Home मीडिया सुना है, हिटलर ‘ग़रीबों का मसीहा’ बना है…

सुना है, हिटलर ‘ग़रीबों का मसीहा’ बना है…

-हिमांशी॥

आज संजय कुमार ने एक बार फिर अपने मित्र गुरदीप सप्पल पर आरोपों के कटु बाण छोड़े हैं. उनके दावों में कितनी सच्चाई है इसका फ़ैसला तो अदालत में होगा लेकिन एक बात सर्वविदित है कि राज्यसभा टीवी के पूर्व सीईओ गुरदीप सप्पल, अपनी साफ़ छवि के लिए जाने जाते हैं। यह कोई पहला अवसर नहीं है कि उन पर कीचड़ उछालने की कोशिश की गई हो. पूर्व में भी ऐसी हर कोशिश नाक़ाम रहीं और विरोधियों को मुंह की खानी पड़ी.

हाँ, जानने वालों को ये देखकर अफ़सोस ज़रूऱ होता होगा कि अबकि विरोधियों कि अगुवाई ख़ुद सप्पल जी के मित्र संजय कर रहे हैं. क्या अब ‘मित्र’ के आगे भी पूर्व लगाना होगा ?

राज्य सभा टीवी में जब तक गुरदीप सप्पल सीईओ रहे, संजय कुमार ने बहुत चांदी काटी। राजा कि तरह दोपहर दो बजे के बाद ऑफिस आना, पधारते ही बाक़ी कर्मचारियों पर फ़ब्तियाँ कसना, उनके काम में कमी निकालना, मज़ाक बनाना आदि जैसे महत्वपूर्ण दायित्व इनके अंतर्गत आते थे. मैंने ख़ुद पत्रकारों को ऑफिस में रोते हुए देखा है। लोगों का मानसिक शोषण करने में इनका सानी कोई नहीं। हाँ, फेसबुक में आंदोलन करने का शौक भी इन्होंने राज्यसभा टीवी में अपने कार्यकाल के दौरान ही विकसित किया। 2017 में सीईओ का कार्य ख़त्म होते ही, संजय जी पर काल मडरा गया. सत्ता बदली तो इनके गद्देदार सुकोमल पिछवाडों पर ज़ोरदार लात पड़ी और ये सीधे सप्पल जी के घर के सोफ़े में दुबके हुए पाए गए. घर में बनी दालचीनी की चाय ने गले को आराम दिया तो मख़मली सोफ़े ने सूजे हुए पिछवाडों को.

तब मैं वहां मौज़ूद थी और बताया गया कि संजय कुमार चैनल के फॉउन्डिंग मेंबर के साथ ही हमारे हैड भी होंगे. चाय का स्वाद जाता रहा।

एक cub रिपोर्टर के तौर पर मैंने इन्हें ज्वाइन किया। कोशिश यही रहती कि इनसे शाबाशी ली जाए। लेकिन एक कुंठित व्यक्ति कभी दूसरे को प्रोत्साहित नहीं कर सकता। चाहे दूसरा इनसे उम्र और अनुभव में बहुत ही छोटा क्यों ना हो। 19 जून 2018. दिल्ली में भीषण गर्मी का एक दिन. रिपोर्टिंग करके लगभग बारह घंटे बाद वापस आई तो इन्होंने एक मामूली मेल को लेकर मुझे बहुत ज़लील किया। लड़कियों को बेइज़्ज़त करने का सबसे आसान तरीक़ा है कि उन्हें किसी पुरुष के साथ जोड़ दिया जाए… तो इन्होंने वो भी किया। मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे…. और इनकी आवाज़ तेज़ और कर्कश होती जा रही थी. उस पल तो मैं वहां से चली गई… लेकिन अपनी डेस्क पर बैठते ही मुझे एहसास हुआ कि मैं सुबह की भूखी-प्यासी, तेज़ लू में, बिना किसी साधन के, अपना काम पूरा करके वापस आई और मिला क्या? – अपमान। बदतमीज़ी। बदसलूकी।

संजय कुमार जी से मैं ममता की अपेक्षा नहीं रखती थी, लेकिन इंसानियत तो होनी चाहिए न। है कि नहीं?

मैंने तुरंत अपने आँसू पोंछे, इनके समक्ष गई और verbal resignation दिया कि कल से नहीं आऊँगी। कुछ लोग बाहर तक समझाने भी आए कि 19 दिन बीत गए हैं, 11 दिन और चुपचाप काम कर लो…. महीने की तनख़्वाह लेकर चली जाना। लेकिन पिंजरे से उड़ी चिड़िया को सोने की चमक कब रोक पाई है?


सप्पल सर ने मुझसे संजय कुमार के लिए कहा कि इनकी वाणी कड़वी है लेकिन दिल के बुरे नहीं हैं. माफ़ कीजिएगा सर, यहाँ आप ग़लत थे। समय के चक्र ने आज इस पर मोहर लगा ली कि संजय कुमार हमेशा से ही अति कुंठित और बदतमीज़ हैं। वो तो आपकी छत्रछाया थी कि पत्रकारिता में इतने साल बड़े पद पर विराजमान रहे, वरना अँगूर कबका किशमिश हो जाता !

  • आज इन्हें सफ़ेद में काला दिख रहा है। जब चैनल के 25,000 सब्सक्राइबर होने पर सतरंगी पिज़्ज़ा चर रहे थे, तब color blindness से ग्रस्त थे क्या?
  • चैनल के first five foundation मेंबर्स में आप थे. सभी उच्चस्तरीय बैठकों में आप थे. तब ब्लैक और वाइट क्यों नहीं दिखा?
  • जब कर्मचारियों के कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर करके गवाही दे रहे थे …. तब भी काला धन नहीं दिखा?
  • जब तीस महीनों तक लाखों रूपये हर महीने लेते रहे, तब ब्लैक एंड वाइट नज़र नहीं आया?

आज जब यही संजय कुमार जी ‘असहायों का मसीहा’ बनकर, कुछ निकम्मों की फौज़ की अगुवाई कर रहे हैं तो हैरानी से ज़्यादा हँसी आती है।

संजय जी आप विशेषकर बचकर रहिएगा, हमारे पहाड़ में कहते हैं कि निर्दोषों के आंसुओं की सज़ा भगवान देता है।

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