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नन के हत्यारे पादरियों और नन को उम्रकैद से आंखें खुलनी चाहिए…

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-सुनील कुमार॥
दो दिन बाद ईसाईयों का सबसे बड़ा त्यौहार क्रिसमस मनाया जाने वाला है, और ईसाईयों की खासी आबादी वाले केरल में एक नन की हत्या के एक मामले में कल 28 बरस बाद अदालती फैसला आया है जिसमें चर्च के एक पादरी और एक नन को उम्रकैद सुनाई गई है। यह हिन्दुस्तान में सबसे लंबे समय तक चलने वाला हत्या का मामला है, और यह कई मायनों में एक ऐतिहासिक मामला रहा जिस पर केरल का ईसाई समुदाय बंट गया था, और राज्य की पुलिस से लेकर सीबीआई तक इस मामले की जांच में बार-बार बेनतीजा हो रही थीं।
कत्ल का यह मामला चर्च के भीतर के लोगों को अवैध संबंधों को उजागर करने वाला भी है क्योंकि अदालत में आखिरकार यह साबित हुआ कि जिस नन, सिस्टर अभया, की जख्मी लाश कुएं में मिली थी, वह सुबह 4 बजे पढ़ाई के लिए उठी थी, और रसोईघर में जाने पर उसकी हत्या हो गई थी। सीबीआई ने अदालत में कहा कि उसने रसोई में दो पादरियों और एक नन को अनैतिक स्थिति में देखा, और वह कहीं भांडाफोड़ न कर दे, इसलिए इन तीनों ने मिलकर उसका गला घोंटा, उस पर कुल्हाड़ी से वार किया, और चर्च के हॉस्टल के अहाते में ही उसे कुएं में फेंक दिया। लेकिन जैसा कि ईसाई चर्च अनैतिक संबंधों और देह शोषण के, बच्चों के यौन शोषण के अधिकतर मामलों में करते आया है, उसने इस मामले में संदिग्ध पाए गए पादरियों और नन को काम पर से नहीं हटाया, उन्हें निलंबित नहीं किया, और उनसे रिश्ता नहीं तोड़ा। जो लोग यौन शोषण पीडि़त ननों के हक के लिए केरल में कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं वे चर्च के इस रूख पर बहुत ही निराश हैं, और उनका कहना है कि अभी भी एक चर्च प्रमुख के खिलाफ एक नन से बलात्कार का मुकदमा चल रहा है, और बरसों तक चर्च ने उसे हटाया भी नहीं।

Killer priests of nuns and nuns with life imprisonment Eyes should open…


केरल में इस मामले की जांच खासी मुश्किल इसलिए भी थी कि कई जांच अफसर ईसाई समुदाय के थे, और यह खतरा बना हुआ था कि धर्म के प्रति आस्था उनके निष्पक्ष नजरिए को प्रभावित कर सकती थी। राज्य में मतदाताओं पर चर्च के प्रभाव को देखते हुए भी राज्य सरकार का रूख गड़बड़ा सकता था, और आखिर में जाकर सीबीआई को यह मामला दिया गया। अलग-अलग वक्त पर इस मामले से जुड़े सुबूतों को बर्बाद करने की कोशिश की गई, इस कत्ल को खुदकुशी साबित करने की कोशिश की गई, और केरल के जागरूक लोगों का यह कहना है कि यह मामला इस मायने में भी ऐतिहासिक था कि इसे बेनतीजा बंद करने की सबसे अधिक कोशिशें हुईं।
अब भारत में जुर्म की जांच और अदालती कार्रवाई की बदहाली का यह एक पुख्ता नमूना है कि ऐसे एक जलते-सुलगते मामले पर सीबीआई अदालत का फैसला आने में 28 बरस लग जाएं। इस बीच हाईकोर्ट को कई बार इस मामले में दखल देनी पड़ी तब जाकर इसकी जांच से छेड़छाड़ बंद हुई। जांच और अदालत में 28 बरस लग जाना अपने आपमें बेइंसाफ इंतजाम है। भारतीय लोकतंत्र में जांच एजेंसियां ताकतवर के खिलाफ तकरीबन बेअसर साबित हो जाती हैं। बची-खुची नौबत अदालती कार्रवाई में खराब हो जाती है क्योंकि वहां सुबूतों और गवाहों से छेड़छाड़, दबाव, और खरीद-बिक्री आम बात है। फिर बहुत से मामलों में अगर जज रिश्वत लेने को तैयार है, तो ताकतवर लोग रिश्वत देने के लिए उतावले रहते हैं, और एक पैर पर खड़े रहते हैं। नतीजा यह होता है कि अदालती फैसला आने तक अलग-अलग स्तरों पर इंसाफ की संभावना की भ्रूण हत्या होते चलती है।
जिस नन का कत्ल हुआ था, उसके मां-बाप भी इंसाफ का इंतजार चौथाई सदी तक करते रहे, और अभी कुछ बरस पहले मरे। इस मुद्दे पर लिखने का हमारा मकसद यह है कि धर्म-संस्थान अपने मुजरिमों को किस हद तक जाकर बचाने की कोशिश करते हैं, ऐसा बहुत से धर्मों में सामने आता है। दूसरी तरफ धर्म-संस्थान से जुड़े रहने की वजह से किसी पर नैतिकता लागू नहीं हो जाती, और वे हर किस्म का जुर्म करने के लायक बने रहते हैं, हर किस्म की हिंसा कर सकते हैं, करते हैं। एक आखिर बात यह कि आसाराम (बापू) से लेकर (बाबा) राम रहीम तक इतने बलात्कारी धार्मिक व्यक्ति समाज में देखने में आते हैं कि उनके पैरों पर गिरने वाले नेता, अफसर, जज अनगिनत रहते हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ किसी शिकायत को जगह नहीं मिलती, इनके खिलाफ शिकायत दर्ज हो जाए तो गवाह सडक़ों पर एक के बाद एक मारे जाते हैं, और ऐसे हजारों लोगों में से दो-चार को ही सजा हो पाती है। धर्म का हिंसक और अनैतिक रूप केरल के चर्च के इस मामले में जितना सामने आया है, उतना ही बहुत से दूसरे धर्मों के मामलों में भी सामने आते रहता है। इसलिए लोगों का भला इसमें है कि धर्मान्ध की तरह आंखें और मुंह बंद रखने के बजाय एक तर्कवादी की तरह आंखें खुली रखनी चाहिए, और सवाल तैयार रखने चाहिए। धर्म उसी वक्त तक पटरी पर चल सकता है, जब तक समाज के भीतर उससे पीछे सवाल करने का हौसला रखने वाले लोग हों, और ऐसे सवालों के लिए माहौल भी हो। लेकिन ताकत के तमाम ओहदों पर बैठे हुए लोगों में बहुतायत ऐसे लोगों की होती है जो कि धर्मान्ध होते हैं, और बेहौसला होते हैं। क्रिसमस के ठीक पहले केरल में ईसाई समुदाय के भीतर, चर्च के भीतर के इस जुर्म से वे सारे मामले भी याद आते हैं जिनमें बड़े-बड़े पादरियों के हाथों बच्चों के यौन शोषण के अनगिनत मामलों को कैथोलिक चर्च मुख्यालय, वेटिकन ने दबाने की हर कोशिश की थी। लोगों को अपने-अपने धर्मों के भीतर सुधार इसलिए करना चाहिए क्योंकि अगला हमला उनके परिवार पर भी हो सकता है। यह बात भूलना नहीं चाहिए कि धर्म-संस्थानों के लोगों के शिकार अनिवार्य रूप से उसी धर्म के, उनके भक्तों के परिवार ही होते हैं। आसाराम के बलात्कार की शिकार लडक़ी आसाराम के भक्त परिवार की बच्ची ही थी। लोग अपने परिवार को बचाना चाहते हैं तो अपने धर्म पर निगरानी रखें, और अपने परिवार को ऐसे खतरों से दूर रखें।

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