ईश्वर की ही तरह कोरोना आकस्मिक “प्रकोप” नहीं है..

ईश्वर की ही तरह कोरोना आकस्मिक “प्रकोप” नहीं है..

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-राजीव मित्तल॥॥

विश्व रंगमंच पर ईश्वर और कोरोना का आगमन आकस्मिक नहीं है..पहले थोड़े में कोरोना पर..दूसरे महायुद्ध के बाद लोकतंत्र की बयार बहने और पूंजीवाद की तानाशाही प्रवित्ति के मुकाबिल होने के चलते आयी मुनाफे की गिरावट को संभालने के लिए एक बीमारी के नाम पर ऐसा छद्मजाल बुना गया, जो दुनिया को आतंकित कर दे और पौने आठ अरब इंसानों को घुटने पर ला दे ताकि एक फिर से सारी अर्थव्यवस्थाओं में बदलाव कर पूंजीवाद को ठोस मजबूती प्रदान की जा सके..इस साजिश में चीन आदतन उखाड़ पछाड़ में लग गया और मनमाने ढंग से चलते हुए कोरोना वायरस को बंद जार से बाहर निकाल दिया..इसमें उसकी मंशा फलीभूत हुई और अमेरिका जैसे विकराल देश की चूलें हिल गयीं..

खैर, बीती ताहि बिसार दे का अनुगमन करते हुए अमेरिका ने इस खेल को अपने ढंग से खेलने की सोची और वैक्सीन नाम के हथियार की उत्पत्ति में जुट गया..इस काम को अंजाम दे रहा है वहीं का एक मनसबदार बिलगेट्स, जो लंबे समय से दुनिया का सबसे ज़्यादा पैसे वाला बना हुआ है..अमेरिका की देखा देखी गंगा में हाथ धोने को रूस वगैरह भी जुट गए..अपडेट यह है कि अब दुनिया की पौने आठ अरब आबादी पूरी तरह अस्तव्यस्त, डरी हुई और परेशान हो वैक्सीन रूपी ईश्वर के इंतज़ार में पांत में बैठा दी गयी है..

भविष्य में खरबों शंखों डॉलरों की कमाई के साथ साथ ऐसी विश्व अर्थव्यवस्था की तैयारी है, जो करीब डेढ़ सौ साल चले मजदूर, उसकी मजदूरी, उसके काम के घंटे के नियम कानून आदि को कबाड़ में फेंक देगी..उसकी ताकत को करीब तीस वर्ष पहले मुक्त अर्थव्यवस्था के नाम पर बुरी तरह कमज़ोर किया ही जा चुका है..हर पेशे को कॉन्ट्रैक्ट के अधीन ला कर श्रमिक ताकत, उसके आंदोलन, उसकी लड़ाई वगैरह को पलीता लगाया जा चुका है..

कुल मिला विश्व अर्थव्यवस्था का एक ही रंग है वो है धूसर.. कोरोना का वैक्सीन इस व्यवस्था के ढीले ढाले कलपुर्जों को पूरी तरह कस देगा और पूंजीवाद पूरी तरह टंच हो कर मस्तानी चाल चलेगा..इस व्यवस्था में मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग जैसा कुछ दिखावे भर को रह जायेगा..दिखेगा तो केवल अय्याशी (उद्यमशीलता शामिल है) करता “ज़मींदार” और उसे पंखा झलते “सेवादार”..

वर्तमान व्यवस्था को खड़ा किये विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका वगैरह ऐसे ही खड़े रहेंगे और किसी दिन अपने आप ढह जाएंगे..तथाकथित चौथे खंबे पत्रकारिता का भारतवर्ष में जो हाल हो चुका है, जल्द ही उसकी विकलांगता विश्व भर का अंग बन जाएगी..

अब आइये ईश्वर पर, तो यहां हम खांटी देसी अंदाज़ को देसी चौखटे में रख कर बात करेंगे..भारतीय समाज एक ऐसा रंगमंच है जो अनादि काल से डिवाइन प्रॉक्सी से संचालित हो रहा है..इस छद्म खेल की शुरुआत हुई जंगली आर्यों के प्रवेश से, जो सभ्य होते जाने के साथ ही समाज को कंट्रोल करने के लिये ईश्वर नाम की एक अशीरीरी ताकत धरती पर उतारने की व्यवस्था में जुट गये.. चूंकि यह काल्पनिक अवधारणा थी, जिसका कोई रंग-रूप-आकार नहीं था, इसलिये अकेले ईश्वर से कोई भला नहीं होना था, तो एक भरे-पूरे डिवाइन समूह की कल्पना की गयी, जिसके कई किरदार उन्हें प्रकृति के अलग-अलग रूपों में बैठे-बिठाए मिल गये, और बाकी की छवि कैसी हो, इसके लिये उन्होंने अपनी रचनात्मक शक्ति का भरपूर इस्तेमाल किया..

तभी से समाज में खास कर भारतीय समाज में जन्म से मृत्यु तक सांस लेने से ले कर सांस छोड़ने की क्रिया ईश्वर और उसके गणों के कंट्रोल में है.. यही जमावड़ा मानव नाम के जीव का केआरए देख यह तय करता है कि चोला छोड़ने के बाद उस मानव की आत्मा को कुंभीपाक नरक भेजना है या रौरव नरक, या फिर उसे स्वर्ग के दर्शन कराए जाएं.. अगर केआरए का ग्रेड ए प्लस हुआ तो उसके लिये मोक्ष नाम का एक स्पेशल ठिकाना है, जो सरकारी वृद्धाश्रम जैसा समझिये, जहां हमेशा भजन-कीर्तन होता रहता है, जहां मच्छर भी मारने को नहीं मिलते..ढेर सारी सहूलियतें, जो बिल्कुल फ्री.. किसी विमान कम्पनी के पैकेज टूर वाले मजे..

मानव के रोजमर्रा के क्रिया-कलाप पर नजर रखने के लिये तीन सुपर फोर्सेस (ब्रहमा-विष्णु-महेश) और हर दिन नये-नये रूप में प्रकट होने वाले देवी-देवताओं की भरी-पूरी टीम.. ऐसी कोई टीम इस ब्राह्मांड में मौजूद है, इसके प्रचार-प्रसार के लिये समाज के भीतर से ही पुरोहित वर्ग ने जन्म लिया, जो समाज के बाकी तुच्छ प्राणियों को डरा धमका कर उनका परलोक सुधारने में लग गया..

तब-तक बिना किसी भेदभाव के विचर रहे आदम और हव्वा एक बगीचे में पेड़ से तोड़ सेब खा चुके थे, और जिसके खाते ही दोनों को नर-नारी के विभेद का ज्ञान हो चुका था और यह भी कि अब उनकी भूमिकाएं क्या-क्या हैं.. बच्चे पैदा करने-कराने से लेकर नर के पथप्रदर्शक और नारी का उसकी अनुगामिनी बने रहने तक तो मामला कुल मिला कर ठीक ही रहा, लेकिन पुरोहित समाज को नारी के अंदर कुछ ऐसे वीषाणु नजर आए जो पूरी कायनात को जहन्नुम बनाने के लिये काफी थे.. यहीं से शुरू हुआ नारी को मांस पिंड समझने और कुलटा और छिनाल जैसे अनेकानेक शब्दों से सुशोभित करने का खेल, जो आज भी जारी है..

ज्ञानियों ने एक और छद्म खेल खेलते हुए गऊ को माता, गंगा को मैया और नारी को देवी का रूप दे कर आकाश गुंजा दिया, जिसमें नारी की स्थिति तो शुरू से आज तक देवी और कुलटा के बीच में फंसी हुई है, उसे कब कौन सा रूप देना है, इसका सर्वाधिकार पुरुष समाज ने अपने पास रखा है.. और कलयुग के 21 वें दशक में गऊ माता हर शहर, हर गांव के चौक-चौराहों पर लतियायी जा रही है और गंगा मैया सड़ांध मारती नाला बन चुकी है..

भारतवर्ष नाम के इस राष्ट्र की सबसे बड़ी खासियत है सच से मुंह छुपाना और सच से मुंह छुपाने का सबसे आसान तरीका है अपने को किन्हीं वेदों, किन्हीं पुराणों, किन्हीं गीताओं और किन्हीं रामायणों को लिहाफ बना कर अपने ऊपर डाल न जाने कौन से पुण्यों का जाप करना ताकि शरीर से निकल कर आत्मा सीधे स्वर्ग का टिकट कटाए..और जब तक इहलोक में है, संतान पैदा करने से लेकर दुनिया के बाकी काम सुभीते से चलते रहें..इससे भी ऊपर है मोक्ष की अवधारणा, जो जीव नाम के पापी चोले से हमेशा के लिये मुक्ति दिलाने के तरीके बताती है.. इसी मोक्ष को पाने के लिये “करोड़ों” साल पहले सतयुग नाम के किसी जमाने से तपस्या की परम्परा चली आ रही है..

इन्हीं अवधारणाओं की अगली कड़ी में किन्हीं सावित्री, सीता, शकुन्तला, कुंती, शचि जैसे चरित्र हैं, जिनका घनघोर पतिव्रता चरित्र चौखटे में फिट कर घर-घर लटका दिया गया है और घर-घर में औरत नाम के क्षूद्र प्राणी की मुंडी पकड़ कर उस चौखटे के सामने 24 घंटे में 24 बार लायी जाती है कि देखो तुम्हारा नाम कोई भी हो, लेकिन तुम्हें बनना इन जैसा ही है, अगर तुम दाएं-बाएं हुई तो कुलटा, पापी, नरक का कीड़ा कहलाओगी..

—कुछ पुरानी अवधारणाओं को शामिल करना जरूरी समझा क्योंकि वो दिन ब दिन पुख्ता होती जा रही हैं–

जारी…..

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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