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वैक्सीन पर कुछ भी तय नहीं और लोग बेपरवाह…

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-सुनील कुमार॥
कोरोना वैक्सीन अभी प्रयोगशाला से निकलकर कुछ देशों में कुछ लोगों को लगने जा रही है, और दुनिया भर के लोग बेफिक्र हो गए हैं कि कोरोना का खतरा टल गया है। हिन्दुस्तानी लोग चूंकि कई करोड़ देवी-देवताओं और ईश्वरों पर प्रयोगशालाओं से अधिक भरोसा रखते हैं इसलिए वे कुछ अधिक बेफिक्र हो गए हैं। दूसरी तरफ कोरोना के मोर्चे पर अधिकतर काम राज्य सरकारों को करना पड़ा है लेकिन कोरोना से लेकर लॉकडाऊन तक तकरीबन हर प्रतिबंध केन्द्र सरकार के काबू का रहा है। आज भी कोरोना की वैक्सीन किस तरह आएगी, किनको मुफ्त मिलेगी, किनको भुगतान करना होगा, केन्द्र या राज्य उसमें हिस्सा कैसे बटाएंगे, प्राथमिकता किन्हें दी जाएगी, इसकी कालाबाजारी न हो उसे कैसे रोका जाएगा जैसे दर्जनों सवाल खड़े हुए हैं, और केन्द्र सरकार की राज्यों के साथ कोई अधिक मिलीजुली तैयारी दिख नहीं रही है। फिर यह भी है कि क्या राज्य सीधे ही यह वैक्सीन देश के किसी निर्माता से या किसी विदेशी निर्माता से खरीद सकेंगे, और अपने राज्य में उसका मनचाहा इस्तेमाल कर सकेंगे, या वे केन्द्र के नियमों से बंधे रहेंगे यह भी साफ नहीं है। जिस तरह बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बिहार के हर नागरिक को मुफ्त में कोरोना वैक्सीन लगाने की औपचारिक चुनावी घोषणा की थी, वह घोषणा भी सही थी या झूठी थी, यह भी अब तक साफ नहीं है क्योंकि केन्द्र सरकार अब यह कह रही है कि हर नागरिक को वैक्सीन लगेगी भी नहीं। ऐसे में बिहार का यह वायदा क्या कहा जाए?

आज सुबह की खबर है कि केन्द्र सरकार ने राज्यों से कहा है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव की वोटर लिस्ट के आधार पर 50 बरस से अधिक उम्र वालों की शिनाख्त की जाएगी, और प्राथमिकता के आधार पर पहले से रजिस्टर होने वाले लोगों को टीका लगाया जाएगा। केन्द्र सरकार से बागी तेवर रखने वाली बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने इस फैसले को गलत ठहराया है और कहा है कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट में नहीं हैं उनका क्या होगा? पार्टी ने मांग की है कि बिना भेदभाव के सभी नागरिकों को वैक्सीन लगाई जाए। अलग-अलग पार्टियों या अलग-अलग राज्यों की सोच अलग-अलग है। लेकिन केन्द्र सरकार ने बीते कई महीनों में अब तक कोई साफ नक्शा सामने नहीं रखा है कि टीके की लागत कौन उठाएंगे? किस आय वर्ग से ऊपर के लोगों को अपने खर्च पर टीका लगवाना होगा? खर्च में केन्द्र और राज्य का क्या हिस्सा रहेगा? बहुत सारी बातें अभी साफ नहीं हैं जबकि बीते कई महीने इस देश को तैयारी के लिए मिल चुके हैं।

यह बात सही है कि सिर्फ मतदाता सूची को, या सिर्फ नागरिकता के दस्तावेजों को, या आधार कार्ड को बुनियाद बनाकर टीके पाने वाले लोगों की सीमा तय करना गलत होगा। अब तक केन्द्र सरकार को राज्यों से विचार-विमर्श करके यह तय कर लेना था, या राज्यों को तय करने देना था कि वे टीकाकरण कैसे करेंगे। भारत सरकार हर मामले में सबसे अच्छी योजना बनाने वाली हो यह भी जरूरी नहीं है, और दूसरी तरफ राज्यों के चिकित्सा ढांचे एक सरीखे हों यह भी जरूरी नहीं है। इसलिए राज्यों की प्रतिभाओं का भी इस्तेमाल ऐसे टीकाकरण कार्यक्रम की बारीकियों को तय करने में होना चाहिए। यह बात जाहिर है, और केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने एक से अधिक बार कही है कि अगले बरस जून-जुलाई तक 20-25 करोड़ वैक्सीन लोगों को लगाने का अनुमान है। अब जैसा कि हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज के साथ हुआ, पहला टीका लगने के एक पखवाड़े बाद वे कोरोना पॉजिटिव हो गए, बाद में डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें दूसरा टीका भी लगना था, जिसकी तारीख नहीं आई थी, इसलिए वे पहले टीके से पूरी तरह सुरक्षित नहीं थे। अब देश में जिन लोगों ने खुद होकर टेस्ट-वैक्सीन लगवाई है, वे बताते हैं कि किस तरह कई तरह की जांच के बाद वैक्सीन लगाई गई, उसके बाद फिर हफ्ते-हफ्ते जांच हुई, और फिर दूसरा डोज लगाया गया। अब सवाल यह है कि टीका लगवाने में फिर गरीब-मजदूरों की कम से कम दो दिनों की मजदूरी जाएगी, और बहुत से लोगों के लिए तो दी गई तारीख पर दूसरे डोज के लिए पहुंचना मुश्किल भी होगा। अब जबकि ऐसे दावे किए जा रहे हैं कि टीका कुछ ही महीने दूर है, तब ऐसी बारीक योजना का खुलासा हो जाना चाहिए था ताकि राज्य सरकारें, स्थानीय संस्थाएं, और सामाजिक संगठन इस बड़ी चुनौती के लिए तैयार हो सकते। लेकिन अब तक जमीन पर ऐसी कोई चर्चा भी सुनाई नहीं दे रही है।

और हिन्दुस्तानी लोग हैं कि वे इस लापरवाही के साथ जी रहे हैं कि मानो लैब में वैक्सीन बन गई है तो वे महफूज हो गए हैं। जबकि हकीकत यह है कि वैक्सीन हर व्यक्ति तक पहुंचने में साल-दो साल भी लग सकते हैं, और इस बीच कोरोना की दूसरी लहर भी आ सकती है क्योंकि लोग लापरवाह हो चुके हैं, सरकारी प्रतिबंध तकरीबन खत्म हो चुके हैं, और बीमारी का खतरा बना हुआ है। हिन्दुस्तान में जिस गैरजिम्मेदारी के साथ शादी-ब्याह, दूसरे जलसे, और मृत्यु कर्म किए जा रहे हैं, वे बताते हैं कि सावधानी से थके हुए इस देश ने अब गैरजिम्मेदारी को ही जीने का ढर्रा बना लिया है। दिक्कत यह है कि देश और प्रदेशों के प्रमुख नेता, सार्वजनिक जीवन के चर्चित और प्रमुख लोग कोई अच्छी मिसाल पेश नहीं कर रहे हैं। वे खुद कैमरों के मोह में बिना मास्क चलते हैं, चुनावों में धक्का-मुक्की को बढ़ावा देते हैं, और कोरोना के खतरे को बढ़ाते चल रहे हैं। आम जनता से लेकर खास लोगों तक का, फिक्र की कोई बात नहीं है, अब खतरा नहीं रह गया है जैसी बातें खतरे को बढ़ाते चल रही हैं। यह खतरा अस्पताल तक पहुंचने की नौबत या जान जाने की नौबत तक सीमित नहीं है, यह खतरा कोरोना के बने रहने तक चौपट हो रही अर्थव्यवस्था पर मंडराता खतरा भी है जो कि टला नहीं है, और न ही टीकाकरण से वह एकदम से टल जाएगा। लोगों को सावधानी जारी रखना जरूरी है, और सावधानी की चर्चा महज अमिताभ बच्चन की टेलीफोन पर घोषणा तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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