लोकतांत्रिक जवाबदेही से डरती सरकार

लोकतांत्रिक जवाबदेही से डरती सरकार

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कुछ दिन पहले नए संसद भवन के लिए भूमिपूजन करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोकतंत्र को लेकर कई लुभावनी बातें की थीं। उनके भाषण में राष्ट्रवाद की भावनाएं उमड़-उमड़ कर प्रकट हो रही थीं। जो लोग लोकतंत्र और संविधान को अपनी सुविधा से व्याख्यायित करते हैं, जो असुविधाजनक सवालों के सामने आने पर भारत के गौरवशाली अतीत को अपनी ढाल बना लेते हैं, जो मनुस्मृति को संविधान से ऊपर मानते हैं, उनकी राष्ट्रभक्ति मोदीजी के भाषण को सुनकर दोगुनी-चौगुनी हो गई होगी। मोदीजी ने बाबा साहेब के बताए संविधान को बिना कुछ कहे बड़ी चालाकी से दरकिनार कर दिया औऱ यह समझाया कि लोकतंत्र तो भारत में सदियों से था।

उन्होंने इसके लिए प्राचीन भारत से कुछ उदाहरण गिनाए। कुछ गणराज्यों के साथ समिति, गणपति जैसे शब्दों की याद दिलाई कि ये सब भारत में पहले से प्रचलित रहे। साथ ही बताया कि ऋग्वेद का प्राचीन पाठ लोकतंत्र को ‘सामूहिक चेतना’ के रूप में भी संदर्भित करता है। वसुधैव कुटुम्बकम के आलाप के बाद अब भारत को लोकतंत्र की जननी बताने का सिलसिला भाजपा की ओर से शुरु किया जा रहा है, जिसके जरिए भावनात्मक जाल में जनता को बड़ी चालाकी से उलझाया जाता है। पूरी दुनिया को परिवार मानने का दावा एक ओऱ किया जाता है, दूसरी ओर संविधान में वर्णित समानता के विचार को धता बताकर अल्पसंख्यकों को बार-बार पराएपन का बोध करवाया जाता है। यही रवैया लोकतंत्र के प्रति भी है। अगर लोकतंत्र में सच्ची आस्था है, तो फिर संविधान के प्रति वही आस्था क्यों नहीं दिखाई जाती।

क्यों सरकार अपनी संवैधानिक औऱ लोकतांत्रिक जिम्मेदारियों से मुंह चुराने लगती है। प्राचीन भारत में जो कुछेक गणतंत्र थे, उनमें सभी लोगों का प्रतिनिधित्व न होकर, कुछ लोगों के पास ही यह विशेषाधिकार था। और आज मोदी सरकार इसी तरह का गणतंत्र कायम करती दिख रही है। यही वजह है कि संसद सत्र औपचारिकता बन कर रह गए हैं। जब सत्र संचालित होते हैं, तब भी उनमें जनहित औऱ देशहित से जुड़े मुद्दों पर सार्थक चर्चा नहीं होती। सदन के भीतर कई अपमानजनक और असंसदीय भाषा का इस्तेमाल लगातार होने लगा है। कई जरूरी विधेयक बिना किसी चर्चा के पारित हो गए। कई बार विपक्ष के भरसक विरोध के बावजूद भाजपा अपने बहुमत के कारण मनमानी करने में सफल रही। 

विपक्षी दलों को दुश्मन की तरह देखने की परंपरा लोकतंत्र में नहीं रही है, लेकिन अब ऐसा ही हो रहा है। सारे अपमानों औऱ विरोधों के बावजूद विपक्ष किसी न किसी तरह अपनी आवाज उठा ही रहा था, लेकिन विपक्ष मुक्त भारत चाहने वाली सरकार अब विपक्ष को यह मंच ही उपलब्ध नहीं करा रही है। कोरोना के कारण पहले बजट सत्र जल्दबाजी में खत्म कर दिया गया। तब महामारी का नया-नया डर था और लॉकडाउन के बाद हालात संभल जाएंगे, ऐसी उम्मीद थी। इसलिए बजट सत्र के बाद मानसून सत्र पर लोगों की निगाहें टिकी थीं। लेकिन मानसून सत्र काफी ना-नुकुर के बाद लगाया गया। उसमें भी प्रश्नकाल जैसी व्यवस्था पर अंकुश लगा और फिर सत्र तय समय से पहले ही खत्म कर दिया गया। अब शीतकालीन सत्र को लेकर भी सरकार ने महामारी का बहाना बना लिया है।

विपक्षी दल सवाल कर रहे थे कि शीतकालीन सत्र कब से लगेगा, लेकिन सरकार ने कह दिया कि महामारी को देखते हुए सत्र नहीं लगेगा औऱ बजट सत्र जनवरी में लगाया जाएगा। क्या सरकार यह मानकर चल रही है कि देश जनवरी तक कोरोना से सुरक्षित हो जाएगा, या उसकी वैक्सीन सभी सांसदों और संसदकर्मियों को लग जाएगी, ताकि संसद में कोरोना का कोई डर ही नहीं होगा। या जनवरी में बजट सत्र इसलिए लगाया जा रहा है क्योंकि केन्द्रीय बजट 31 मार्च से पहले पारित किया जाना है।

अगर तब सारे एहतियात के साथ बजट सत्र लग सकता है तो अभी शीतकालीन सत्र के लिए ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं की जा सकती थी। अभी संसद सत्र से पीछे हटने का एक बड़ा कारण यही नजर आ रहा है कि सरकार कृषि कानूनों पर विपक्ष को किसी तरह का जवाब नहीं देना चाहती। इस वक्त राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर हजारों अन्नदाता दिन-रात डटे हुए हैं औऱ उनके समर्थन का दायरा बढ़ता जा रहा है। किसानों ने विपक्ष को किसी तरह का मंच मुहैया नहीं कराया है, लेकिन लगभग सारे विपक्षी दल इस वक्त किसानों के साथ हैं औऱ सरकार पर पीछे हटने का दबाव बना रहे हैं। सरकार को विपक्ष के विरोध के साथ-साथ किसानों के आंदोलन पर भी आपत्ति है।

किसानों को भटका हुआ बताने के साथ ही खालिस्तानी, देशविरोधी कहा गया, अब उन्हें टुकड़े-टुकड़े गैंग वाला कहा जा रहा है। इस तरह की भाषा से समझ जाना चाहिए कि सरकार किस तरह का लोकतंत्र देश में चाहती है। शीतकालीन सत्र लगता तो विपक्ष का विरोध आधिकारिक तौर पर दर्ज हो जाता और भारत के संसदीय इतिहास में यह भी लिखा जाता कि कैसे पूर्ण बहुमत से सत्ता पर बैठी भाजपा ने किसानों से जुड़े सवालों पर मौन धारण कर लिया। इसलिए भाजपा ने शीतकालीन सत्र आय़ोजित न करने का सुविधापूर्ण रास्ता निकाल लिया। रहा सवाल महामारी का, तो देश में पंचायत से लेकर विधानसभा चुनावों तक सब हो रहा है।

रैलियां निकल रही हैं, सभाएं हो रही हैं। धार्मिक, पारिवारिक, सांस्कृतिक आयोजन हो रहे हैं। विद्यार्थियों को परीक्षा केंद्रों में आकर परीक्षा देने का फरमान जारी किया जा रहा है। लेकिन संसद सत्र आयोजित करने में सरकार को बीमारी का डर दिख रहा है। दरअसल यह डर लोकतंत्र की जवाबदेही का है, जिससे सरकार बच रही है। इस डर का इलाज देरअबेर जनता को ही ढूंढना पड़ेगा।

(देशबंधु)

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