आधे-अधूरे लोकतंत्र में मिली जीत..

आधे-अधूरे लोकतंत्र में मिली जीत..

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जम्मू-कश्मीर में हुए जिला विकास परिषद यानी डीडीसी के चुनाव में फारुक अब्दुल्ला के नेतृत्व में बने सात दलों के गुपकर गठबंधन को 280 सीटों में से 110 सीटों पर जीत हासिल हुई है, जबकि भाजपा 74 सीटों पर जीत हासिल कर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है।

नेशनल कॉन्फ्रेंस 67 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर है। जबकि पीडीपी को 27 सीटों पर जीत मिली है। गौरतलब है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी), पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी), पीपल्स कॉन्फ्रेंस, सीपीआई, सीपीआईएम, अवामी नेशनल कॉन्फ्रेंस और जम्मू और कश्मीर पीपल्स मूवमेंट (जेकेपीएम) ने मिलकर इस चुनाव में पीपल्स अलायंस फॉर गुपकर डिक्लेरेशन (पीएजीडी) बनाया है।

कांग्रेस इस एलायंस का हिस्सा नहीं है। बहरहाल, डीडीसी चुनाव में जीती सीटों पर भाजपा के नेता फूले नहीं समा रहे हैं। कश्मीर का नाम आते ही बाजपेयी जी के कहे शब्द इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत को जुमले की तरह भाजपा नेता इस्तेमाल करने लग जाते हैं। बीते छह सालों में दर्जनों बार इस जुमले को दोहराया गया है, हालांकि साल दर साल कश्मीर में कश्मीरियत के साथ-साथ इंसानियत और जम्हूरियत के लिए जगह कम होती गई। पिछले साल 5 अगस्त को जब अचानक अनुच्छेद 370 खत्म करने का ऐलान मोदी सरकार ने किया था, तब जम्मू-कश्मीर की जनता के साथ लोकतंत्र का कैसा खिलवाड़ किया गया, यह पूरी दुनिया ने देखा।

घोषित-अघोषित कर्फ्यू, लॉकडाउन, इंटरनेट की कटौती, मीडिया सेंसरशिप ऐसे तमाम पैंतरे अब तक वहां चल रहे हैं। वहां के कई नेता हिरासत या नजरबंदी में हैं। ऐसे में वहां के असल हालात कैसे हैं, ये केवल वे लोग ही महसूस कर सकते हैं, जो वहां रह रहे हैं। आधे-अधूरे लोकतंत्र के बीच जम्मू-कश्मीर में कई बदलाव भी हुए।

विशेष राज्य का दर्जा खत्म हुआ और इसके साथ ही राज्य दो हिस्सों में बंट कर केंद्र शासित प्रदेश बन गया। अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने से पहले जम्मू और कश्मीर में त्रिस्तरीय पंचायत प्रणाली (ग्राम स्तरीय, ब्लॉक स्तरीय, जिला स्तरीय) नहीं थी। लेकिन पिछले महीने केंद्र सरकार ने जम्मू और कश्मीर पंचायती राज अधिनियम, 1989 में संशोधन के लिए अपनी सहमति दे दी थी, जिसके बाद डीडीसी चुनाव का रास्ता साफ हुआ।

जम्मू की 140 और कश्मीर की 140 यानी कुल 280 सीटों के लिए डीडीसी चुनाव 28 नवंबर से शुरु हुआ और आठ चरणों में संपन्न कराया गया। चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुए, जो खुशी की बात है। हिंदू बहुल जम्मू क्षेत्र में भाजपा को भारी जीत मिली, जो स्वाभाविक ही है, जबकि कश्मीर में गुपकर गठबंधन का प्रदर्शन अच्छा रहा।

भाजपा ने कश्मीर में 3 सीटें जीती हैं, जिस पर पार्टी गदगद है। भाजपा नेता इसे लोकतंत्र की जीत बता रहे हैं, साथ ही यह दावा भी कर रहे हैं कि 370 हटाने के मोदी सरकार के फैसले पर जनता ने मुहर लगाई है। लेकिन आधे-अधूरे लोकतंत्र की तरह ही यह भी आधा सच ही है। भाजपा को जीत मिली, इससे इंकार नहीं है। लेकिन सत्ता और साधन दोनों के लिहाज से भाजपा अन्य दलों के मुकाबले कहीं अधिक ताकतवर है।
कई केन्द्रीय मंत्रियों और बड़े नेताओं को डीडीसी चुनावों में जिताने का जिम्मा भाजपा ने सौंप रखा था। उनका प्रचार तंत्र अन्य दलों से तगड़ा था। दूसरे दलों के लिए दुष्प्रचार में भी भाजपा ने कोई कमी नहीं की।

गुपकर गठबंधन को भाजपाई शब्दकोष के मुताबिक कभी गुपकर गैंग कहा गया, कभी गुप्तचर गैंग कहा गया। विरोधी दलों को पाकिस्तान परस्त बताया गया। इतने दुष्प्रचार के बावजूद गुपकर गठबंधन पर जनता ने अपना भरोसा दिखलाया तो इसे भाजपा की जीत कैसे कहा जा सकता है। वोटों की गिनती से एक दिन पहले नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के कई नेताओं को प्रशासन ने हिरासत में लिया और इसकी कोई वजह नहीं बताई। नेशनल कांफ्रेंस के मुखिया फारुख अब्दुल्ला पर ईडी की कार्रवाई भी इन्हीं दिनों हुई।

पीडीपी की युवा इकाई के अध्यक्ष वहीद पारा भी पुलवामा से गुपकर उम्मीदवार थे, आतंकवादियों के साथ कथित संबंधों को लेकर पारा 25 नवंबर से राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की हिरासत में हैं, इसलिए उनकी ओर से उनके परिवार ने प्रचार किया और उन्होंने भाजपा के प्रत्याशी सज्जाद अहमद रैना को पराजित किया। डीडीसी चुनाव में कांग्रेस को जम्मू में 17 और कश्मीर में 10 सीटें हासिल हुईं। जबकि सीपीआई (एम) को 5 सीटें कश्मीर में मिलीं।

इन चुनावों में निर्दलियों का प्रदर्शन खास रहा, जिन्हें 49 सीटें मिलीं। इस तरह सभी को किसी न किसी तरह की जीत हासिल हुई है और इस लिहाज से भाजपा एकतरफा जीत का दावा नहीं कर सकती। वैसे भाजपा अभी दावा कर रही है कि जम्मू-कश्मीर की जनता ने राज करने वालों और काम करने वालों का अंतर पहचाना है। डीडीसी चुनाव के लिए प्रभारी भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने तो यहां तक कह दिया कि गुपकर गैंग ने अपनी विश्वसनीयता खत्म हो गई है।

इस तरह के बयानों से जाहिर है कि भाजपा अपनी जीत से अधिक बड़े दावे तक जनता पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव बनाने वाली रणनीति पर उतर आई है। वैसे अगर भाजपा को सच में लगता है कि जम्मू-कश्मीर के लोगों को उस पर अधिक भरोसा है, तो अब वहां विधानसभा चुनावों की घोषणा में देर नहीं करनी चाहिए और उससे पहले तुरंत वहां दूरसंचार से लेकर इंटरनेट तक सारी सुविधाएं देश के बाकी राज्यों की तरह उपलब्ध करा देना चाहिए। तभी सच में लोकतंत्र जीतेगा।

(देशबंधु)

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