मैं करूँ तो क्या करूँ.?

मैं करूँ तो क्या करूँ.?

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-सुनील कुमार॥
बहुत पहले युवा पीढ़ी के लिए एक पाक्षिक या मासिक पत्रिका आती थी जिसमें नौजवानों के शारीरिक, मानसिक, और भावनात्मक पहलुओं पर उनके पूछे सवाल रहते थे, और उनके लिए सलाह के रूप में जवाब रहते थे। आमतौर पर पश्चिम में अंग्रेजी भाषा में ऐसे कॉलम कोई महिला लिखती है, और उन्हें एगनी आंट कहा जाता है, उलझन सुलझाने वाली आंटी। उस पत्रिका में इस कॉलम का नाम, मैं क्या करूं, था, और उसे लोग दिलचस्पी के साथ पढ़ते थे फिर चाहे वे सवाल गढ़े हुए क्यों न हों, फर्जी नामों से छपे हुए क्यों न हों। कुछ ऐसे ही कॉलम अलग-अलग जगहों पर मनोवैज्ञानिक परामर्शदाताओं के लिए हुए भी छपते हैं जिनके बारे में कुछ परामर्शदाताओं का यह मानना है कि उनसे पढऩे वालों का नफा कम, नुकसान अधिक होता है क्योंकि वे कई समस्याओं के शिकार न रहते हुए भी उन्हें पढक़र अपने आपको उनसे जोड़ लेते हैं, और एक नामौजूद उलझन में सचमुच ही उलझ जाते हैं।

लेकिन असल जिंदगी में रोजाना ही कोई न कोई ऐसी नौबत आती है, जब लगता है कि कोई बताने वाले रहें कि ‘मैं क्या करूं’? अब जैसे इन दिनों रिहायशी इलाकों में घूम-घूमकर फल-सब्जी, और दूसरे सामान बेचने वाले लोग एकदम से कई दर्जन गुना हो गए हैं। जिनका कोई दूसरा काम छूट गया, वे हजार-दो हजार रूपए की सब्जियां लेकर घूमते हैं, और कुछ न कुछ धंधा शायद हो जाता है। ऐसे लोग जब तक जोरों से आवाज नहीं लगाते तब तक उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता, और ग्राहकी नहीं होती। अब इनसे यह उम्मीद रखना कि वे जोरों की आवाज लगाते हुए भी मास्क लगाए रखेंगे कुछ ज्यादती इसलिए होगी कि उससे तो आवाज दब ही जाएगी। तो ऐसे लोगों को मास्क का ज्ञान देना ठीक होगा या नहीं?
शहरी चौराहों पर बहुत से परिवारों के अलग-अलग कई उम्र के लोग सामान बेचते दिखते हैं। कुछ महिलाएं कुछ महीनों के बच्चों को गोद में टांगे भी रहती हैं। और चौराहों की लालबत्ती पर गाडिय़ों के धुएं का प्रदूषण बहुत अधिक रहता है। अब इन लोगों को ऐसे जहरीले धुएं के बीच अपनी रोजी-रोटी कमाने से रोका जाए, या इनसे कुछ खरीदा जाए, या आगे बढ़ लिया जाए? जब यह नजारा सामने पड़ता है तब मन में सवाल उठता है कि मैं क्या करूं? इन्हीं चौराहों पर कई अपाहिज, कई बूढ़े या बच्चे, जमीन पर घिसटकर चलते कई लोग थमी हुई गाडिय़ों के लोगों से भीख भी मांगते हैं। अब इन्हें भीख देने का मतलब इन जगहों पर उन्हें बढ़ावा देना होगा, या उनकी मदद करना होगा? अक्सर लगता है कि कोई तर्कसंगत या न्यायसंगत सलाह मिल जाए, लेकिन जरूरत के वक्त सलाह मिलती कहां है, यह एक अलग बात है कि बिना जरूरत सलाह देने वाले बेमौसम की बारिश की तरह सलाह बरसाते रहते हैं।


अभी एक सुबह घूमते हुए 8-10 बरस का एक छोटा सा बच्चा छत्तीसगढ़ की इस राजधानी की एक संपन्न बस्ती में बड़ा सा झाड़ू थामे सडक़ साफ कर रहा था। रूककर उससे पूछा गया कि वह किसके लिए काम कर रहा है? आसपास के किसी घरवालों के लिए, म्युनिसिपल के लिए, या किसी और के लिए? उसका कहना था कि मां की तबियत खराब है, इसलिए उसकी जगह वह ड्यूटी करने आ गया है ताकि हाजिरी न कटे। अब यह देखकर यह समझ नहीं पड़ा कि इस बारे में म्युनिसिपल के अफसरों से बात करें, वार्ड के पार्षद से बात करें, या किसी सफाई ठेकेदार से बात करें? या कुछ भी न करें क्योंकि लॉकडाऊन के कारण इस उम्र की बच्चों की स्कूलें बंद चल रही हैं, और बीमार मां की मदद के लिए अगर उसकी जगह यह बच्चा काम कर रहा है, तो उसे रोका तो जा सकता है, लेकिन हो सकता है कि उसकी मां की मजदूरी कट जाए, या उसे काम से हटा दिया जाए। बाल मजदूरी खराब है, लेकिन अगर घर चलाने के लिए वही एक रास्ता बचा है, तो उस रास्ते पर जाने से किसी बच्चे को रोका जाए, या न रोका जाए?


स्कूलें बंद रहने से बच्चे टोलियां बनाकर घूम रहे हैं, और कॉलोनियों की नालियों में झांकते दिखते हैं जहां कीचड़ में जरा भी हलचल हो, तो वे नीचे तक पैर-हाथ डालकर मछलियां टटोलने लगते हैं। अब कोरोना जैसी महामारी के बीच गंदगी भरी नालियों में उतरे हुए इन बच्चों को भगाया जाए, रोका जाए, या उनके लिए कुछ और किया जाए? यह सवाल दिल को कोंचता है, और दिमाग को भी, और इन दोनों से जवाब अलग-अलग निकलते हैं।


शहरी फुटपाथों पर और रेलवे प्लेटफॉर्म पर जीने वाले अनगिनत भिखारी और बेघर बच्चे ऐसे रहते हैं जो इन जगहों पर तो खाने को कुछ पा जाते हैं, लेकिन दूसरी जगहों पर शायद उन्हें पेट भर भीख भी नसीब न हो। अब सार्वजनिक जगहों को साफ रखने के लिए भिखारियों और बेघर लोगों को वहां से भगा दिया जाए, या सार्वजनिक जगहों पर जिंदगी जीने का उनका हक एक बुनियादी हक माना जाए? यह सवाल आसान नहीं रहता, और अलग-अलग वक्त पर एक ही सोचने वाले को अलग-अलग जवाब सूझते हैं। अमरीका के कई शहरों में सार्वजनिक उद्यानों जैसी जगहों पर बेघर कब्जा करके वहां रहने लगते हैं। जिन प्रदेशों में लोगों की सोच अधिक पूंजीवादी रहती है, वहां की स्थानीय सरकार और पुलिस उन्हें भगाती हैं, और कुछ प्रदेशों में जहां की राजनीतिक चेतना अधिक उदारवादी रहती है वहां पर किसी भी सार्वजनिक जगह पर जिंदा रहने के हक को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, और उन्हें वहां रहने देने के लिए भी आंदोलन होते हैं।


ऐसे सवाल बहुत सी जगहों पर उठ खड़े होते हैं कि किसी नौबत में क्या किया जाए। किसी उद्यान या सार्वजनिक जगह पर अश्लील गालियां बकते लडक़ों की टोलियों को रोककर, टोककर यह खतरा उठाया जाए कि बाद में आते-जाते वे गाडिय़ों के चक्कों की हवा निकाल जाएं, या फिर उन गालियों को अनदेखा करके चुपचाप आगे बढ़ लिया जाए? यही हाल सार्वजनिक जगहों पर बैठकर सिगरेट या गांजा पीते लोगों को देखकर होता है, या दारू पीते लोगों को देखकर होता है कि उसे अनदेखा किया जाए, या खतरा मोल लेकर उन्हें रोका-टोका जाए?
असल जिंदगी में कोई परामर्शदाता नहीं मिलते जो बताएं कि ऐसी नौबतों में कब क्या करना चाहिए। यह जरूर हो सकता है कि लोग अपने आसपास के दो-चार लोगों से चर्चा करें कि ऐसी नौबत में उन्हें क्या करना चाहिए था, या क्या करना चाहिए। कितना अच्छा होता कि असल जिंदगी में भी उलझन सुलझाने वाली ऐसी कोई आंटी मौजूद होती, और वह बेहतर राह सुझाती रहती।

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