प्रशांत भूषण की हुई पिटाई, तो सबको देशभक्ति याद आई: अन्ना ने 20 दिनों बाद दी सफाई

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आखिरकार तीन ‘सरफिरे’ नौजवानों ने देश को एक नया रास्ता दिखा ही दिया। एक तरफ जहां बाल ठाकरे जैसे स्वघोषित देशभक्त नींद से जाग कर गर्जना करने लगे हैं वहीं दूसरी तरफ कल तक भ्रष्टाचार के नाम पर देशद्रोहियों को अपने मंच पर भाषण देने का मौका दिलाने वाली टीम अन्ना भी अब देशभक्ति का पाठ दोहराने में जुट गई है। अन्ना हजारे ने शुक्रवार को रालेगन सिद्धि में बाकायदा पत्रकारों को बुला कर प्रशांत भूषण के बयान से वे असहमत हैं। हालांकि अन्ना ने यह भी दोहराया कि प्रशांत अब भी उनकी टीम का हिस्सा हैं।

जाग उठी देशभक्ति?: अन्ना और किरण बेदी

इससे पहले किरण बेदी भी खुद को प्रशांत के विचारों से अलग कर चुकी हैं। पूर्व महिला आईपीएस किरण बेदी ने गुरुवार को इस पूरे प्रकरण से अपने आप बचाते हुए कहा कि कश्मीर पर उनकी जो भी राय है वो उनकी अपनी है। किरण बेदी ने टि्वटर पर लिखा कि इस पूरी बात से अन्ना और अन्ना की टीम से कोई लेना-देना नहीं है। अन्ना टीम के एक और अहम सहयोगी और प्रख्यात कवि कुमार विश्वास ने भी गुरुवार को एक चैनल पर बात करते हुए ऐसे ही विचार रखे हैं। हालांकि दोनों ही लोगों ने प्रशांत भूषण के साथ जो भी हुआ उसकी कड़े शब्दों में निंदा की, लेकिन उनके विचारों से खुद को अलग बताया।

सवाल यह उठता है कि चाहे अन्ना और उनके सहयोगी हों या उनके विरोधी, सब को प्रशांत के बयान पर प्रतिक्रिया देने में इतनी देर क्यों लग गई? प्रशांत भूषण ने पिछले महीने यानि सितंबर की 25 तारीख को वाराणसी में कश्मीर के बारे में अपने विचार रखे थे। उस वक्त मीडिया में खासा हो हल्ला भी मचा था, लेकिन तब किसी को देशभक्ति की याद नहीं आई। क्या वे किसी ऐसी ही तीखी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहे थे? अन्ना और उनके सहयोगियों ने यह नहीं बताया कि उन्होंने अफज़ल गुरु के वकील रहे प्रशांत भूषण के साथ-साथ दूसरे देशद्रोहियों को अपने मंच पर जगह क्यों दी? सवाल यह भी उठ खड़ा हुआ है कि जब अनशन के शुरुआती दिनों में योग गुरु बाबा रामदेव उनका साथ देने आए तो उन्हें उस मंच पर आने की अनुमति क्यों नहीं मिली?

टीम अन्ना अब बेशक अपनी सफाई पेश करने में जुटी है, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि उनके मंच पर ‘जस्टिस फॉर अफज़ल गुरु’ जैसे देशद्रोही  अभियान के अध्यक्ष संदीप वैद्य और राष्ट्रपति के पास अफजल को जीवनदान देने वाले पत्र में हस्ताक्षर करने वाले 347 ‘दयालुओं’ में से अधिकतर अन्ना का प्रसाद पाते देखे गए थे। क्या उस वक्त किरण बेदी, कुमार विश्वास और खुद अन्ना का राष्ट्रप्रेम सो रहा था। अपने देश के संविधान का खुलेआम मजाक बनाने और उसे आग के हवाले करने वाले अब्दुल्ला बुखारी को करबद्ध विनती कर बुलाने का मामला शायद ही कोई भूल पाया होगा।

इन तमाम बातों के अलावा मंच के पीछे से भारत माता की तस्वीर हटाना, आंदोलन में भारत माता की जय के नारे पर रोक लगाना और देशद्रोहियों का स्वागत करना जैसी करतूतें उनके आंदोलन की दिशा के बारे में पहले से ही जानकारी दे चुकी हैं। अब अगर अचानक इन देशद्रोहियों के समर्थकों की जुबान से राष्ट्रप्रेम के बोल फूटने लगें तो उनकी भावनाओं पर संदेह होना स्वाभाविक है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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