राजधर्म पर राजहठ हावी..

Desk

दिल्ली में सर्दी बढ़ती जा रही है। किसान आंदोलन के दिन बढ़ते जा रहे हैं। आंदोलन में शामिल किसानों की मौत की संख्या बढ़ रही है। और इसके साथ-साथ सरकार का अडिय़ल रवैया भी बढ़ते जा रहा है। कृषि कानूनों पर सरकार औऱ किसानों के बीच गतिरोध का मामला बढ़ते-बढ़ते सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है। गुरुवार को किसान आंदोलन के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा कि वो किसानों के प्रदर्शन करने के अधिकार को स्वीकार करती है और वो किसानों के ‘राइट टू प्रोटेस्ट’ के अधिकार में कटौती नहीं कर सकती है।

गौरतलब है कि अदालत में इस आशय की शिकायत याचिका दाखिल की गई है कि किसानों के प्रदर्शन के कारण दिल्ली की सड़कें बाधित हो रही हैं और इससे नागरिकों के अधिकारों पर प्रभाव पड़ रहा है। केंद्र का पक्ष रख रहे वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने दलील रखी कि प्रदर्शनकारियों ने दिल्ली आने वाले रास्तों को ब्लॉक कर रखा है, जिससे दूध, फल और सब्जियों के दाम बढ़ गए हैं, जिससे अपूरणीय क्षति हो सकती है, साल्वे ने कहा कि आप शहर को बंदी बनाकर अपनी मांग नहीं मनवा सकते। याद आता है कि शहर को बंदी बनाने वाला ऐसा ही प्रहसन शाहीन बाग आंदोलन को लेकर भी रचा गया था। तब भी प्रदर्शनकारियों ने एक तरफ की सड़क खुली रखी थी, ताकि लोग आना-जाना कर सकें, लेकिन पुलिस ने उस रास्ते पर बैरिकेडिंग कर दी थी और सारी तोहमत शाहीन बाग के प्रदर्शकारियों पर लगी थी। तब दिल्ली के बहुसंख्यक समुदाय के सुविधा संपन्न बहुत से लोगों ने इस आंदोलन के खिलाफ कई बातें की थीं कि कैसे उन्हें स्कूल, कालेज, दफ्तर जाने में तकलीफ हो रही है, कैसे कुछ लोगों के कारण सारे शहर को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। नागरिकता संशोधन कानून से उन्हें कोई दिक्कत नहीं होनी थी, इसलिए उनके लिए ऐसा करना औऱ कहना आसान था।

लेकिन अब जो लोग दिल्ली के बंधक होने का रोना रो रहे हैं, उन्हें भी उसी अनाज से अपना पेट भरना होगा, जो किसान उगाते हैं। किसान तो संसद भवन तक आने के लिए निकले थे, लेकिन उन्हें दिल्ली के बाहर ही केंद्र सरकार ने रोक दिया। उनके रास्ते को बाधित करने के लिए हाईवे को जगह-जगह से खोदा गया, ताकि किसान आगे न बढ़ सकें। लिहाजा जहां तक किसान पहुंचे, वहीं रुक गए। वे शांतिपूर्ण तरीके से ही आंदोलन कर रहे हैं और जरूरतमंद लोगों को असुविधा न हो, इसका ख्याल भी रख रहे हैं। उन पर शहर को बंदी बनाने का दोष मढऩा नाइंसाफी है। हालांकि आज अदालत ने उनके विरोध के अधिकार की तो हिमायत की, साथ ही यह नसीहत भी दी कि हमें यह देखना होगा कि किसान अपना प्रदर्शन भी करें और लोगों के अधिकारों का उल्लंघन भी न हो। 

अदालत ने केंद्र से कहा कि वह इस पर विचार करे कि क्या किसान क़ानूनों को होल्ड (रोका) किया जा सकता है। इस पर केंद्र की ओर से कहा गया कि ऐसा नहीं किया जा सकता। सीजेआई एसए बोबडे ने कहा कि केंद्र इस पर विचार करे और इस बीच किसान संगठनों को नोटिस भेजा जाए। अब इस मामले पर अगले सप्ताह सुनवाई होगी, तब तक शायद किसानों के प्रतिनिधियों और सरकार के बीच बातचीत की कोई और पहल भी हो जाए। हालांकि इसका नतीजा कैसे निकलेगा, इस बारे में संदेह है, क्योंकि किसान नए कानून पूरी तरह रद्द कराना चाहते हैं और केंद्र सरकार ने अदालत में इससे इंकार कर दिया है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का हठीलापन उनके काम की खास शैली बन चुका है। जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब भी राजधर्म के मसले पर उन्होंने यही अडिय़ल रवैया दिखलाया था और बाद में प्रधानमंत्री बनने पर भी इसी शैली में काम किया। नोटबंदी के वक्त उन्होंने किसी से सलाह-मशविरा करना जरूरी नहीं समझा औऱ जिन लोगों ने इस फैसले का विरोध किया, उन्हें गुमराह करार दे दिया गया। लॉकडाउन भी इसी तरह थोपा गया था। इन दोनों फैसलों के कारण अर्थव्यवस्था बुरी तरह लडख़ड़ाई थी, जिसका इल्म मोदीजी को था, लेकिन उनके राजहठ के आगे किसी की नहीं चली। अब एक बार फिर राजधर्म पर राजहठ हावी हो रहा है। क्योंकि लाखों किसानों के विरोध के मुकाबले उन्हें अपने करोड़ों समर्थकों पर भरोसा है कि वे उनकी कही हरेक बात को आंख मूंद कर मान लेंगे और उनकी सत्ता पर कोई आंच नहीं आने देंगे। इसलिए वे किसानों की मांग के आगे झुकने तैयार नहीं हैं।

(देशबंधु)

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