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लोगों को किसान टंगा हुआ ही सुहाता है, खाता-पीता नहीं…

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-सुनील कुमार॥
किसान आंदोलन को लेकर उसके आलोचक, और फिर चाहे किसके समर्थक, जिस तरह इस आंदोलन पर हमला कर रहे हैं वह देखने लायक है। किसान इस ठंड में सडक़ों पर डेरा डाले बैठे हैं, और उनके समर्थक उनके खाने-पीने का, इलाज का जिस तरह ख्याल रख रहे हैं उसे लेकर सोशल मीडिया पर किसान-विरोधी जमकर लिख रहे हैं। उनके खाने-पीने को लेकर लिखा जा रहा है, उनके लिए गर्म पानी के इंतजाम को लेकर लिखा जा रहा है, और एक ऐसी तस्वीर पेश की जा रही है कि ये किसान इतने संपन्न हैं कि इन्हें किसी हड़ताल की क्या जरूरत है, इन्हें किसी रियायत या हक की मांग करने का क्या हक है?

हिन्दुस्तानी लोग अपने किसान को आमतौर पर बैलों के साथ भूखा मरते देखने के आदी हैं, और आए दिन किसी पेड़ की डाल से फंदे पर टंगा हुआ देखने के भी। नतीजा यह है कि जब खाते-पीते किसान मोदी सरकार किसान-कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं, तो मोदी प्रशंसकों को यह लग रहा है कि खाते-पीते लोगों का आंदोलन कैसे हो सकता है? यह एक पूरी तरह से शहरी, संपन्न, और राजनीतिक पूर्वाग्रह से ग्रस्त सोच है जो कि किसान को गरीब ही देखना चाहती है।

आलोचक इस बात को भूल जा रहे हैं कि आज आंदोलन के सामने सबसे अधिक सक्रिय पंजाब के वे सिक्ख किसान हैं जो कि अपने धर्म की सीख के मुताबिक किसी भी धर्म पर आई मुसीबत को घटाने के लिए उसके लोगों के साथ खड़े हो जाते हैं। दुनिया में जहां कहीं प्राकृतिक या मानवनिर्मित मुसीबत आती है, यही सिक्ख समुदाय राहत और बचाव में, मदद में सबसे आगे रहता है। और यह समाज दान का चेक काटकर किसी पीएम फंड में नहीं भेजता, वह अपने हाथ-पैरों के साथ मदद करते खड़े रहता है। अपने घर का पैसा भी लगाता है, और अपने वक्त के साथ अपना बदन भी झोंकता है। ऐसा समाज क्या आज अपने किसानों की मदद के लिए आगे नहीं आएगा? शहरी-संपन्न सोच ने 80-85 बरस की बुजुर्ग सिक्ख आंदोलनकारी किसान-महिला को बदनाम करने के लिए कंगना रनौत की अगुवाई में जितनी हमलावर मुहिम चलाई, वह भी इस देश के लिए एक बड़े कलंक की बात थी। इस बुजुर्ग महिला को शाहीन बाग की एक दूसरी बुजुर्ग मुस्लिम महिला बताकर सौ-सौ रूपए में उपलब्ध महिला बताना मोदी के प्रशंसकों की एक बहुत ही किसान-विरोधी सोच थी जिसमें देश की एक सबसे हौसलामंद बुजुर्ग आंदोलनकारी को लाठी टेककर सफर करते हुए देखकर भी शर्म नहीं आई थी, इस गंदी सोच ने इस महिला को भाड़े पर चलने वाली आंदोलनकारी लिखा था, और कंगना रनौत ने इस हमले की अगुवाई की थी।

हिन्दुस्तान को लेकर जो लोग यह कहते हैं कि यह विविधता में एकता वाला देश है, तो उनकी वह बात महज परदेसियों के बीच देश की तस्वीर बेहतर बनाने के लिए लगाया गया नारा है। सच तो यह है कि इस तथाकथित एकता के भीतर हिन्दुस्तान में फर्क की ऐसी चौड़ी और गहरी खाई है कि संपन्न शहरियों को किसान-आंदोलन देश का गद्दार लग रहा है, खालिस्तानी, पाकिस्तानी, और चीनी लग रहा है। यह देश पहले जितना बंटा हुआ था, अब उससे कहीं अधिक बंटा हुआ है। और अब बांटने को इस देश के पास पाकिस्तान नहीं रह गया है इसलिए अब यह देश किसानों को बांटने में लगा है, सिक्खों को गैरसिक्खों से बांटने में लगा है, संपन्न किसानों को विपन्न किसानों में बांटने लगा है। यह सिलसिला जाने कहां जाकर थमेगा, और तब तक जाने कितने और लोग गद्दार करार दिए जाएंगे। अभी सोशल मीडिया पर किसी ने लिखा है कि देश के गद्दार तय करने के जो अलग-अलग पैमाने आज पढ़ाए जा रहे हैं, उन सबके आधार पर अगर तय किया जाए, तो 70 फीसदी आबादी गद्दार साबित की जा सकेगी।

जब किसी की अंधभक्ति में डूबे हुए लोग इस तरह देश के गद्दार तय करते हैं, तो वे किसी नेता, पार्टी, या विचारधारा के प्रति अपनी वफादारी तो साबित करते हैं, लेकिन दूसरे तबकों को गद्दार करार देते हुए वे देश के भीतर एक खाई खोदने का काम करते हैं। आज जिन लोगों को किसान-आंदोलन का विरोध करने के लिए किसानों को गद्दार करार देने में जरा भी हिचक नहीं लग रही है, उन्हें याद रखना चाहिए कि एक दिन उनके मां-बाप, वे खुद, या उनके बच्चों के पेशे भी इसी तरह निशाने पर हो सकते हैं। उस दिन उन पर जब नाजायज हमले होंगे, तो फिर उन्हें कौन बचाएगा? अंधभक्ति और पूर्वाग्रह से लोगों की अपनी सोचने-समझने की ताकत किस हद तक खत्म होती है, यह देखना हो तो किसान-आंदोलन की बूढ़ी महिला पर हुए हमलों को देखना चाहिए।

जिन लोगों ने जरा भी नैतिकता बाकी है, उन्हें अंधभक्ति से परे यह भी सोचना चाहिए कि नाजायज हमलों का यह सिलसिला उनकी अपनी अगली पीढ़ी को कैसा भविष्य देकर जाएगा?

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