लेफ़्ट : बहुत कठिन है डगर पनघट की..

भारत की राजनीति में लेफ़्ट की पार्टियों को 100 साल पूरे हो रहे हैं। ब्रिटिश शासनकाल से लेकर आज़ाद भारत में लेफ़्ट एक लड़ाक़ू क़ौम के रूप में अपनी पहचान बनाते रहे हैं। फिर क्या वजह है कि इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में दाखिल होने से पहले वे नेस्तनाबूद हो गए। जिस तरह से अब आर्थिक संकट विकराल रूप ले रहा है, उम्मीद की जाय कि लेफ़्ट एक बार फिर से उभर कर आगे आएंगे? दो भागों में वरिष्ठ पत्रकार अनिल शुक्ल का बारीक़ और व्यापक विश्लेषण। प्रस्तुत है पहला भाग।


क्या किसान आंदोलन को ‘अल्ट्रा लेफ़्ट’ द्वारा अगवा किये जाने के ‘इंटेलिजेंस ब्यूरो’ के आरोप में सचाई है? क्या सचमुच भाजपा के केंद्रीय नेताओं के इस आरोप में दम है कि इस समूचे ‘आंदोलन’ का केंद्र बने पंजाब के किसान आंदोलन पर लेफ़्ट हावी है? आज़ादी के बाद के दशकों में हुए देश के सबसे बड़े किसान आंदोलन को घूम फिर के लेफ़्ट के साथ जोड़कर क्यूँ देखा जा रहा है? क्या लेफ़्ट वाक़ई नए सिरे से प्रभावशाली शाक्ति के रूप में उभर रहा है?


ऐसे दौर में जब मोदी सरकार के बड़े पैमाने पर होने वाले निजीकरण, राष्ट्रीय परिसम्पत्तियों की बेधड़क बिक्री, श्रम क़ानूनों के निरस्तीकरण के विरुद्ध ‘ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच’ (जिसके नेतृत्व में बड़ी तादाद लेफ़्ट यूनियनों की है) के आह्वान पर निजी और सरकारी क्षेत्रों के मज़दूर और कर्मचारी नवम्बर के आख़िरी हफ़्ते में एक दिन की देशव्यापी हड़ताल पर चले जाते हों तब भारत में ‘लेफ़्ट’ की प्रासंगिकता का आकलन ज़्यादा मुश्किल बात है?


लंबे समय से यह सवाल किया जा रहा है कि देश में निरंतर गहराते आर्थिक संकट और तेज़ी से उभरते श्रमिक और कृषक असंतोष को लेफ़्ट स्थायी जनसंघर्षों में परिवर्तित कर सकता है? यह भी कि क्या इन जनांदोलनों के उभार पर सवार होकर लेफ़्ट आने वाले दिनों में एक बार फिर अपना परचम लहराता दिखेगा?


क्या बिहार की जीत वामपंथियों के लिए ‘चरम उभार’ है? क्या पश्चिम बंगाल के आगामी चुनावों में भी यह अपना रंग दिखाएगा? भाजपा के ‘कट्टर हिंदू’ उद्घोष के विरुद्ध वामपंथी क्या इन आंदोलनों और प्रदर्शनों को ‘बैलेट’ के केंद्रीय एजेंडा में शामिल करवा पाने में कामयाब हो सकेंगे या बंगाल में बीजेपी के ऊंचे पहाड़ से टकराकर एक बार फिर से चकनाचूर हो जाएंगे?


भाकपा (माले) की जीत के पीछे की चाणक्य नीति क्या है? बंगाल के वामपंथी गठबंधन में ‘माले’ स्वीकार्य होगा? क्या कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ना लेफ़्ट के लिए अधिक फ़ायदेमंद होगा या एकला चलो की राह को मतदाता अधिक ‘भली’ नज़रों से देखेगा? क्या ममता बनर्जी को भी अपने साथ जोड़कर एक नया महागठबंधन बन सकता है? त्रिकोणात्मक चुनावों से लेफ़्ट को ज़्यादा घाटा होगा याकि ममता को?
क्या भांति-भांति की आलोचनाओं और पांच साला ‘अदल-बदल चक्र’ में इस बार केरल में वामपंथी अपनी सरकार बचा पाएंगे? क्या कांग्रेस और लेफ़्ट के बीच बंगाल में यारी और केरल में दुश्मनी की धार-दोनों जगह के मतदाताओं के गले उतरेगी?


इस तरह के बहुत सारे सवाल हैं जो न सिर्फ़ आम मतदाताओं के मस्तिष्क में बनी खाली जगह में घुमड़ रहे हैं बल्कि वामपंथी कार्यकर्ताओं को भी उद्वेलित कर रहे हैं। इन सब की धुरी एक ही जगह अटकी है-वामपंथियों का भविष्य क्या है? आज़ादी के बाद के सबसे बड़े विपक्षी दल की कुर्सी से लुढ़क कर अपने गढ़ पश्चिम बंगाल में 2019 में 6% वोटों पर सिमट आए वामपंथी क्या आर्थिक हाहाकारी के इस दौर में फिर से कमान संभालने में कामयाब होंगे? क्या अपने गठन के सौ साल पूरे होने पर लेफ़्ट एक बार फिर से सिर उठा कर खड़ा हो सकेगा?


संविधान दिवस की याद दिलाते हुए 26 नवंबर को हुई मज़दूर हड़ताल को मिली आशातीत सफ़लता और किसानों के व्यापक आंदोलन के कारणों की पड़ताल के संदर्भ में ‘संघ’ और भाजपा को हाल के दशकों में मिले उभार की चर्चा पर प्रसिद्द अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक माकपा के मुखपत्र ‘पीपल्स डेमोक्रेसी’ में लिखते हैं “हिंदुत्ववादी तत्वों के उभार के पीछे चालक शक्ति है उन्हें देश में सार्वजनिक विमर्श को बदलने में हासिल हुई सफलता। उन्होंने जिस विमर्श को बेदखल किया, वह ऐसा विमर्श था जो क़रीब एक सदी से राष्ट्रीय मंच के केंद्र में रहा है। (जिसका सम्बन्ध ग़रीबी, बेरोज़गारी, वृद्धि, विकास, स्वास्थ्य, रक्षा, शिक्षा और उनसे जुड़े मुद्दों से रहा है) वास्तव में 1917 में जब किसानों की समस्याओं को समझने के लिए गाँधी जी ने चम्पारण की यात्रा की थी, तब से यह विमर्श राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में रहा है। यह विमर्श उपनिवेश विरोधी समूचे संघर्षों में और आगे चलकर लंबे समय तक आज़ाद भारत की राजनीति के पीछे रहा था।”
यहाँ तक तो ठीक है लेकिन पटनायक ने अपने पूरे आलेख में इस बात का कहीं ज़िक्र नहीं किया है कि क्यों इस विमर्श को बरक़रार रखने में लेफ़्ट नाक़ामयाब रहा और कैसे वह ‘संघ’ को अपनी रणनीति में सफल होने से रोक नहीं पाया। दरअसल इन्हीं कारणों पर आत्मालोचना न किया जाना लेफ़्ट के धाराशायी होने के पीछे का मुख्य कारण है जिस पर विस्तार से चर्चा ज़रूरी है।


हालिया सालों में संसदीय ‘परफॉर्मेंस’ के साथ-साथ मज़दूरों और किसानों से जुड़े कई महत्वपूर्ण जन संघर्ष राजनीतिक समाज में लेफ़्ट के महत्वपूर्ण दखल को साफ़-साफ़ दर्शाते हैं। ‘अखिल भारतीय किसान सभा’ (माकपा नियंत्रित) के नेतृत्व में 2018 के नासिक-मुंबई मार्च ने कृषि संकट से जूझते किसानों के सवाल को देश की मुख्यधारा के साथ जोड़ा। इसी वर्ष ‘किसान सभा’ का फ़रवरी-मार्च का राजस्थान आंदोलन, सितम्बर 2018 का दिल्ली किसान-मज़दूर मार्च, ‘आशा’ कार्यकर्ताओं तथा आंगनवाडी कर्मियों का जनवरी 2018 में कर्णाटक में किया गया प्रबल आंदोलन और जनवरी 2019 में वामपंथियों की ट्रेड यूनियनों-कृषि और खेतिहर श्रमिकों के संगठनों की आम हड़ताल और जनवरी 2019 में महिला न्याय को लेकर केरल में खड़ी की गई महिलाओं की ‘विशाल दीवार’ जैसे शानदार संघर्षों ने वामपंथियों की शक्ति को दर्शाया है लेकिन क्या ये प्रदर्शन उसे चुनावी उपलब्धियों तक ले जाने में क़ामयाब हो सके? ज़ाहिर है इसका जवाब ‘हाँ’ में नहीं है। तब इसकी वजहें क्या है?


इसे समझने के लिए लेफ़्ट के इतिहास की जड़ों में जाना होगा। वास्तव में भारत में लेफ़्ट का इतिहास देश की आज़ादी के संघर्ष के इतिहास के साथ जुड़ा है। दिवंगत कम्युनिस्ट नेता ईएमएस नम्बूदरीपाद के शब्दों में “भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन की जड़ें एशिया में चले विभिन्न साम्राज्यवाद विरोधी, औपनिवेशिक और अर्ध औपनिवेशिक आंदोलनों के बीच से उभरने वाले उग्रवादी रुझानों के साथ जुड़ी हैं। उपनिवेश विरोधी आंदोलनों के साथ गहराई से जुड़े वामपंथी आंदोलन के लिए वैचारिक रूप से आवश्यक था कि वह आम लोगों में लोकप्रिय होने के लिए ऐसे रुझानों के साथ खुद को पेश करे। अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन से प्रेरित होकर उसकी इन्हीं कोशिशों ने उसे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और बाद में इसकी प्रशाखाओं का प्रखर चेहरा बनने और क्रांति दिशा में सुदृढ़ मज़दूर-किसान गठबन्धन बनाने में मदद की। पार्टी और उसके संगठन-किसान सभा के नेतृत्व में निज़ाम हैदराबाद के ख़िलाफ़ बगावत, पश्चिम बंगाल और थाणे (महाराष्ट्र) के उग्र किसान आंदोलन और ‘गणमुक्ति परिषद्’ द्वारा त्रिपुरा के आदिवासियों के संघर्ष इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।”


आज़ादी के बाद की भाकपा ने संसदीय सौंध में दख़ल की योजना बनाई और पहले संसदीय चुनावों (1957) में वह लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी। दूसरे आमचुनावों (1957) में भी अपनी संख्या बढ़ोतरी के साथ उसने लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल का रूतबा बरक़रार रखा। 1957 में ही उसने केरल विधान सभा में जीत हासिल करके वहां अपनी सरकार बनाई। 2 दशकों बाद उसने पश्चिम बंगाल की ‘रायटर्स बिल्डिंग’ (राज्य सरकार का तत्कालीन सचिवालय) पर लाल झंडा फ़हराने में सफलता हासिल की और कुछ समय बाद त्रिपुरा में। 50 और 60 के दशक में इन 3 राज्यों में हासिल पार्टी के जनाधार को 60 के दशक में पार्टी में हुआ विभाजन भी खिसका नहीं सका था। 60 और 70 के दशकों में भूमि के सवालों पर कम्युनिस्ट आंदोलन ने संघर्षों की झड़ी लगा दी। इसमें एक ओर जहाँ सीपीआई (एमएल) के ऐतिहासिक ‘नक्सलबाड़ी विद्रोह’ की सैकड़ों गाथाएं हैं जिन्हें बाद में क्रूर दमन के जरिये कुचलने की कोशिशें हुईं। ‘नक्सलबाड़ी विद्रोह’ का व्यापक असर 77 में गठित वाम मोर्चा सरकार की कारगुज़ारियों पर पड़ा जिसके चलते भूमि सुधारों का सिलसिला बना। इसमें पड़ती (सरप्लस) भूमि को जोतने वालों में बांटने की ऐतिहासिक कार्रवाइयां शामिल हैं।


माकपा के पूर्व महासचिव प्रकाश करात के शब्दों में “भूमि सुधार के रूप में लड़े गए संघर्ष, सत्ता का विकेन्द्रीकरण, सामूहिक गतिविधियों हेतु मज़दूरों के अधिकारों का सशक्तिकरण और प० बंगाल, केरल तथा त्रिपुरा में धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा ने वामपंथ के जनतांत्रिक एजेंडे को आगे बढ़ाने में मदद की।”
बेशक़ अपनी वीरोचित गाथाओं का गुणगान करने में अन्य नेतागण की तरह कम्युनिस्ट भी नहीं थकते लेकिन वे न तो अपने कार्यकर्ताओं को इस बात का जवाब दे पाते हैं कि 2004 में लोक सभा में 61 सीट जीतने वाला वाम मोर्चा 2019 में 5 सीटों पर कैसे सिमट आता है और न वे राजनीतिक बीजगणित की इस पहेली को हल कर पाते हैं कि 34 साल बंगाल में हुक़ूमत जमाने के बावजूद 2019 के चुनाव में सभी लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद क्यों वे प० बंगाल के केवल 6% वोटरों का विश्वास ही हासिल कर पाते हैं? 2019 के लोकसभा चुनावों में (जबकि केरल राज्य सरकार पर लेफ़्ट का क़ब्ज़ा था) वोटर ने ‘संयुक्त लोकतान्त्रिक गठबंधन (यूडीएफ) के पक्ष में ज़बरदस्त मतदान करके बेशक एनडीए को जीत से बहुत दूर रखा लेकिन 2014 की तुलना में (10.85%) उनका वोट शेयर 2019 में बढ़ गया (15. 2%) जिसमें अकेले भाजपा की हिस्सेदारी 12.93% की थी (स्त्रोत ‘द हिंदू’) जो लेफ़्ट के लिए बेहद चिंता का सबब होना चाहिए।


2011 में बंगाल में उनके पूर्ण ध्वंस को अनेक समाजशास्त्रियों और राजनीति विज्ञान के शोधार्थियों ने अलग-अलग तरीके से परिभाषित किया है। तब के ‘इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली’ (ईपीडब्ल्यू) में लिखे अपने लेख में प्रभात पटनायक ने पार्टी के ‘अनुभववाद’ में गहरे धंस जाने की महामारी से ग्रस्त हो जाने को इसकी वजह बताया था। ‘अनुभववाद’ को परिभाषित करते हुए उन्होंने इसे ‘पूंजीवाद को हराने के कम्युनिस्ट गोल से भटक जाना’ बताया था जबकि हिरेन गोहेन जैसों ने इसे पार्टियों के ‘वर्ग चरित्र में आया बदलाव’ बताया जिसके चलते वे ‘आम जन से कटते चले गए।’ हिरेन आगे लिखते हैं कि ‘मूल वर्गों से जुदा हो जाने के पीछे लेफ़्ट की संसदीय लोकतंत्र के प्रति गैर क्रांतिकारी एप्रोच’ थी। कृपाशंकर ने लिखा कि ‘लोग लेफ़्ट को इसलिए अप्रासंगिक मानने लग गए क्योंकि उनकी नज़रों में वामपंथी अन्य बुर्ज़ुआ पार्टियों से अलग नहीं रहे थे।‘ अरूप बैश्य का कहना था कि ‘लेफ़्ट अब शासक वर्ग की पार्टी के तौर पर’ देखे जाने चाहिए।‘


मेरे विचार में लेफ़्ट की वैचारिक और रणनीतिक भूलों को 5 स्तर पर देखा जाना चाहिए –
(1) जहाँ तक मज़दूर, किसान, आदिवासी और मध्यवर्गीय संघर्षों का सवाल है, पहले भाकपा और बाद में माकपा ने उन्हें मूलभूत आर्थिक और राजनीतिक बदलाव की क्रांतिकारी लड़ाई का हिस्सा बनाने की बजाय सिर्फ़ आर्थिक सवालों के रूप में देखा। यही वजह है कि देश भर के ट्रेड यूनियन संघर्षों में निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों के मज़दूर और मध्यवर्ग कर्मचारी, कृषिगत लड़ाइयों में किसान, भूमि सुधार के संघर्षों में खेतिहर श्रमिक, जंगल के क़ब्ज़े के सवाल पर आदिवासी और शिक्षा तंत्र की मुश्किलों पर छात्र और मध्यवर्ग बुद्दिजीवी उनके झंडे के नीचे गोलबंद होते रहे लेकिन जब वोट डालने की बारी आती तो वे जातियों और धर्मों में बंट कर सम्बंधित पार्टियों की शरण में चले जाते।


बंगाल और त्रिपुरा में लेफ़्ट ने शुरूआती सालों में ‘बुनियादी’ लड़ाइयों में खुद को खपाया जिसका ‘ब्याज’ लम्बे समय तक वे खाते रहे लेकिन बाद में उन्होंने न सिर्फ़ इन वर्गों को छोड़ दिया बल्कि वे अपने कथित ‘वर्गशत्रु’ की गोद में जा बैठे (सिंगूर और नंदीग्राम इसके भोथरे उदाहरण हैं) जिसकी वे पचासों सालों से मुख़ालफ़त करते आए थे। ज़ाहिर है जिसका उन्हें न सिर्फ़ पश्चिम बंगाल में खामियाज़ा भुगतना पड़ा बल्कि जिसकी लौ ने उन्हें त्रिपुरा में भी झुलसा दिया।


34 साल के अपने शासनकाल में लेफ़्ट के भूमि सुधारों के लाभ निचली जातियों के निर्धन किसानों और कृषि श्रमिकों तक नहीं पहुँच सके। बुद्धदेव भट्टाचार्य शासनकाल में खासी गड़बड़ियां हुईं। वाम मोर्चा ने बहुत सी मंझोली फैक्ट्रियों को बंद कर दिया जिससे बड़ी तादाद में मज़दूर सडक पर आ गए और मध्यम वर्गीय उद्यमी भी बेकार हो गए। सौंदर्यीकरण के नाम पर छोटे व्यापारियों और खोमचे वालों को बेदख़ल कर दिया। किसान और आदिवासियों की ज़मीन ज़ब्त करके ‘घराना पूंजीपतियों’ को बेच दी। लालगढ़ के आदिवासी आंदोलन को कुचला।


बुद्धदेव भट्टाचार्य ने मनमोहन सिंह सरकार के एसईज़ेड (विशेष आर्थिक ज़ोन) के विचार को सख्ती से बंगाल में लागू किया जिससे बड़े घराने के पूंजीपतियों को लाभ हुआ जबकि इसका विरोध करने वाले मज़दूरों को बेरहमी से कुचला गया। हमेशा प्रतिरोधी शक्ति बने रहे भूमिहीन किसान, आदिवासी और निचली जातियों के सवाल को संजीदगी से उठाना लेफ़्ट भूल गया। आदिवासी ‘माइनिंग कॉर्पोरेशन’ के हाथो अपनी जमीन छीने जाने के विरुद्ध लड़ाई लड़ते रहे और लेफ़्ट उनकी तबाही व शसकीय मशीनरी एवं पुलिस द्वारा सख़्ती से किए जाने वाले दमन का नज़ारा चुपचाप देखता रहा। 34 साल के शासन में दलितों को नेतृत्व में लाने का कोई प्रयास नहीं हुआ। वामपंथी जब इन निर्धन किसानों, मज़दूरों और आदिवासियों के रोटी के सवाल नहीं हल कर सके तो धर्म के सवाल पर भाजपा का उन्हें आकर्षित करने में कामयाब होना स्वाभाविक ही था।
(कल के अंक में जारी) (‘सत्य हिंदी डॉट कॉम’ से साभार)


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