बंग-भंग के दिनों को याद करे बंगाल

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प.बंगाल इस वक्त देश की राजनीति का हॉटस्पॉट बना हुआ है। वैसे कायदे से तो इस वक्त दिल्ली में राजनीति गर्म होनी चाहिए थी, क्योंकि 25 दिनों से हजारों किसान दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर धरने पर बैठे हैं। वे केंद्र सरकार से नए कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। सरकार भी अपना इरादा जतला चुकी है कि वो किसी सूरत में कानून वापस नहीं लेगी। प्रधानमंत्री अलग-अलग मंचों से नए कानूनों की तारीफ कर रहे हैं। यह बता रहे हैं कि कैसे ये कानून किसानों के हक में हैं। लेकिन उनके घर और दफ्तर से कुछ किमी की दूरी पर बैठे किसानों के पास जाकर सीधी बात करने की हिम्मत उन्होंने अब तक नहीं दिखाई है।

आश्चर्य है कि वे लद्दाख जाकर दुश्मन देश को चुनौती देते हुए देश को दिखाई दे जाते हैं, कभी सैन्य वर्दी में वीरता की बातें करते नजर आ जाते हैं, गुरुद्वारे जाकर गुरु तेगबहादुर की शहादत के लिए उन्होंने मत्था टेक लिया, लेकिन 25 दिनों में 30 किसानों की शहादत पर उनके मुंह से अब तक एक शब्द नहीं निकला। न ही उन लोगों के लिए उन्होंने कोई नाराजगी दिखाई, जो किसानों को कभी खालिस्तानी कहते हैं, कभी नक्सल तो कभी देशविरोधी। खैर देश के खुद्दार किसान प्रधानमंत्री के सांत्वना भरे शब्दों के मोहताज नहीं हैं। वे अपने हक के लिए आवाज उठा रहे हैं और उन्हें उनका हक दिलाना लोककल्याणकारी सरकार का दायित्व है। सरकार इस दायित्व के निर्वहन में विफल नजर आ रही है। वैसे भी भाजपा का ध्यान देश संचालन से अधिक सत्ता हासिल करने में है। बिहार किसी तरह उसके कब्जे में फिर आ गया और अब नजरें प.बंगाल पर है।

कभी वामपंथ का गढ़ रहा प. बंगाल पिछले 10 सालों से टीएमसी के प्रभुत्व को देख रहा है। और भाजपा यहां अपनी जड़ें मजबूत करने के लिए बुरी तरह छटपटा रही है। पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में उसे संतोषजनक सफलता तो नहीं मिली, लेकिन अपने पैर जमाने के लिए जमीन उसने तैयार कर ली। नेताजी के नाम को भाजपा ने पहले बहुत भुनाया, इसके साथ जय श्रीराम का नारा भी लगाया, लेकिन इसमें खास सफलता नहीं मिली, तो अब खुदीराम बोस, स्वामी विवेकानंद और गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के नाम पर राजनीति की जा रही है। यह देखना दुखद है कि किसी जमाने में देश को नए विचार, नई कल्पनाएं और नवजागरण देने वाला प.बंगाल आज राजनीति की पुरानी चालों का शिकार हो रहा है।

1905 में तो लार्ड कर्जन की बंग-भंग नीति का पुरजोर विरोध बंगाल के लोगों ने किया। बच्चे, नौजवान, बूढ़े, स्त्रियां, किसान, मजदूर, व्यापारी, उद्योगपति, लेखक, कलाकार सभी लोग अंग्रेजी हुकूमत के इस फैसले के खिलाफ सड़कों पर उतर आए थे। आमार सोनार बांग्ला और वंदे मातरम की गूंज फिजाओं में तैरती थी। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के आह्वान पर लोगों ने एक दूसरे को पीले सूत की राखी बांधी थी, इस संकल्प के साथ कि वे इस फैसले को वापस करवाएंगे। और 6 साल बाद 1911 में अंग्रेजी राज को यह फैसला वापस लेना ही पड़ा। आज 2020 में बंगाल फिर विभाजनकारी राजनीति का शिकार बनने जा रहा है। 

बंगाल की जनता को हिंदू, मुसलमान, सवर्ण, आदिवासी, दलित जैसे वर्गों में बांटकर राजनैतिक दल अपनी-अपनी गोटी बिठाने में लग गए हैं। भाजपा के नेता कभी किसी आदिवासी के घर भोजन कर रहे हैं, कभी किसी किसान के घर। इसके साथ ही भाजपा जोड़-तोड़ की राजनीति में लग चुकी है और अमित शाह की मौजूदगी में टीएमसी और अन्य दलों के कई विधायकों ने भाजपा का कमल थाम लिया। अमित शाह ने दावा भी कर दिया है कि वे 200 से अधिक सीटें जीतेंगे। उनका यह दावा बेबुनियाद भी नहीं लगता, क्योंकि सत्ता कैसे हासिल करना है, ये भाजपा खूब जानती है।

डर इस बात का है कि इस चाल में फंसकर प.बंगाल का हाल कैसा होगा। वैसे इस प्रांत के लोगों ने अपनी धार्मिक आस्थाओं और राजनैतिक मूल्यों में कभी घालमेल नहीं किया। लेकिन जिस तरह से भाजपा ने यहां अपने समर्थक बढ़ाए हैं और अब टीएमसी के शुभेंदु अधिकारी जैसे कुछ प्रभुत्वशाली लोगों के साथ-साथ अन्य दलों के कुछ विधायकों का भाजपा प्रवेश करवाया गया, उससे यही समझ आ रहा है कि भाजपा जोड़-तोड़ की इस राजनीति को आखिर तक जारी रखेगी। अभी जय श्रीराम के नारे की जगह जय मां काली का उद्घोष करने की तैयारी है, लेकिन उसमें भी डर यही है कि जो अभी सॉफ्ट हिंदुत्व दिख रहा है, वो चुनाव आते-आते कट्टरता में न बदल जाए।

प.बंगाल के पास अद्भुत सांस्कृतिक, ऐतिहासिक विरासत है। लेकिन केवल अतीत के राग से वर्तमान नहीं सुधारा जा सकता, न बेहतर भविष्य के वादे किए जा सकते हैं। यह तभी होगा जब बंगाल के लोग पुनर्जागरण के काल जैसी जागरुकता और संघर्षशीलता दिखाएं और रूढ़िवादी ताकतों को कड़ा जवाब दें।

(देशबंधु)

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