसानों के बीच रहते तो विपक्ष की आवाज और बुलंद होती। लेकिन वे कांग्रेस के केवल एक सांसद हैं और अपने संसदीय क्षेत्र के प्रति उन्होंने जिम्मेदारी अच्छे से निभाई है। 

बीते दिनों एक सर्वे में ये बात सामने आई कि कोरोना के वक्त किन सांसदों ने जनता की सबसे अधिक मदद की, उसमें शीर्ष दस सांसदों में तीसरे नंबर पर राहुल गांधी हैं। वैसे भी राहुल गांधी शुरु से कई बातों को लेकर सरकार को आगाह करते रहे हैं। कोरोना के बढ़ने से लेकर, लॉकडाउन के दुष्परिणामों और अर्थव्यवस्था की बिगड़ती हालत सब पर उन्होंने सरकार को उसकी खामियां दिखाईं। लॉकडाउन में घर लौटते प्रवासी मजदूरों की भी उन्होंने खबर ली। लेकिन तब भाजपा को उनकी यह पहल पसंद नहीं आई। अब भी किसान आंदोलन के लिए कांग्रेस को भाजपा ने जिम्मेदार ठहराया।

आंदोलनकारियों को कांग्रेस का एजेंट बताया। और अब राहुल गांधी पर तंज कसा जा रहा है कि वे आंदोलनकारी किसानों के साथ नहीं हैं। कायदे से इस वक्त देश के हरेक नागरिक और हरेक जनप्रतिनिधि को किसान के साथ ही होना चाहिए। ताकि उनकी समस्याओं को प्रत्यक्ष महसूस कर उन्हें दूर किया जा सके। इस तरह देश अपना भविष्य भी सुरक्षित करेगा। लेकिन इस गंभीर मसले पर भी भाजपा राजनीति को गांधी परिवार के इर्द-गिर्द घुमाकर जनता को गुमराह करने में लगी है। वैसे दिल्ली में किसान पूरी मजबूती के साथ डटे हुए हैं। उनकी मदद के लिए समाज के कई तबकों से मदद के हाथ बढ़े हैं। कहीं लंगर चल रहे हैं, कहीं मोबाइल क्लीनिक खुले हैं, कहीं लायब्रेरी और ऑनलाइन कक्षाएं चल रही हैं, कहीं किसान मॉल खुला है, ताकि आंदोलनकारियों की जरूरतें पूरी हों। आंदोलन के साथ खेती-किसानी का काम भी चलता रहे, इसलिए बारी-बारी से जत्थे बदल रहे हैं।

नौजवान आधुनिक तकनीकी के साथ आंदोलन को गति दे रहे हैं तो उन्हें सही राह दिखाने के लिए बुजुर्ग भी डटे हुए हैं। महिलाएं, बच्चे, युवक-युवतियां सब अपनी-अपनी तरह से इस अभूतपूर्व आंदोलन में योगदान दे रहे हैं। किसान आंदोलन की सही खबर जनता तक पहुंचे, इसलिए ट्राली टाइम्स जैसा अखबार भी निकल रहा है। दिल्ली के बाहर जमा किसानों का हौसला बढ़ाने के लिए राजस्थान, महाराष्ट्र आदि से भी किसान पहुंच रहे हैं। इधर पटना में किसानों ने राजभवन तक मार्च निकालना चाहा, तो उन पर लाठी चार्ज हुआ। किसानों पर इस तरह के दमन से पता चलता है कि सरकार किसानों के प्रति कितनी संवेदनहीन हो चुकी है।

अलोकतांत्रिक तरीके से कानून बनाकर उसे जनता पर थोपा जा रहा है और जब इसका लोकतांत्रिक तरीके से विरोध हो रहा है, तो सरकार को यह भी मंजूर नहीं। लेकिन सरकार को ये याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र दो-चार लोगों की मर्जी का गुलाम नहीं होता। शासन की ये प्रणाली जनता से बनती है और जनता से ही चलती है। सरकार उसमें एक जरिया भर होती है। 30 दिसबंर की वार्ता में अगर सरकार ईमानदारी से सुलह की पहल करेगी, तभी इस जरिए का असल मकसद पूरा होगा।

(देशबंधु)

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