अपने सदस्यों की वाहवाही करने वाले संगठनों के, उनके जुर्म पर आंख-मुंह बंद क्यों?

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-सुनील कुमार॥
छत्तीसगढ़ में आज एक बड़े आईएएस अफसर रहे बाबूलाल अग्रवाल को ईडी ने गिरफ्तार करके जेल भेज दिया है। अपने कार्यकाल में उन पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे और अभी जिस मामले में देश की एक सबसे ताकतवर जांच एजेंसी, ईडी, ने उन्हें गिरफ्तार किया है वह भ्रष्टाचार से और आगे बढक़र एक साजिश से किया गया जुर्म है। कालेधन को सफेद करने के लिए ग्रामीण-गरीबों के नाम से बैंक खाते खोले गए, उनमें नगद रकम जमा की गई, और फिर वह रकम बाबूलाल अग्रवाल के परिवार के लोगों की कंपनी में भेज दी गई। इस पूरे सिलसिले से वे गरीब नावाकिफ रहे जिनके नाम से फर्जी खाते खोले गए थे। ऐसे सैकड़ों खाते बिना बैंक की साजिश के तो खुल नहीं सकते थे, और बहुत बड़ा होने की वजह से यह मामला उजागर हुआ। बाबूलाल अग्रवाल को केन्द्र सरकार ने पहले ही अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी है और अब नौकरी के दौरान के अपने काम उन्हें जेल पहुंचा रहे हैं।
आईएएस देश की सबसे ताकतवर नौकरी मानी जाती है। केन्द्र सरकार की दर्जनों नौकरियों में से जो सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती हैं उनके लिए यूपीएससी का एक मुकाबला होता है, और उसमें सबसे कामयाब नौजवानों को आईएएस की नौकरी मिलती है। इसके बाद फिर आईपीएस, आईएफएस, और कई दूसरी नौकरियां। बाबूलाल अग्रवाल न तो भ्रष्ट मामलों में फंसे हुए पहले आईएएस अफसर हैं, और न ही आखिरी। और ऐसा भी नहीं कि भ्रष्टाचार सिर्फ इसी नौकरी के लोग करते हैं, और बाकी नौकरियों के लोग दूध के धुले रहते हैं। यहां पर यह भी कहना जरूरी है कि भ्रष्टाचार सरकारी नौकरियों तक सीमित नहीं हैं, भारतीय समाज के हर तबके में भ्रष्टाचार अलग-अलग शक्लों में मौजूद है, और देश के एक भूतपूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण और उनके वकील बेटे प्रशांत भूषण के लगाए खुले आरोपों को भूलना नहीं चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट के कितने जज भ्रष्ट हैं। इसे लेकर प्रशांत भूषण सुप्रीम कोर्ट में अवमानना का मुकदमा भी झेल रहे हैं, लेकिन वे अपने आरोपों पर कायम हैं।
ऐसे देश में जब आईएएस एक सबसे ही संगठित नौकरी है, सबसे ताकतवर तो है ही, तब इस नौकरी के लोगों के एसोसिएशन को अपने लोगों के बारे में सोचना चाहिए। हिन्दुस्तान में बाकी पेशेवर लोगों या कारोबारी लोगों के संगठनों का आम चरित्र यही रहता है कि जब उनके किसी सदस्य पर कोई हमला होता है, या उसके खिलाफ कोई नाजायज दिखती कार्रवाई होती है, तो ऐसी कार्रवाई के खिलाफ एकजुट होकर खड़े होना, बयान जारी करना, और सत्ता से जाकर मिलना। कुछ ऐसा ही काम पत्रकारों के संगठन भी अपने सदस्यों को लेकर करते हैं कि जब उन पर कोई हमला होता है, या नाजायज लगती सरकारी कार्रवाई होती है, तो वे बैनर लेकर सडक़ों पर उतरते हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि हिन्दुस्तान में कोई भी संगठन अपने सदस्यों के जाहिर तौर पर दिखते नाजायज कामों को लेकर आंख और मुंह सब बंद कर लेते हैं। ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर आईएएस एसोसिएशन रोजाना सक्रिय रहता है, देश भर में अपने सदस्य अफसरों के किए हुए अच्छे कामों की तारीफ करता है, उनसे जुड़ी खबरों के लिंक पोस्ट करता है, लेकिन अपने सदस्यों के किए हुए गलत कामों को लेकर कुछ भी नहीं कहता। यह बात अपनी जगह सही है कि सरकारी कार्रवाई शुरू होने के बाद अदालती सजा मिलने के बीच में बहुत बड़ा फासला रहता है, और अधिकतर ताकतवर लोग सजा से बच निकलते हैं, इसलिए जांच एजेंसियों की कार्रवाई शुरू होने से किसी को मुजरिम नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन एसोसिएशन को कुछ सैद्धांतिक बातें तो जाहिर तौर पर करनी ही चाहिए। अपने नए सदस्यों को सावधान करने के लिए, उन्हें भ्रष्टाचार में शामिल होने से बचाने के लिए एसोसिएशन को सार्वजनिक रूप से भी कुछ बातें करनी चाहिए ताकि आम जनता का भी ऐसे संगठनों पर विश्वास हो सके। अपने लोगों की महज तारीफ करने वाले संगठन अगर अपने भ्रष्ट सदस्यों के बारे में कोई सैद्धांतिक बात भी नहीं कहते, तो उनकी विश्वसनीयता कुछ नहीं रहती। लेकिन यह बात महज अफसरों के संगठनों के साथ नहीं है। भारत के संपादकों के संगठन देखें, या पत्रकारों के या टीवी चैनलों के संगठनों को देखें तो रात-दिन नफरत फैलाने, हिंसा भडक़ाने, लोगों के सामने सोची-समझी उकसाऊ-उत्तेजना परोसने वाले कुख्यात हो चुके साम्प्रदायिक लोगों के लिए उनके संगठनों के पास कोई नसीहत नहीं रहती, और जब ऐसे लोग किसी कानूनी मामले में फंसते हैं, तो ये संगठन उनके बचाव के लिए किसी फायर ब्रिगेड की तरह दौड़ पड़ते हैं।
किसी भी पेशे के लोगों के संगठनों को अपनी जिम्मेदारी बढ़ानी चाहिए। अपने लोगों को सिर्फ बचाने का काम जो करते हैं, और गलत कामों पर अगर रोकते नहीं हैं, तो इन संगठनों का महत्व किसी मुजरिम को बचाने वाले पेशेवर वकील से अधिक नहीं हो सकता। जब देश में एक के बाद एक दर्जनों आईएएस अफसर भ्रष्टाचार के पुख्ता दिखते मामलों में गिरफ्तार होते हैं, और उसके बाद भी उनके संगठन मुंह भी नहीं खोलते तो फिर वे संगठन अपने सदस्यों के प्रचार के लिए भाड़े पर ली गई जनसंपर्क एजेंसी से अधिक नहीं रह जाते। हर संगठन के लोगों को अपने भीतर यह बात भी करना चाहिए कि वे अपने सदस्यों को न सिर्फ बाहरी हमलों से बचाने का काम करेंगे, बल्कि भीतर से अगर वे भ्रष्टाचार से खोखले हो रहे हैं तो उसे रोकने की कोशिश भी वे करेंगे। ये संगठन कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि अपने पेशे से जुड़े हुए मामलों में जो सदस्य भ्रष्टाचार की एक दर्जे से ऊपर की कार्रवाई में उलझते हैं, तो उनकी सदस्यता निलंबित की जाए। ऐसा न करके ये संगठन अपनी इज्जत खोते हैं।
डॉक्टरों और वकीलों के संगठनों को, सीए और टैक्स सलाहकारों के संगठनों को अपने-अपने लोगों के बारे में सोचना चाहिए, और उनको गलत काम से रोकने की एक तरकीब ढूंढनी चाहिए। जिस तरह बलात्कार जैसे किसी बड़े जुर्म में फंसने वाले किसी राजनीतिक व्यक्ति को उनकी पार्टी तुरंत ही निलंबित या निष्कासित कर देती है, देश के संगठनों को अपने सदस्यों पर कम से कम इतनी कार्रवाई करने का तो हौसला दिखाना चाहिए ताकि संगठन की साख बची रहे। आज तो नर्सिंग होम्स के मालिक जिस तरह सुरक्षा एजेंसियां रखकर अपने कारोबार की हिफाजत करती हैं, और कोई दिक्कत आने पर सारे मालिक एक-दूसरे की मदद के लिए एकजुट हो जाते हैं, वैसा चरित्र किसी अच्छे संगठन के लिए ठीक नहीं है। चूंकि आईएएस देश की सबसे बड़ी नौकरी मानी जाती है, और सरकारी कामकाज का सबसे बड़ा जिम्मा आईएएस लोगों पर रहता है, इसलिए इनके संगठन को एक मिसाल पेश करनी चाहिए। वैसे तो मिसाल संसद और अदालतों से निकलकर नीचे आनी चाहिए, लेकिन इन दोनों ने तो अपने आपको विशेषाधिकार, और अवमानना के कानून बनाकर इस तरह सुरक्षा चक्र के भीतर सुरक्षित रख लिया है कि उनके बारे में बाहरी लोग मुंह भी न खोल सकें। इसलिए जो संगठन ऐसे कानूनों से लैस नहीं हैं, उन्हीं से हम बात शुरू कर सकते हैं, और कर रहे हैं।

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