Home गौरतलब मतलब की राजनीति के गुरू और द्वार में घुसे लोग..

मतलब की राजनीति के गुरू और द्वार में घुसे लोग..

-संजय कुमार सिंह॥
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दो अक्तूबर 2015 को विजय घाट नहीं गए थे। अखबारों की खबरों के अनुसार राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और कांग्रेस अध्यक्ष गए थे। लाल बहादुर शास्त्री के पुत्र और भाजपा नेता अनिल शास्त्री ने तब (भी) इसे खास महत्व नहीं दिया था। उन्होंने इसे प्रधानमंत्री का विकल्प माना था (हालांकि, कुछ जिम्मेदारियां पदेन होती हैं और दो अक्तूबर को राजघाट पर जाना इसी में है) और कहा था, वे वाकई व्यस्त होगें। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा था कि 50 साल में पहली बार (किसी) प्रधानमंत्री ने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को श्रद्धांजलि नहीं दी थी।


प्रधानमंत्री को सही ठहराने के लिए उन्होंने यह भी कहा था कि शास्त्री जी के जयंती समारोह में प्रधानमंत्री का शामिल नहीं होना मोदी सरकार के गए साल (2014 के) निर्णय से जुड़ा हो सकता है। तब सरकार ने यह निर्णय लिया बताते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्रियों के जन्म दिन से संबंधित समारोह संबंधित परिवारों तथा पार्टियों को करना चाहिए। दो साल भी नहीं गुजरे थे, उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (18 घंटे काम करने के प्रचार के बीच) लाल बहादुर शास्त्री के पुश्तैनी घर गए। राजघाट नहीं जाने पर प्रधानमंत्री का बचाव करने वाले लाल बहादुर शास्त्री के पुत्र और भाजपा नेता अनिल शास्त्री ने तब जो कहा था उसे बीबीसी ने रिपोर्ट किया था।


संबंधित अंश इस प्रकार हैं, ” (भाजपा को) थोड़ा बहुत तो फ़ायदा ज़रूर होगा। जनता के मन में था कि इन बड़े नेताओं को जो स्थान मिलना चाहिए था नहीं मिला। और जब वो देखते हैं कि भारतीय जनता पार्टी ऐसा कर रही है तो उनके मन में लगता है कि वो ठीक काम कर रहे हैं।” हालांकि, अनिल शास्त्री ये भी कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी के पास लाल बहादुर शास्त्री, सरदार पटेल और सुभाष चंद्र बोस जैसे नेता कभी नहीं रहे। यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी उन्हें आगे रखकर राजनीति करती है।
आप जानते हैं कि भाजपा के मुख्य प्रचारक, भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रचार और भाषण का असर हुआ तथा उत्तर प्रदेश में भाजपा को बहुमत मिला। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी। इस सरकार ने जो प्रमुख काम किए उनमें एक काम है, मुगलसराय स्टेशन का नाम बदलना। आप जानते हैं कि जून 2018 में मुगलसराय स्टेशन का नाम बदलकर, पंडित दीन दयाल उपाध्याय जंक्शन कर दिया गया। वैसे तो स्टेशन का नाम बदलना रेलवे का काम था लेकिन राज्य सरकार शहर का नाम तो बदल ही सकती है और शहर का नाम बदल जाए तो स्टेशन नाम हावड़ा हो या सियालदह क्या फर्क पड़ता है।


कहने की जरूरत नहीं है कि 2014 में केंद्र की सत्ता पर काबिज होने के बाद मोदी सरकार ने कई जगहों और योजनाओं के नाम बदल दिए हैं जिसमें ज्यादातर पंडित दीन दयाल उपाध्याय के नाम से हैं और दिल्ली में दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल से लेकर सड़क तक सब है। बात पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की हो रही थी। लाल बहादुर शास्त्री को जो जानता है वह यह भी जानता है कि उनका जन्म मुगलसराय में हुआ था, वे देश के प्रधानमंत्री बने और रेल मंत्री भी थे। एक दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया था और उनकी संदिग्ध मौत ताशकंद में हुई थी। ऐसे में अगर मुगलसराय स्टेशन या शहर का नाम बदला जाना था (दोनों अलग भी हो सकता था) तो लाल बहादुर शास्त्री का दावा उनके बेटे या पार्टी के नेता ने क्यों नहीं किया या पार्टी के लोगों को उनके बेटे की याद क्यों नहीं आई, मैं नहीं जानता।
ऐसे नेताओं वाली ऐसी पार्टी ने इस बार किसान दिवस पर चौधरी चरण सिंह को श्रद्दांजलि देने की अनुमति नहीं दी और उनके पोते, जयंत चौधरी ने इसे रेखांकित किया तो वह भी खबर है भले ही राजनीतिक कारण से प्रधानमंत्री का दो अक्तूबर को राजघाट और विजयघाट जाना या नहीं जाना कभी मुद्दा नहीं बना ना ही बिना किसी सुरक्षा तामझाम के एक दिन अचानक गुरुद्वारा तक टहल लेना। यह सब उस देश में हो रहा है जिसे कृषि प्रधान कहा जाता है। जहां और जिस देश के प्रधानमंत्री ने, जय जवान जय किसान का नारा दिया था उसके साथ और उसके बावजूद हो रहा है।

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