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क्या कृषि अध्यादेश 2020 – नोटबंदी और जीएसटी जैसे उपायों से अलग है?

Sanjaya Kumar Singh
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अगर सरकार पर भरोसा ही करना हो तो पुराने अनुभवों की सहायता क्यों न लें?

-संजय कुमार सिंह॥
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हर ‘बड़े’ काम का विरोध होता है (कश्मीर से धारा 370 खत्म करना अपवाद माना जा सकता है), प्रधानमंत्री उससे निपट नहीं पाते हैं, गोदी मीडिया के बावजूद उसकी खबर फैल जाती है और फायदे बताने से ज्यादा नुकसान बताए जाते हैं। यह अलग बात है कि जनता उनपर यकीन नहीं करती और मोदी विरोधी हार नहीं मानते। इस पूरे माहौल में तथ्य यह है कि वे अपने निर्णयों को अपनी वीरता के रूप में पेश करते हैं और विरोधियों को देश विरोधी से लेकर दूसरों का बहकाया हुआ तक – कुछ भी कह देते हैं या उनके समर्थक कहते हैं।


यह सब बहुत जाना-पहचाना और घिसा पिटा तरीका हो चला है पर 56 ईंची व्यक्तित्व बनाने और प्रचार में लगे लोगों को यह सब नहीं दिखता है कि उनके विरोधी कितनी जल्दी (या आसानी से) उन्हें बचाव की मुद्रा में ला देते हैं। इसमें झूठे बोलने से लेकर, मुद्दे को घुमा देने जैसी चालें चली जाती हैं और काबिल प्रचारक मानते हैं कि कोई समझ नहीं रहा है। इस प्रचार में विपक्षी दल को, ‘खत्म’ या ‘बेकार’ बताना शामिल है। यह जाने बगैर कि खुद इससे बुरी हालत में रहकर यहां तक पहुंचे हैं और इसपर बने रहने के लिए जो कर रहे हैं वह देश हित में तो नहीं ही है फिर भी किए जा रहे हैं। प्रचार अपनी जगह। आइए, सरकार के पूर्व निर्णयों के आलोक में देखें कि कृषि अध्यादेश 2020 के विरोध का बचाव कितना लचर और जाना-पहचाना है।


नोटबंदी
मोदी सरकार ने अपनी लोकप्रियता का फायदा उठाते हुए नोटबंदी की। इसका फैसला कब कैसे किसने लिया से लेकर उसके बाद की स्थितियों और उससे निपटने की सरकारी तैयारियों के बारे में भले उदारता से नहीं लिखा गया पर जानने समझने वालों को पता है कि आत्मप्रचार के उस निर्णय से देश का कोई भला नहीं हुआ। कई लोग मर गए सो अलग। देश की आर्थिक स्थिति खराब होते हुए नकारात्मक जीडीपी तक पहुंचा देना मामूली नालायकी नहीं है। पर कोरोना का बहाना है और समर्थक अपनी सरकार के प्रदर्शन से खुश हैं। नोटबंदी का विरोध तो खैर क्या हुआ पर जो हालात हैं उसमें भी विरोधी भ्रमित किए हुए बताए जा सकते हैं तो कुछ भी हो सकता है। वैसे ही जैसे तबलीगी जमात वाले कोरोना फैला रहे थे। सुप्रीम कोर्ट से भी कोई राहत नहीं मिली।


जीएसटी
जो राजनीतिक दल जीएसटी और एफडीआई का विरोध कर रहा था उसने सत्ता में आते ही यू-टर्न लिया और बगैर किसी तैयारी के देश पर जीएसटी व्यवस्था थोप दी। इसी का असर हुआ कि जो देश कांग्रेस मुक्त हो रहा था उसके तीन राज्यों – राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बन गई। बाद में विधायक खरीदने, उपचुनाव कराने और कोरना के कारण लॉकडाउन का भी मजाक उड़ाने जैसे मामले अपनी जगह हैं पर माधव राव सिंधिया को कांग्रेस में सेवा का मौका नहीं मिलना और उसके लिए भाजपा की शरण में जाना अपने किस्म की राजनीति या बेशर्मी या देशसेवा है। ऐसे में जीएसटी का समर्थन विरोध भी राजनीति ही होकर रह गया। जीएसटी का दर्द भाजपा को गुजरात विधानसभा चुनाव के समय ठीक से समझ में आया और तब जो छूट दी गई उससे मेरे जैसे लोग काम कर पा रहे हैं हालांकि जो बंद कर चुके थे उनमें से कितने वापस आए या आ पाए यह अलग मुद्दा है। बेशक जीएसटी का नुकसान कम नहीं है। फायदा राम जानें। सरकार ने तब भी कहा था कि जीएसटी पर लोगों को भ्रमित किया गया था।


सीएए
सीएए कानून भी ऐसा ही एक मामला है। भारत जैसे देश में, आधार कार्ड लागू किए जाने के बाद ऐसे इतने बड़े काम की जरूरत ही संदिग्ध है। लेकिन मामूली सा मुद्दा यह है कि जब आप अपने नागरिकों को जरूरी सुविधा नहीं दे सकते हैं तो दूसरे देशों के नागरिकों को आमंत्रित करने की क्या जरूरत है? आप अपने यहां से गैर नागरिकों को निकालिए, उन्हें जेल में रखिए उनकी नागरिकता की जांच या पुष्टि कीजिए – सब एक तरफ लेकिन दूसरे देश के लोगों को नागरिकता देनी ही है तो उसे क्यों नहीं जो पहले से यहां है और इच्छुक है। इसमें धर्म के आधार पर भेदभाव और गलत है। पर मकसद साफ था इसलिए कोई सुनवाई नहीं हुई। विरोध होने दिया गया और प्रचारक अंदाज में उसका मुकाबला हुआ। देश के नागरिकों के लिए इस कानून का कोई लाभ मालूम नहीं है, नुकसान मालूम है। आरोप लगाया गया कि कुछ लोगों ने विरोधियों को भ्रमित किया है।


धारा 370
धारा 370 खत्म करना सरकार के वायदों में था पर यह भी बिना किसी तैयारी के तकनीकी रास्ता बनाकर लागू कर दिया गया। इस कार्रवाई की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। याचिका भले बाद में दाखिल हुई हो पर कार्रवाई पांच अगस्त 2019 को हुई थी और उसके बाद से पूरे राज्य को जेल बना दिया गया है ताकि जनता विरोध नहीं कर सके। इतने समय से राज्य इंटरनेट सेवा सामान्य नहीं है। इसके चौतरफा नुकसान हैं। पर जनता झेल रही है। केंद्र सरकार अदालत में कह चुकी है कि जनता के पास इस बदलाव को स्वीकार करने का एक ही विकल्प है। यह पूरी तरह जबरदस्ती है लेकिन सरकारी अधिकारी कहते हैं कि देश में लोकतंत्र ज्यादा है और इसके लिए उन्हें डांटा भी गया हो यह सुनने में नहीं आया। सरकार सफल है। लाखों लोग मारी मुसीबत में रह रहे हैं तो रहें।


कोविड-19 / लॉक डाउन
इस मामले में सरकार की नालायकी और निकम्मेपन पर जितना कहा जाए कम है। पहले तो इस बीमारी को देश में प्रवेश करने से नहीं रोका जा सकना भी भारी लापरवाही है फिर अचानक लॉक डाउन और जब बीमारी बढ़ गई तो लॉक डाउन खत्म करना और उसमें ढील सरकार की पुरानी कार्यशैली के अनुकूल है और उसके निकम्मेपन की पूरी तरह पुष्टि करती है। अभी तक ना टेस्ट निशुल्क किया गया है और ना हर जरूरतमंद को निशल्क मास्क बांटा जा सका है। उल्टे एक रुपए वाला मास्क अब 10 रुपए में बिक रहा है (आपदा में अवसर)। सरकार के पास ना तो नोटबंदी जैसे अपने ही बनाए संकट से निपटने का उपाय था ना वह कोविड-19 जैसी महामारी से ढंग से निपट पाई। जो हो रहा है वह राम भरोसे ज्यादा और योजना-व्यवस्था नदारद है। नुकसान सब दिख रहा है पर जनता को कोई शिकायत नहीं है। यह एक पार्टी के पक्ष में ब्रेनवाश किए जाने का असर है।


कृषि अध्यादेश
ऐसी सरकार अपनी इन उपलब्धियों के बाद कृषि विधेयक लेकर आई। वह कैसे पास हुआ, सबने देखा। अब वह कानून है। विरोध करने वाले फिर भ्रमित बताए जा रहे हैं। सरकार बता रही है कि वह किसानों का वैसे ही भला करना चाहती है जैसे नोटबंदी से आम देशवासियों का किया, जीएसटी से कारोबारियों का और 370 हटाकर कश्मीरियों का किया है। पर किसान हैं कि मान नहीं रहे। वे कहते हैं कि उन्हें ऐसी भलाई नहीं चाहिए और सरकार कह रही है कि हम किसानों की भलाई करके रहेंगे। कुछ लोग समझ नहीं रहे, कुछ सरकार के विरोधी हैं और बाकी सब देश विरोधी। सिर्फ सरकार सही है क्योंकि वोटकटवा राजनीति में उसे अधिकतम वोट मिले हैं। मशहूर अर्थशास्त्री कौशिक बसु ने इस बारे में ट्वीट किया है (अंग्रेजी से अनुवाद), अब मैंने भारत के एनए कृषि अध्यादेश का अध्ययन कर लिया है और महसूस करता हूं कि वे दोषपूर्ण हैं और हमारे किसानों के लिए नुकसानदेह। हमारे कृषि नियमनों को बदलने की आवश्यकता है पर नए कानून अंततः किसानों से ज्यादा कॉरपोरेट हित साधेंगे। भारत के किसानों की संवेदनशीलता और नैतिक शक्ति को सलाम। दूसरी ओर, भारत सरकार है जो किसानों को हार्डवर्क करवाने के लिए दृढ़ निश्चिय लगती है। अडानी की तैयारियों की खबरें अपनी जगह हैं।
प्रधानमंत्री किसानों के शुभचिन्तक होने का दिखावा कर रहे हैं और जबरन उनकी भलाई करने पर आमादा हैं। बचाव में झूठे और फालतू तर्क पेश किए जाने के अलावा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 106 पन्ने का एक दस्तावेज भी तैयार किया है, पुटिंग फार्मर्स फर्स्ट (किसानों को सबसे आगे रखना)। मुझे यह अंग्रेजी में ही मिली है और मालूम नहीं भारतीय भाषाओं में है कि नहीं पर नहीं हो तो या हो भी तो कितने काम की है यह बाद की बात है। वैसे, सरकारी प्रचार साइटों पर यह अंग्रेजी में ही है। किसी और भाषा में देखने या डाउनलोड करने का विकल्प अभी तक नहीं मिला जबकि अंग्रेजी में इसे 30 नवंबर को ही अपलोड कर दिया गया था।

About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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