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किसानों पर अंगुलियाँ उठाने से बाज़ आएं.!

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देश की राजधानी दिल्ली इस वक्त एक टापू जैसी बन गई है, जिसके चारों ओर आंदोलित किसानों का सैलाब उमड़ा हुआ है। कोरोना के संकट के बीच बड़ी मुश्किल से आयोजित संसद सत्र में मोदी सरकार ने अपने बहुमत की ऐंठ दिखाकर तीन नए कृषि कानूनों को पारित करवा लिया, जिससे देश के किसान खुद को बेहद असुरक्षित और असहाय महसूस कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि मंडी की व्यवस्था और न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी दोनों कायम रहे, लेकिन सरकार इस पर केवल मुंहजबानी भरोसा दिला रही है कि हमने जो भी कानून बनाए हैं, वो किसानों की कमाई बढ़ाएंगे।

हालांकि किसान भी जानते हैं कि इससे उनकी रही-सही आमदनी भी खतरे में पड़ जाएगी और मुनाफा केवल उद्योगपतियों का होगा। नए कृषि कानूनों के खिलाफ एक ओर किसानों का प्रदर्शन जारी है, दूसरी ओर किसान संगठन और केंद्र के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन वार्ताओं का ये दौर उसी तरह नाकाम साबित हो रहा है, जैसे चीन के साथ सीमा पर चल रहे गतिरोध के बीच नाकाम वार्ताएं हुई थीं।

गृहमंत्री अमित शाह ने भी तेरह किसान नेताओं के साथ हुई बैठक कर ली, लेकिन इसका कोई हल नहीं निकल रहा, क्योंकि सरकार उद्योगपतियों को मुनाफा के अवसर देने के लिए प्रतिबद्ध है और किसानों के हक में वो जरा भी नहीं सोच रही है। इसका ताजा उदाहरण है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का फिक्की की 93वीं सालाना बैठक में दिया गया वक्तव्य। जिसमें उन्होंने उद्योगपतियों को कृषि क्षेत्र में निवेश करने की अपील करते हुए कहा कि कृषि में निजी क्षेत्र की ओर से जितना निवेश होना चाहिए था वह नहीं हुआ है और कृषि क्षेत्र में किए गए सुधारों से इस क्षेत्र में खड़ी दीवारों को हटाने का काम किया गया है। वैसे सरकार जिसे दीवार हटाने का काम कह रही है, दरअसल वह संविधान की भावना के विरुद्ध है। सरकार ने राज्यों से बिना सलाह-मशविरे के नए कृषि कानून बना दिए। और ये कानून राज्यों के सार्वजनिक खरीद के लिए मंडी की व्यवस्था यानी एपीएमसी कानून के खिलाफ हैं। संविधान के मुताबिक राज्य सूची में सूचीबद्ध विषयों पर राज्य के कानून केंद्रीय कानूनों के ऊपर काम करते हैं।

कृषि उपज बाजार समिति (एपीएमसी) कानून मुख्य रूप से किसानों को समर्थन देने और उनकी रक्षा करने के लिए बनाए गए थे, लेकिन नए कानून इस सुरक्षा को तोड़ने का काम कर रहे हैं। संविधान का अनुच्छेद 38 (2) कहता है कि हुकूमत को आय में असमानताओं को कम करने का प्रयास करना होगा, और स्थिति, सुविधाओं और अवसरों में असमानताओं को समाप्त करने का प्रयास करना होगा। लेकिन नए कानून खेती को निजी घरानों के पास गिरवी रखकर देश को एक बड़े बाजार में तब्दील कर देंगे। किसान इस बात को अच्छे से समझ रहे हैं, इसलिए वे अपनी और भावी पीढ़ियों की सुरक्षा के लिए अभी सारी तकलीफें उठा रहे हैं। रविवार को किसान-संगठनों ने दिल्ली-जयपुर हाइवे जाम करने का ऐलान किया।

किसान नेताओं ने 14 दिसंबर को भूख हड़ताल की घोषणा भी की है। इन बीते 18 दिनों में कम से कम 11 किसानों की मौत इस आंदोलन के दौरान हो गई, लेकिन सरकार अब भी केवल समय बिता रही है। शायद सरकार सोचती है कि ठंड बढ़ती जाएगी, और खुले में रहना मुश्किल होगा तो किसान अपने आप आंदोलन से छिटकते जाएंगे। लेकिन जैसा हौसला पिछले साल शाहीन बाग में देखने मिला था, वही अब भी देखने मिल रहा है। लोगों का हुजूम किसानों का साथ देने के लिए पहुंच रहा है।

आंदोलनकारियों की मदद के लिए कहीं लंगर चल रहे हैं, कहीं स्वास्थ्य शिविर। सरकार के भक्तों को इसमें भी तकलीफ हो रही है कि किसानों के पैर क्यों दबाए जा रहे हैं या उनके खाने के लिए रोटी के साथ-साथ पिज्जा की व्यवस्था भी क्यों है। 

ये निम्नस्तरीय सोच बतलाती है कि हम वर्गभेद वाले समाज में कितना यकीन करते हैं। गरीब किसान पिज्जा खाए तो वो गलत और अमीर नेता सरेआम पार्टी करें तो उस पर वाहवाही। और अब तो किसानों को देशविरोधी ठहराने की साजिश भी शुरु हो चुकी है। ठीक वैसे ही जैसे शाहीन बाग के आंदोलनकारियों को देशद्रोही ठहराया गया था। घर-गृहस्थी संभाल रही महिलाएं जब दिन-रात सड़क पर बैठने लगीं तो उनके चरित्र पर टिप्पणियां की जाने लगीं। उन पर पैसों के लिए आंदोलन करने का इल्जाम लगाया गया। मुख्यधारा के मीडिया का एक बड़ा वर्ग भी इसमें शामिल रहा। लेकिन कुछ स्वघोषित महान एंकरों को अपने आंदोलन की जगह आने न देकर उन महिलाओं ने ऐसी टिप्पणियों का माकूल जवाब दिया था। अब भी कुछ वैसा ही जवाब किसान आंदोलनकारियों की ओर से दिए जाने की जरूरत महसूस हो रही है।

सरकार समर्थक कई लोग, भाजपा सांसद और मंत्री सरेआम किसानों को नक्सलवादी, देशविरोधी, उग्रवादी बताने से बाज नहीं आ रहे। केन्द्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल ने साफ तौर पर कहा कि इस आंदोलन में वामपंथी अपना एजेंडा चला रहे हैं। इस तरह के बयानों से जाहिर होता है कि सरकार को किसानों की नहीं विरोधी दलों के एजेंडे की चिंता है। इससे पहले भी किसानों को खालिस्तानी कहा गया था। उन पर आरोप लगाया गया कि वे विरोधी दलों के बहकावे में आ गए हैं। यानी सरकार सीधे-सीधे किसानों की समझ पर उंगली उठा रही है।

सरकार इस बात को मानना नहीं चाहती कि किसान भले ही किसी भी दल को वोट दें, लेकिन वे सारे देश के हैं और दलगत राजनीति के ऊपर उठकर उनके उगाए अनाज से देश का पेट भरता है। उद्योगपतियों के चंदे के लालच में भाजपा को किसानों का दर्द नहीं दिख रहा और वो उन्हें भी अपनी राजनीति का मोहरा बना रही है। किसानों पर उंगलियों का उठना शर्मनाक है। ऐसा करके केवल किसानों का नहीं, देश के लोकतंत्र का अपमान किया जा रहा है।

(देशबंधु)

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